बुधवार, 3 अगस्त 2022

जानकारी काल अगस्त - 2022

 हिंदी मासिक 

जानकारी काल 

वर्ष-23,  jaankaarikaal.com    अंक-03        अगस्त - 2022,        पृष्ठ 50            मूल्य 2-50    

 


हम करें राष्ट्र आराधन, हम करें राष्ट्र आराधन, 

तन से, मन से, धन से, तन मन धन जीवन से

हम करें राष्ट्र आराधन,अन्तर से, मुख से, कृति से

निश्छल हो निर्मल मति से श्रद्धा से मस्तक नत से

हम करें राष्ट्र अभिवादन,हम करें राष्ट्र आराधन

संरक्षक

 श्रीमान कुलवीर शर्मा

महामंत्री समर्थ शिक्षा समिति

डॉ वी  एस नेगी

प्रोफेसर भगत सिंह कॉलेज सांध्य


 प्रधान संपादक व  प्रकाशक

 सतीश शर्मा 


 

 कार्यालय

 ए 214 बुध नगर इंद्रपुरी

 नई दिल्ली 110012


 मोबाइल

  9312002527


 संपादक मंडल

 सौरभ  शर्मा,कपिल शर्मा,

गौरव शर्मा,डॉ अजय प्रताप सिंह, करुणा ऋषि, डॉ मधु वैध, भूप  सिंह यादव, ऋतु सिंह, राजेश शुक्ल  


प्रकाशक व मुद्रक सतीश शर्मा के लिय ग्लैक्सी प्रिंटर-106 F,

कृणा नगर नई दिल्ली 110029, A- 214 बुध नगर इन्दर पूरी नई दिल्ली  110012 से प्रकाशित |


सभी लेखों पर संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है पत्रिका में किसी भी लेख में आपत्ति होने पर उसके विरुद्ध कार्रवाई केवल दिल्ली कोर्ट में ही होगी

 

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         अनुक्रमणिका

सम्पादकीय   - 2 

स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज के संघर्षो की गाथा - 3  

अगस्त के महत्वपूर्ण दिवस - 5 

बुद्धिमत्ता की परीक्षा - 6 कहानी 

विज्ञान का सांस्कृतिक स्वरूप - 8  

इंतजार - 11 कहानी

महाभारत की एक रोचक गाथा - 13 

नवसत्र - 15 कविता 

शिक्षक - 16 

यमराज और डाकू - 17 कहानी 

तीन विकल्प - 18 कहानी 

ससुराल - 20 कहानी

संस्कार - 21 

हमारे गुरुकुल - 22

निःस्वार्थ सेवा - 25 कहानी

आशीर्वाद - 26 कहानी 

मासिक पंचांग,पंचक विचार,भद्रा विचार,अगस्त मास के व्रत,सर्वार्थ सिद्ध योग,मूल विचार - 27

सेवया की खीर - 31 

कृष्ण जन्माष्टमी की पूजन विधि व मन्त्र - 32

रक्षाबंधन - 33

राखी वीरो वाली - 33 

नाडी शोधन - 34 

पुत्रदा एकादशी कथा - 36 

अजा एकादशी कथा - 37 

शनि अमावस्या का महत्व व उपाय - 37

उतराखंड में जल स्त्रोत्र व जल प्रबन्धन - 38 

जय कामख्या माता - 45   



सम्पादकीय  

अस्थिरं जीवितं लोके ह्यस्थिरे धनयौवने ।

अस्थिराः पुत्रदाराश्च धर्मः कीर्तिर्द्वयं स्थिरम् ॥

इस अस्थिर जीवन/संसार में धन, यौवन, पुत्र-पत्नी इत्यादि सब अस्थिर है । केवल धर्म, और कीर्ति ये दो ही बातें स्थिर है । धर्मो रक्षति रक्षितः

किसी को भी एक दूसरों की आस्था पर चोट पहुंचाने का अधिकार नहीं,यह बात क्यों नही समझ रहें हम मनुष्य का एक ही कर्म व धर्म है और वह है मानवता | हम इस दुनिया में इंसान बनकर आए हैं तो सिर्फ इसलिए कि हम मानव सेवा कर सकें | पूरे विश्व में ईश्वर ने हम सभी को एक सा बनाया है लेकिन हम क्यों नही समझते! बल्कि अब तो अभिव्यक्ति की बेलगाम स्वंत्रता अब घातक रूप लेती जा रही है | सबसे खेदजनक है कि जानी मानी हस्तियां भी इस अनावश्यक दौड़ में शामिल हो गई हैं | आए दिन इस प्रकार के अप्रिय मामले प्रकाश में आ रहे हैं एक दूसरे की आस्था को आघात पहुंचाना निरर्थक बयानबाजी करना गैरजरूरी विवाद खड़े करना यहां तक कि बहुत ही अपमानजनक तस्वीरें कार्टून और फिल्में बनाना तथा उन्हें प्रसारित करना कुछ लोगों का नया शौक बन गया है | इस प्रकार के मामलों में अवांछित रूप से राजनीति भी शामिल हो जाती है! यद्यपि सबको अपनी इच्छा के अनुसार मत परंपरा के पालन का अधिकार है लेकिन किसी को भी दूसरों की आस्था पर चोट पहुंचाने का अधिकार नहीं है | जब कभी इस सामान्य नियम का उल्लंघन किया जाता है तो समाज का वातावरण दूषित होता है! यह स्थिति किसी भी दृष्टि से स्वस्थ या लाभकारी नहीं कही जा सकती।हमे समझना होगा और किसी की भी आस्था  के बारे में अपमानजनक शब्दों से बचना होगा। अगर हम चाहते है की अपना देश विकाश के रस्ते पर चले तो हमे अपने प्रधानमन्त्री के इस वाक्य पर सोचना चाहीये की सब का साथ सब का विकाश सब का विसवश | क्या आपस में एक दुसरे की आस्था को आघात पहुंचा कर हम एक साथ रह सकते है | मत परम्परा मनुष्य के उत्थान के लिय कार्य करते है व बनते है |

यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । 

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनु पश्यतः ।।

जिस अवस्था में आत्मज्ञानी ऐसा अनुभव करता है कि समस्त पदार्थों में परमात्मा ओत-प्रोत है, अन्दर-बाहर व्यापक है, तब सर्वत्र परमात्मा का दर्शन करने वाले उपासक को कैसा मोह और कैसा शोक अर्थात् वह शोक और मोह से ऊपर उठ जाता है।


Birsa Munda Swtantra sangram janjaiya

स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज के संघर्षों की गाथा को पाठ्य पुस्तकों में सम्मिलित करे

– डॉ० अंजनी कुमार सुमन

भारत भूमि का कण-कण वीरों के मनोबल और बलिदानियों के रक्त से सिंचित रहा है। समय, काल, परिस्थितियाँ भले ही अलग-अलग रही हों लेकिन प्रत्येक समय में हमारे वीरों ने हमेशा साहस का उदाहरण प्रस्तुत किया है। हम सभी जानते हैं कि लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान की आहुतियों से ही हमारे परतंत्र रहे देश को स्वतंत्रता मिली है जिसे किसी भी मूल्य पर शताब्दियों तक विस्मरण नहीं किया जा सकता। उन वीरों ने जाति, धर्म, समाज, संस्कृति, अवस्था और आयु सभी को भुला कर एकजुट हो स्वतंत्रता के लिए आने वाली सभी चुनौतियों का सामना किया। जेल में बंद हुए, लाठी-डंडे खाये, गोलियाँ  खायी, घोड़े से घसीटे गये, शरीर के अंग क्षत-विछत हुए, घर-द्वार और संम्पत्ति लुटी, कोड़े खाये, जख्मों पर नमक लगे, काला पानी मिला और अंततः फाँसी पड़ी, फिर भी इनके हौसले अडिग के अडिग रहे।

देश पर न्योछावर होने वाले उन वीरों की कुछ गाथाएँ तो सुनी और सुनायी जा रही है, लेकिन उनमें से कुछ किसी कारणवश अभी तक प्रकाश में नहीं आये। जबकि उनका समर्पण किसी से इंच भर भी कम नहीं था। कुछ स्वतन्त्रता सेनानी पाठ्य पुस्तकों की शोभा बने तो कुछ की कहानियाँ कभी प्रसारित ही नहीं हुई। यह एक विचारणीय प्रश्न है। जबकि सभी निष्ठावान स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाओं को याद करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।

स्वतंत्रता के महानतम महत्व को जब राजा, महाराजा और सामंत नहीं समझ पा रहे थे, तब सर्वप्रथम वनवासी और जनजातीय समाज ने इसको दृष्टिगत किया और अंग्रेजों के द्वारा बिछायी गयी गुलाम मानसिकता से निकलकर क्रांति का प्रथम बिगुल फूँका। जिसमें युवा वीर क्रांतिकारी तिलका माँझी, बिरसा मुँडा, सिद्धो-कान्हो मुरमू, टिकेंद्रजीत सिंह, वीर सुरेंद्र साई, तेलंगा खड़िया, वीर नारायण सिंह, रूपचंद कंवर, लक्ष्मण नाइक, रामजी गोंड, अल्लूरी सीताराम राजू, कोमराम भीमा, रमन नांबी, गोविंद गुरू, गुंदाधुर, भाऊ खरे, चिमनजी जाधव, नाना दरबारे, काज्या नायक और तांतिया भील आदि शामिल थे।

जनजातीय समाज परंपरागत तरीके से वन्य एवं पर्यावरण का संरक्षक रहा है। अंग्रेजों के द्वारा लायी गयी सामंती अधिकारों की व्यवस्था ने वनों पर इनके एकाधिकार के प्रभुत्व को नष्ट कर दिया जो इनकी रोजी-रोटी और दैनिक जीवन के साधन का मुख्य स्रोत था। इस कारण यह अपने आपको असहाय एवं शोषित समझने लगे और अंततः इनके अंदर भीषण आक्रोश उत्पन्न हुआ। जिसके फलस्वरूप इनके द्वारा अलग-अलग स्थानों पर छोटे-छोटे नेतृत्व में कई आन्दोलन हुए। सैंकड़ों-हजारों जाने गयीं, लेकिन संघर्ष वर्षों तक निरंतर छोटे-छोटे समूहों में जारी रहा। ये अलग बात है कि अंग्रेजों की अत्याधुनिक बंदूकों और तोप के गोलों के आगे इनके तीर-कमान असहाय पड़ जाते थे लेकिन उन्होंने तोप के गोलों के सामने अपने मजबूत चौड़े कंधों से सामना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने लहू के धारा प्रवाह बह जाने का खेद नहीं किया। भूखे-प्यासे भी योग्य सिपाही की तरह तब तक लड़ते रहे जब तक शरीर में एक अंश भी साँस शेष रहा। अंग्रेजों की अपनी बड़ी घातक सेना के सामने तीर-कमान लिए मुट्ठी भर जनजातीय क्रांतिकारी पुआल के ढ़ेर में मुट्ठी भर शोले का काम कर रहे थे। इन जनजातीय आन्दोलनों को इतिहास में कोल विद्रोह, संथाल विद्रोह, अहोम विद्रोह, खासी विद्रोह, भील विद्रोह, हूल विद्रोह, रम्पा विद्रोह, मुण्डा विद्रोह आदि के नामों से जाना गया।

ऐसे वीर राष्ट्र उन्नायक क्रांतिकारियों को याद रखना और भावी पीढ़ी तक इनके शौर्य एवं संदेश को पहुँचाना वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेवारी है। इस हेतु इन सबको पाठ्य पुस्तकों के पृष्ठों में अंकित किया जाना बहुत आवश्यक है। इसीलिए कि इन पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से नयी पीढ़ी में राष्ट्र प्रेम की भावना का विकास तो होगा ही, साथ ही क्रांतिवीर राष्ट्र सेवकों के जीवन और सिद्धांतों से प्रेरणा लेकर विद्यार्थी राष्ट्र के प्रति शौर्य, साहस, एकता, संघर्ष और समर्पण के गुणों को स्वयं में धारण कर पाएँगे। पड़ोसी या शत्रु देशों की रोज पनप रही कुटिल नीतियों के कारण आने वाले भविष्य में भी राष्ट्र को कई सारी चुनौतियों एवं संघर्षों का सामना करना पड़ सकने की स्थिति हो सकती है। इन अनापेक्षित परिस्थियों में राष्ट्र के नागरिक बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय मूल्यों को समझेंगे तो निश्चित रूपेण किसी भी प्रकार की विपत्ति का सामना करने में सबल बन सकेंगे और राष्ट्र को भी सुरक्षित रख पाएँगे।

इस बात से तो हम सभी अवगत हैं कि राष्ट प्रेम और विरोध के अभाव में हमने मुगलों और अंग्रेजों द्वारा थोपी गयी गुलामी में कितनी यातनाएँ एवं प्रताड़नाएँ सही है। इसलिए हमें हमारे भविष्य को राष्ट्र भावना के लिए प्रशिक्षित करना बहुत जरूरी है जिनके प्रेरणा स्रोत ये आला क्रांतिवीर हो सकते हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर की शिक्षा में स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित जनजाति समाज की भूमिकाओं को कक्षा-कक्ष का विषय बनाकर न सिर्फ हम उन्हें सम्मान देंगे बल्कि यह उनके पारंपरिक उपेक्षित जीवन के लिए एक पुरस्कार भी होगा।

(लेखक शिक्षण महाविद्यालय में व्याख्याता है और विद्या भारती दक्षिण बिहार प्रान्त के प्रचार प्रमुख है।)



अगस्त मास के महत्वपूर्ण दिन 

 

1-अगस्त - राष्ट्रीय पर्वतीय पर्वतारोहण दिवस,यॉर्कशायर दिवस,लोकमान्य गंगाधर पुन्य तिथी,पुरषोतम दास टंडन जयंती  

3 - अगस्त  मैथली शरण गुप्त जयंती 

4-अगस्त (अगस्त का पहला रविवार)  मित्रता दिवस,अमेरिकी तट रक्षक दिवस 

6-अगस्त - हिरोशिमा दिन

7 - अगस्त - रविंदर नाथ टैगोर पुण्यतिथि  

8-अगस्त - भारत छोड़ो आंदोलन दिवस)

9-अगस्त - नागासाकी दिवस,विश्व के स्वदेशी लोगों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस 

11 - अगस्त - खुदीराम बोस बलिदान दिवस 

12-अगस्त - अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस

13 - अगस्त - मैडम भीखा जी कामा पुण्यतिथि,अंतर्राष्ट्रीय वामपंथी दिवस 

14-अगस्त - आप-ए-आज़ादी (पाकिस्तान स्वतंत्रता दिवस) 

15-अगस्त - भारत में स्वतंत्रता दिवस, जापान दिवस पर विजय,राष्ट्रीय शोक दिवस(बांग्लादेश), 

वर्जिन मैरी की हत्या का दिन. म्ह्रिशी अरविन्द घोष जयंती 

16-अगस्त - बेनिंगटन बैटल डे 

17- अगस्त - इंडोनेशियाई स्वतंत्रता दिवस, मदन लाल धींगरा बलिदान दिवस, 

19 - अगस्त - विश्व फोटोग्राफी दिवस, विश्व मानवतावादी दिवस 

20-अगस्त - विश्व मच्छर दिवस, सदभावना दिवस, भारतीय अक्षय उर्जा दिवस,पंडित मांगेराम  जयंती  

23-अगस्त - दास व्यापार और उसके उन्मूलन की याद के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस, स्टालिनवाद और नाजीवाद के पीड़ितों के लिए यूरोपीय दिवस की याद 

24 - अगस्त शिवराम हरी राजगुरु जयंती 

26-अगस्त - महिला समानता दिवस 

29-अगस्त - राष्ट्रीय खेल दिवस 

30-अगस्त - लघु उद्योग दिवस 

31-अगस्त - हरि मर्देका (मलेशिया राष्ट्रीय दिवस)



बुद्धिमत्ता की परीक्षा 



बहुत पुरानी बात है, उन दिनों आज की तरह स्कूल नही होते थें. गुरुकुल शिक्षा प्रणाली थी और छात्र गुरुकुल में ही रहकर पढ़ते थे. उन्हीं दिनों की बात है. एक विद्वान पंडित थे, उनका नाम था- राधे गुप्त. उनका गुरुकुल बड़ा ही प्रसिद्ध था, जहाँ दूर दूर से बालक शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे। राधे गुप्त की पत्नी का देहांत हो चूका था, उनकी उम्रः भी ढलने लगी थी, घर में विवाह योग्य एक कन्या थी, जिनकीं चिंता उन्हें हर समय सताती थी. पंडित राधे गुप्त उसका विवाह ऐसे योग्य व्यक्ति से करना चाहते थे, जिसके पास सम्पति भले न हो पर बुद्धिमान हो। एक दिन उनकें मन में विचार आया, उनहोंने सोचा कि क्यों न वे अपने शिष्यों में ही योग्य वर की तलाश करें. ऐसा विचार कर उन्होंने बुद्धिमान शिष्य की परीक्षा लेने का निर्णय लिया, उन्होंने सभी शिष्यों को एकत्र किया और उनसें कहा-”मैं एक परीक्षा आयोजित करना चाहता हूँ, इसका उद्देश्य यह जानना है कि कौन सबसें बुद्धिमान है।

 मेरी पुत्री विवाह योग्य हो गईं है और मुझें उसके विवाह की चिंता है, लेकिन मेरे पास पर्याप्त धन नही है. इसलिए मैं चाहता हूँ कि सभी शिष्य विवाह में लगने वाली सामग्री एकत्र करे. भले ही इसके लिए चोरी का रास्ता क्यों न चुनना पड़े. लेकिन सभी को एक शर्त का पालन करना होगा, शर्त यह है कि किसी भी शिष्य को चोरी करते हुए कोई देख न सके।अगले दिन से सभी शिष्य अपने अपने काम में जुट गये. हर दिन कोई न कोई न कोई शिष्य अलग अलग तरह की वस्तुएं चुरा कर ला रहा था और गुरूजी को दे रहा था. राधे गुप्त उन वस्तुओं को सुरक्षित स्थान पर रखते जा रहे थे. क्योंकि परीक्षा के बाद उन्हें सभी वस्तुएं उनकें मालिक को वापिस करनी थी। परीक्षा से वे यही जानना चाहते थे कि कौन सा शिष्य उनकी बेटी से विवाह करने योग्य है. सभी शिष्य अपने अपने दिमाग से कार्य कर रहे थे. लेकिन उनमें से एक छात्र रामास्वामी, जो गुरुकुल का सबसे होनहार छात्र था, चुपचाप एक वृक्ष के नीचे बैठा कुछ सोच रहा था। उसे सोच में बैठा देख राधे गुप्त ने कारण पूछा. रामास्वामी ने बताया, “आपने परीक्षा की शर्त के रूप में कहा था कि चोरी करते समय कोई देख न सके. लेकिन जब हम चोरी करते है, तब हमारी अंतरात्मा तो सब देखती है, हम खुद से उसे छिपा नही सकते. इसका अर्थ यही हुआ न कि चोरी करना व्यर्थ है।”  उसकी बात सुनकर राधे गुप्त का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा. उन्होंने उसी समय सभी शिष्यों को एकत्र किया और उनसें पूछा-”आप सबने चारी की.. क्या किसी ने देखा? सभी ने इनकार में सिर


हिलाया. तब राधे गुप्त बोले ”बच्चों ! क्या आप अपने अंतर्मन से भी इस चोरी को छुपा सके?”

 इतना सुनते ही सभी बच्चों ने सिर झुका लिया. इस तरह गुरूजी ने अपनी पुत्री के लिए योग्य और बुद्धिमान वर मिलगया | उन्होंनेरामास्वामी के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया | साथ ही शिष्यों द्वारा चुराई गई वस्तुएं उनके मालिकों को वापिस कर बड़ी विनम्रता से क्षमा मांगी।



स्वदेशी जागरण ,स्वदेशी आंदोलन ,स्वदेशी चिंतन और स्वावलंबन का यज्ञ प्रारंभ हो चुका है, अपनी अपनी आहुति लेकर तत्पर रहें यह युद्ध है भारतीय जीवन पद्धति का ,भारतीय चिंतन शैली का, भारतीय ग्रामीण विकास ,कृषि व्यवस्था, आचार विचार व्यवहार का इस युद्ध में विजय सुनिश्चित है. बस अपनी अपनी शक्ति को एकत्रित करके लगानी है दिल से ,बुद्धि का प्रयोग ना करें नीतियां बनती रहेंगी सरकारें आती रहेगी जाती रहेगी जब भी सोचे देश के लिए सोचे जब भी कुछ खरीदें स्वदेशी का भाव मन में हो बस इतना ही करना है वंदे मातरम





विज्ञान का सांस्कृतिक स्वरूप

 – वासुदेव प्रजापति

आज का युग विज्ञान का युग माना जाता है। कुछ लोग तो आज के युग का देवता विज्ञान को ही मानते हैं। और ऐसी हवा बना दी गई है कि विज्ञान पढ़ने वाले बुद्धिमान होते हैं। इस सन्दर्भ में सांस्कृतिक दृष्टि से कुछ बातों का विचार करना आवश्यक हो जाता है।

  1. आज जिसे हम विज्ञान कहते हैं, वह भौतिक विज्ञान है। भारतीय संकल्पना में केवल अन्नमय और प्राणमय जगत को ही विज्ञान नाम दिया गया है। यह एक अधूरी व अनुचित संकल्पना है। भारत में वास्तविक विज्ञान का दायरा भौतिक विज्ञान से लेकर आत्म विज्ञान तक का है, जिसमें मनोविज्ञान का भी समावेश हो जाता है।

  2. वैज्ञानिकता का सही अर्थ शास्त्रीयता है। यह बुद्धि का क्षेत्र है, तर्क का क्षेत्र है। भारतीय परम्परा से देखें तो न्याय का क्षेत्र है और तत्त्व ज्ञान का क्षेत्र है। जो बात तर्क से सिद्ध नहीं होती, वह वैज्ञानिक नहीं है। आज जो भौतिक विज्ञान की प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं होता, उसे मान्यता नहीं मिलती। इस मान्यता से मुक्त होकर विज्ञान का व्याप बढ़ाने की आवश्यकता है।

  3. आज का विज्ञान सभी बातों का मापदंड नहीं हो सकता। वास्तव में सामाजिकता ही वैज्ञानिकता का मापदंड होना चाहिए। ध्यानपूर्वक मनन करें तो विज्ञान स्वयं ज्ञान नहीं है, अपितु ज्ञान तक पहुँचने की प्रक्रिया है। प्रक्रिया कभी निर्णायक नहीं हो सकती, ज्ञान ही निर्णायक होता है। देखा जाए तो विज्ञान सभ्यता के विकास के लिए है, और सभ्यता का निकष संस्कृति है। इसलिए विज्ञान संस्कृति के लिए है, संस्कृति विज्ञान के लिए नहीं। आज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए यह एक मूलभूत परिवर्तन है।

  4. भावना, क्रिया और विचार की अपेक्षा बुद्धि की प्रतिष्ठा विशेष है। अतः अन्य सभी आयामों को बुद्धिनिष्ठ बनाना चाहिए, किन्तु बुद्धि को आत्मनिष्ठ बनाना अपेक्षित है। इसलिए विज्ञान को भी आत्मनिष्ठ बनाना चाहिए।

भारत की विज्ञान दृष्टि

भारत के परमाणु विज्ञानी महर्षि कणाद अपने वैशेषिक दर्शन में कहते हैं कि “दृष्टानां दृष्ट प्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोगोभ्युदयाय” अर्थात् प्रत्यक्ष देखे हुए और अन्यों को दिखाने के उद्देश्य से अथवा स्वयं और गहराई से ज्ञान प्राप्त करने हेतु किए गए प्रयोगों से अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त होता है। महर्षि गौतम सामान्य कण से लेकर ब्रह्माण्ड तक का प्रयोजन जानने के लिए न्याय दर्शन में सोलह चरण की प्रक्रिया बतलाते हैं। प्रमेय अर्थात् जिसे जानना है, प्रमाण अर्थात् वे साधन जिनसे जानने का प्रयत्न करते हैं। संशय अर्थात् जिसके कारण जाँच-पड़ताल की जाती है। समाधान के सब अंगों को अलग-अलग जानना अवयव कहलाता है। उसके बाद प्रतिज्ञा (हायपोथिसिस) रखी जाती है। तत्पश्चात हेतु, उदाहरण आदि के माध्यम से सत्य तक पहुँचने का प्रयत्न होता है। कुल मिलाकर इस प्रकार की प्रक्रिया बताई गई है।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ब्रह्म के समग्र रूप को जानने के लिए ज्ञान-विज्ञान दोनों को जानना चाहिए। क्योंकि इन्हें जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। वे आगे कहते हैं कि पृथ्वी अर्थात् ठोस, जल अर्थात् द्रव, वायु अर्थात् गैस, अग्नि अर्थात् ऊर्जा के साथ आकाश, मन, बुद्धि व अहंकार तथा ये सब जिसमें हैं, वह परम चेतन तत्त्व इन सबके बारे में जानना चाहिए।

ज्ञान-विज्ञान का अंतिम उद्देश्य जगत के अंतिम कारण को खोजना है। इस दृष्टि से अनेक सन्दर्भों का वेदों, उपनिषदों एवं दर्शन ग्रंथों में पर्याप्त उल्लेख मिलता है। इनमें सृष्टि की उत्पत्ति, क्रम तथा लय प्रक्रिया, सृष्टि संचालन के नियमों का उल्लेख है। इसके साथ-साथ व्यावहारिक विज्ञान की दृष्टि से भौतिकी, रसायन, वनस्पति शास्त्र, कृषि, गणित, नक्षत्र विज्ञान, जीव शास्त्र, आयुर्वेद, धातु विज्ञान और विभिन्न कला-कौशल भी अध्ययन व प्रयोग का क्षेत्र था।

छांदोग्योपनिषद में नारदजी व सनतकुमारजी के संवाद से ज्ञात होता है कि एक बार नारद सनतकुमारजी के पास गए और उनसे प्रार्थना की भगवन! मुझे ज्ञान दीजिए। तब सनतकुमारजी ने पूछा, तुमने क्या पढ़ा है, कितना जानते हो? इसके उत्तर में नारद कहते हैं, भगवन्, मैंने चारों वेद, पुराण रूपी पाँचवाँ वेद, इतिहास, व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, ज्योतिष, विधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र,  देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, गारुड़ मंत्र, देवजन विद्या, नृत्य, संगीत, शिल्प ये सब पढ़ा है। आगे वे कहते हैं, मैं मंत्र वेत्ता हूँ, परन्तु आत्मवेत्ता नहीं हूँ। अतः वह ज्ञान मुझे दीजिए।

नारदजी व सनतकुमारजी के संवाद से स्पष्ट होता है कि आज विज्ञान में जितनी शाखाएँ हैं, उनसे भी अधिक विषयों का ज्ञान नारदजी को था। वे सबसे श्रेष्ठ ज्ञान आत्मज्ञान को जानना चाहते हैं। अर्थात् विज्ञान का भी अंतिम लक्ष्य आत्मज्ञान ही है। इसलिए आज के विज्ञान को भी आत्मनिष्ठ बनना होगा। यही भारतीय विज्ञान दृष्टि है।

आज विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की बात बोली जाती है। इस पर मनन करने की आवश्यकता लगती है। विज्ञान और अध्यात्म समान संकल्पनाएँ नहीं हैं। विज्ञान अध्यात्म का ही एक भाग है। विज्ञान के निकष अध्यात्म में मिलते हैं। यही भारतीय विज्ञान दृष्टि है। भारतीय दृष्टि से विज्ञान का विचार करने पर हमें आज के विज्ञान में बहुत कुछ जोड़ने की आवश्यकता प्रतीत होती है। वे जोड़ने वाले बिन्दु अधोलिखित हैं –

  1. भौतिक विज्ञान को पंचमहाभूतात्मक संकल्पना का आधार देना चाहिए। ऐसा करने से भौतिक विज्ञान के आकलन में बहुत बड़ा परिवर्तन आ सकता है। उदाहरणार्थ सृष्टि विज्ञान में अष्टधा प्रकृति की संकल्पना जुड़ते ही तीन गुण सत्व, रज व तम भी जुड़ जायेंगे। जिससे पदार्थ का स्वरूप ही बदल जाएगा।

  2. प्राणी विज्ञान के क्षेत्र में प्राण का विचार करना ही होगा। प्राण का विचार करते ही शरीर विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और प्राणी विज्ञान का स्वरूप ही बदल जाएगा।

  3. मन और मानसिक क्रियाओं का भौतिक जगत पर क्या प्रभाव होता है? इसका विचार किए बिना भौतिक विज्ञान का वैज्ञानिक अध्ययन अधूरा ही माना जाएगा। जैसे – जितने भी रोग होते हैं उनका उद्गम मन में होता है और वे प्रकट शरीर में होते हैं। अतः उनका उपचार भी मन का विचार किए बिना नहीं हो सकता। यह कथन पूर्णतः वैज्ञानिक कथन ही है। यदि इस विचार को प्रतिष्ठित किया गया तो चिकित्सा शास्त्र का स्वरूप ही बदल जाएगा।

  4. मनुष्य शरीर की समस्त प्रक्रियाओं को चक्र प्रभावित करते हैं। चक्र प्राण का क्षेत्र है, शरीर का नहीं। इन पर मानसिक प्रक्रियाओं का प्रभाव होता है, इस बात पर अवश्य विचार करना चाहिए।

  5. प्राचीन भारत में विज्ञान के अध्ययन और अनुसंधान की पद्धतियाँ क्या-क्या रही होंगी? इसका अनुसंधान करना भी आवश्यक लगता है। उदाहरण के लिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का विकास भी नहीं हुआ था, तब भी भारत में शल्य चिकित्सा होती थीं। दूसरा उदाहरण हमारे ऋषि-मुनि यह कैसे जानते थे कि मनुष्य शरीर में बहत्तर हजार नाड़ियाँ होती हैं? यह भी आज खोज का विषय है।

अतः प्राचीन भारत की भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में क्या-क्या उपलब्धियाँ रही हैं, इसकी जानकारियाँ वर्तमान सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए इसे पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना आवश्यक है, क्योंकि आज भारत में ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में यह धारणा बनी हुई है कि विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पाश्चात्य जगत का ही विषय रहा है। भारत तो ध्यान, भक्ति, भावना और कल्पना की दुनिया में ही विहार करता रहा है। भारत में अध्यात्म और कला की उपासना तो थीं, परन्तु विज्ञान निष्ठा का अभाव था। हमें इस भ्रान्ति को दूर करने हेतु पुरुषार्थ करना की आवश्यकता है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)


इंतजार 

शरद सिंह 

चारों ओर विषैली गंध फैली थी..भीड़ मुँह ढके सारा मंजर चुप चाप देख और सुन रही थी..परंतु कह कोई कुछ नहीं रहा था..बस एक दूसरे को शांत नज़रों से देखे जा रहा था | नगर पालिका की मुर्दा गाड़ी वर्मा जी के दरवाजे पे आकर लगी थी | किसी ने वर्मा जी की पत्नी के मरने की खबर नगरपालिका को कर रखी थी शायद लेकिन वर्मा जी थे जो मान ही नहीं रहे थे और न ही स्ट्रेचर ब्वॉय को अंदर कमरे में जाने दे रहे थे..जहाँ उनकी पत्नी का पार्थिव शरीर पड़ा था |

चलिए चच्चा हटिए...कोई नहीं आने वाला चच्ची को ले जाने देजिए मैं ज्यादा देर तक नहीं रूकने वाला वैसे भी आज़ बहुत काम है...लोड भी ज्यादा है...आज़ स्ट्रेचर ब्वॉय बार बार अपनी घड़ी देख रहा था..और कहे जा रहा था |

नहीं नहीं....जरा रूको भाई...वो आता ही होगा...अरे विदेश से आ रहा है,आने में थोड़ा समय तो लगेगा ही न ...?

उसके रूखे व्यवहार के वावजूद वर्मा जी विनम्रतापूर्वक स्ट्रेचर ब्वॉय से विनती कर रहे थे...थोड़ी देर और रूक जाओ....साथ मे बेटी और बच्चें भी हैं...कम से कम उन्हें अपनी माँ के अंतिमदर्शन तो कर लेने दो...आखिर तुम भी किसी के बेटे हो..यह कहकर वो व्याकुल नज़रों से दरवाजे की ओर देखने लगे...वो बार बार दरवाजे की तरफ़ दौड़कर जातें और लौटकर भीतर कमरे में पड़ी अपनी मृत पत्नी के पार्थिव शरीर से लिपट कर रोने लगतें |

देखो अभी तक नहीं आएं सब तुम्हें बहुत विश्वास था कुछ हो जाए तुम्हारी बेटी तुम्हें नहीं छोड़ सकती | एक ना एक दिन तो मेरे पास आएगी ही, आखिर कब तक अपनी माँ से दूर रहेगी | बेटी को पढाने लिखाने के लिए तुमने तो अपने सारे जेवर तक बेच दिए पर देखो तुम्हारे जीते जी तो नहीं आई वो..तुम्हारे मरने की खबर सुनकर भी लगता नहीं कि वो आ रही |

वो अपने बेटे और बेटी का बिगत दो दिन से इंतजार कर रहें थें |लेकिन अभी तक वो लोग आए नहीं थे | वर्मा जी ने बेटे / बेटी को जबसे खबर किया था | कि उनकी माँ अब इस दुनिया में नहीं रही | उस खबर के बाद न तो बेटे का फोन लग रहा था और न ही बेटी का दोनों के फोन लगातार स्विचऑफ बता रहे थे.

हालांकि माँ के मरने की खबर सुनकर बेटे ने कहा था कि वह टिकट लेकर आज शाम ही निकलता हूँ...कल सुबह तक आ जाऊँगा..बहू और रास्ते में दीदी भी साथ होगी | लेकिन अब तक नहीं आया था..तीन दिन हो गए | अब तक तक तो आ जाना चाहिए था उसे..और छोटी को.आखिर कब तक पत्नी के पार्थिव शरीर को इस तरह रोके रखे रहें | उनकी आत्मा बच्चों को सोच तड़प रही थी | जिन हाथों ने उँगली पकड़कर उन्हें चलना ‍सिखाया, जिन काँधों ने बचपन में सहारा दिया, आज वही माँ बाप बेटे बेटी के लिए जी का जंजाल बन गए थे.एक बार मुड़कर ताकना तक गँवारा नहीं समझ रहे थे दोनों | जिन हाथों को बुढापे में अपने थर्राते पिता के हाथों को थामकर उनका सहारा बनना था | आज वही बेटा उन्हें बुढापे में मरता छोड़कर विदेश बैठा था | और बेटी की तो क्या कहें..कहा जाता है कि एक मां-बाप को सहारे के लिए बेटियां वरदान होती हैं..एक ही कोख से जन्म लेने वाले दो औलादों में बेटा मां-बाप को ठुकरा सकता है, लेकिन बेटियां अपने माता-पिता का बुरा कभी नहीं चाहती..लेकिन आज..बेटे को छोड़ उनकी बेटी भी उनकी परवरिश को गलत साबित कर रही थी | वर्मा जी पत्नी का सर गोद में लिए रोए जा रहे.थे..साथ ही साथ मरी पत्नी से बातें किए जा रहें थे | उनके मुर्झाए चेहरे पर चिंता और वेदना की लकीरें कोने कोने पसरी थी |अच्छा हुआ कि तुम मुझसे पहले मर गई मैं तो यही सोच कर हलकान और परेशान रहता था | मेरे बाद तुम्हारा क्या होगा | 

मैं हरदम सोचता था कहीं मैं पहले मर गया तो कौन ध्यान रखेगा तुम्हारा अब कम से कम 

तुम्हारी चिंता तो नहीं रहेगी मुझे फिर मेरा क्या 

है मैं तो यूँ भी जिंदा होकर भी लाश ही हूँ और मुझे लाश बनाया है तुम्हारी अंधी ममता ने तुम्हारे निश्चल एवं निश्वार्थ प्रेम ने..जिसका आज किश्त भर रहा हूँ मैं..कहकर पत्नी को सीने लगा रोने लगें | तभी स्ट्रेचर ब्वॉय की आवाज ने उनका ध्यान भंग किया,स्ट्रेचर ब्वॉय लगभग खिसियाहट भरे लहजे में कहने लगा - हटिए भी चाचा अब ले जाने दिजिए कोई नहीं आएगा मुझे ही अपना बेटा समझो और चच्ची कोले जानेदो |

वर्मा जी ने भी मानों नियति से हार मान लिया हो जैसे उनके न न करते करते भी स्ट्रेचर ब्वॉय कमरे में घूँस गया लेकिन अगले ही पल आश्चर्य से उसकी कदमें पीछे हो गई | बिस्तर पर एक नहीं दो मृत शरीर पड़े थे..सड़ी सिकुड़ी दो लाश..जिसकी नजरे खिड़की से जाने किसको तक रही थी | एक बर्मा जी की पत्नी की दूसरी उनकी खुद की | यह देख स्ट्रेचर ब्वॉय की नज़रे वर्मा जी को ढूँढ रही थी लेकिन वो कहीं नहीं थे | सच जान और सोच स्ट्रेचर ब्वॉय की रूह काँप गई कि वो इतनी देर से वर्मा जी नहीं बल्की उनकी आत्मा से बाते किए जा रहा था | इतनी देर वर्मा जी की आत्मा ने उसका रस्ता रोक रखा था | दूसरी तरफ़ बूढ़े मां-बाप को उनके जवान बच्च्चों के इस तरह मरता छोड़ जाने से पूरे मुहल्ले की आंखें दर्द से छलछला रही थी..सबकी आँखें नम थी.. |

अकेला स्ट्रेचर ब्वॉय वेदना में डूबा अपना कर्म कर रहा था..आज वो मुर्दों की बस्ती से दो मुर्दे साथ ले जा रहा था | श्राद्धकर्म करने के लिए क्योंकि और कुछ न सही वर्मा जी का अंतिमदर्शन तो सिर्फ़ उसने ही किया था | फिर चाहे उनकी आत्मा ही सही | दोनों की लाश जलाते स्ट्रेचर ब्वॉय मन ही मन सोच रहा था कि कैसे अभागे माता पिता हैं |



महाभारत की एक रौचक कथा 

कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र को विशाल सेनाओं के आवागमन की सुविधा के लिए तैयार किया जा रहा था। उन्होंने हाथियों का इस्तेमाल पेड़ों को उखाड़ने और जमीन साफ करने के लिए किया। ऐसे ही एक पेड़ पर एक गौरैया अपने चार बच्चों के साथ रहती थी। जब उस पेड़ को उखाड़ा जा रहा था तो उसका घोंसला जमीन पर गिर गया, लेकिन चमत्कारी रूप से उसकी संताने अनहोनी से बच गई। लेकिन वो अभी बहुत छोटे होने के कारण उड़ने में असमर्थ थे। कमजोर और भयभीत गौरैया मदद के लिए इधर-उधर देखती रही। तभी उसने कृष्ण को अर्जुन के साथ वहा आते देखा। वे युद्ध के मैदान की जांच करने और युद्ध की शुरुआत से पहले जीतने की रणनीति तैयार करने के लिए वहां गए थे। उसने कृष्ण के रथ तक पहुँचने के लिए अपने छोटे पंख फड़फड़ाए और किसी प्रकार श्री कृष्ण के पास पहुंची।

हे कृष्ण, कृपया मेरे बच्चों को बचाये क्योकि लड़ाई शुरू होने पर कल उन्हें कुचल दिया जायेगा। सर्व व्यापी भगवन बोले: मैं तुम्हारी बात सुन रहा हूं, लेकिन मैं प्रकृति के कानून में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। गौरैया ने कहा: हे भगवान! मै जानती हूँ कि आप मेरे उद्धारकर्ता हैं, मैं अपने बच्चों के भाग्य को आपके हाथों में सौंपती हूं। अब यह आपके ऊपर है कि आप उन्हें मारते हैं या उन्हें बचाते हैं। काल चक्र पर किसी का बस नहीं है, श्री कृष्ण ने एक साधारण व्यक्ति की तरह उससे बात की, जिसका आशय था कि वहा ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके बारे में वो कुछ भी कर सकते थे। गौरैया ने विश्वास और श्रद्धा के साथ कहा: प्रभु, आप कैसे और क्या करते है वो मै नहीं जान सकती। आप स्वयं काल के नियंता हैं, यह मुझे पता है। मैं सारी स्थिति एवं परिस्थति एवं स्वयं को परिवार सहित आपको समर्पण करती हूँ।

.भगवन बोले: अपने घोंसले में तीन सप्ताह के लिए भोजन का संग्रह करो। गौरैया और श्री कृष्ण के सवाद से अनभिज्ञ, अर्जुन गौरैया को दूर भगाने की कोशिश करते है। गौरैया ने अपने पंखों को कुछ मिनटों के लिए फुलाया और फिर अपने घोंसले में वापस चली गई। दो दिन बाद, शंख के उद् घोष से युद्ध शुरू होने की घोषणा की गई। कृष्ण ने अर्जुन से कहा की अपने धनुष और बाण मुझे दो। अर्जुन चौंका क्योंकि कृष्ण ने युद्ध में कोई भी हथियार नहीं उठाने की शपथ ली थी। इसके अतिरिक्त, अर्जुन का मानना था कि वह ही सबसे अच्छा धनुर्धर है। मुझे आज्ञा दें, भगवान: अर्जुन ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा, मेरे तीरों के लिए कुछ भी अभेद्य नहीं है। चुपचाप अर्जुन से धनुष लेकर कृष्ण ने एक हाथी को निशाना बनाया। लेकिन, हाथी को मार के नीचे गिराने के बजाय, तीर हाथी के गले की घंटी में जा टकराया और एक चिंगारी सी उड़ गई। अर्जुन ये देख कर अपनी हंसी नहीं रोक पाई कि कृष्ण एक आसान सा निशान चूक गए। क्या मैं प्रयास करू? उसने स्वयं को प्रस्तुत किया। उसकी प्रतिक्रिया को नजरअंदाज करते हुए, कृष्ण ने उन्हें धनुष वापस दिया और कहा कि कोई और कार्रवाई आवश्यक नहीं है। लेकिन केशव आपने हाथी को क्यों तीर मारा? अर्जुन ने पूछा। क्योंकि इस हाथी ने उस गौरैया के आश्रय उसके घोंसले को जो कि एक पेड़ पर था उसको गिरा दिया था। कौन सी गौरैया? अर्जुन ने पूछा। इसके अतिरिक्त, हाथी तो अभी स्वस्थ और जीवित है। केवल घंटी ही टूट कर गिरी है! अर्जुन के सवालों को खारिज करते हुए, कृष्ण ने उसे शंख फूंकने का निर्देश दिया। युद्ध शुरू हुआ, अगले अठारह दिनों में कई जानें चली गईं। अंत में पांडवों की जीत हुई। एक बार फिर, कृष्ण अर्जुन को अपने साथ सुदूर क्षेत्र में भ्रमण करने के लिए ले गए। कई शव अभी भी वहाँ हैं जो उनके अंतिम संस्कार का इंतजार कर रहे हैं। जंग का मैदान गंभीर अंगों और सिर, बेजान सीढ़ियों और हाथियों से अटा पड़ा था। कृष्ण एक निश्चित स्थान पर रुके और एक घंटी जो कि हाथी पर बाँधी जाती थी उसे देख कर विचार करने लगे । अर्जुन, उन्होंने कहा: क्या आप मेरे लिए यह घंटी उठाएंगे और इसे एक तरफ रख देंगे? निर्देश बिलकुल सरल था परन्तु अर्जुन के समझ में नहीं आया। 

आख़िरकार, विशाल मैदान में जहाँ बहुत सी अन्य चीज़ों को साफ़ करने की ज़रूरत थी, कृष्ण उसे धातु के एक टुकड़े को रास्ते से हटाने के लिए क्यों कहेंगे? उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा। हाँ, यह घंटी, कृष्ण ने दोहराया: यह वही घंटी है जो हाथी की गर्दन पर पड़ी थी जिस पर मैंने तीर मारा था। अर्जुन बिना किसी और सवाल के भारी घंटी उठाने के लिए नीचे झुका। जैसे ही उन्होंने इसे उठाया, उसकी हमेशा के लिए जैसे दुनिया बदल गई। एक, दो, तीन, चार और पांच। चार युवा पक्षियों और उसके बाद एक गौरैया उस घंटी के नीचे से निकले। बाहर निकल के माँ और छोटे पक्षी कृष्ण के इर्द-गिर्द मंडराने लगे एवं बड़े आनंद से उनकी परिक्रमा करने लगे। अठारह दिन पहले काटी गई एक घंटी ने पूरे परिवार की रक्षा की थी। मुझे क्षमा करें हे कृष्ण, अर्जुन ने कहा: आपको मानव शरीर में देखकर और सामान्य मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हुए, मैं भूल गया था कि आप वास्तव में ईश्वर हैं। 


नवसत्र विद्यालय आगमन

मन में लेकर नई उमंगें,

नई आशाएँ, नई तरंगें

एक कदम और बढ़ाकर

लक्ष्य पाने आए हैं, हम आशावादी बनकर

अपना भविष्य बनाने आए हैं,,


अर्जित करने नया ज्ञान,

लेकर हौंसलों की उड़ान

नई पुस्तकें लेकर हम

ज्ञान बढ़ाने आए हैं, हम आशावादी बनकर

अपना भविष्य बनाने आए हैं,,


संकल्प हमें लेना होगा,

अनुशासन अपनाना होगा

गुरुजनों के दिए ज्ञान को

हृदय से अपनाने आए हैं, हम आशावादी बनकर

अपना भविष्य बनाने आए हैं,,


ओ०पी०एस० के दीप हैं हम

मिलकर एक दिन चमकेंगे हम

मात-पिता और विद्यालय को,

अर्श पर पहुँचाने आए हैं, हम आशावादी बनकर

अपना भविष्य बनाने आए हैं,, -2

रिँकू शर्मा

हिंदी अध्यापिका

ओ०पी०एस० विद्यामंदिर अंबाला



शिक्षक  

पिकासो (Picasso) स्पेन में जन्मे एक अति प्रसिद्ध चित्रकार थे। उनकी पेंटिंग्स दुनिया भर में करोड़ों और अरबों रुपयों में बिका करती थीं...!! एक दिन रास्ते से गुजरते समय एक महिला की नजर पिकासो पर पड़ी और संयोग से उस महिला ने उन्हें पहचान लिया। वह दौड़ी हुई उनके पास आयी और बोली, 'सर, मैं आपकी बहुत बड़ी फैन हूँ। आपकी पेंटिंग्स मुझे बहुत ज्यादा पसंद हैं। क्या आप मेरे लिए भी एक पेंटिंग बनायेंगे...!!?' पिकासो हँसते हुए बोले, 'मैं यहाँ खाली हाथ हूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं फिर कभी आपके लिए एक पेंटिंग बना दूंगा..!!'लेकिन उस महिला ने भी जिद पकड़ ली, 'मुझे अभी एक पेंटिंग बना दीजिये, बाद में पता नहीं मैं आपसे मिल पाऊँगी या नहीं।' पिकासो ने जेब से एक छोटा सा कागज निकाला और अपने पेन से उसपर कुछ बनाने लगे। करीब 10 मिनट के अंदर पिकासो ने पेंटिंग बनायीं और कहा, 'यह लो, यह मिलियन डॉलर की पेंटिंग है।' महिला को बड़ा अजीब लगा कि पिकासो ने बस 10 मिनट में जल्दी से एक काम चलाऊ पेंटिंग बना दी है और बोल रहे हैं कि मिलियन डॉलर की पेंटिग है। उसने वह पेंटिंग ली और बिना कुछ बोले अपने घर आ गयी..!! लगा पिकासो उसको पागल बना रहा है। वह बाजार गयी और उस पेंटिंग की कीमत पता की। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह पेंटिंग वास्तव में मिलियन डॉलर की थी...!! वह भागी-भागी एक बार फिर पिकासो के पास आयी और बोली, 'सर आपने बिलकुल सही कहा था। यह तो मिलियन डॉलर की ही पेंटिंग है।' पिकासो ने हँसते हुए कहा,'मैंने तो आपसे पहले ही कहा था।' वह महिला बोली, 'सर, आप मुझे अपनी स्टूडेंट बना लीजिये और मुझे भी पेंटिंग बनानी सिखा दीजिये। जैसे आपने 10 मिनट में मिलियन डॉलर की पेंटिंग बना दी, वैसे ही मैं भी 10 मिनट में न सही, 10 घंटे में ही अच्छी पेंटिंग बना सकूँ, मुझे ऐसा बना दीजिये।' पिकासो ने हँसते हुए कहा,'यह पेंटिंग, जो मैंने 10 मिनट में बनायी है। इसे सीखने में मुझे 30 साल का समय लगा है। मैंने अपने जीवन के 30 साल सीखने में दिए हैं ..!! तुम भी दो, सीख जाओगी..! वह महिला अवाक् और निःशब्द होकर पिकासो को देखती रह गयी...!! एक अध्यापक को 40 मिनट के लेक्चर की जो तनख्वाह दी जाती है । वो इस कहानी को बयां करती है। एक अध्यापक के एक वाक्य के पीछे उसकी सालों की मेहनत होती है । समाज समझता है कि बस बोलना ही तो होता है अध्यापक को मुफ्त की नौकरी है!! ये मत भूलिए कि आज विश्व मे जितने भी सम्मानित पदों पर लोग आसीन हैं, उनमें से अधिकांश किसी न किसी अध्यापक की वजह से ही पहुँचे हैं." और हाँ, अगर आप भी अध्यापक की तनख्वाह को मुफ़्त की ही समझते हैं तो एक बार 40 मिनट का प्रभावशाली और अर्थपूर्ण लेक्चर देकर दिखा दीजिये , आपको अपनी क्षमता का एहसास हो जाएग


यमराज और डाकू



एक साधु व डाकू यमलोक पहुंचे। डाकू ने यमराज से दंड मांगा और साधु ने स्वर्ग की सुख-सुविधाएं। यमराज ने डाकू को साधु की सेवा करने का दंड दिया। साधु तैयार नहीं हुआ। यम ने साधु से कहा- तुम्हारा तप अभी अधूरा है। मृत्यु के बाद एक साधु और एक डाकू साथ-साथ यमराज के दरबार में पहुंचे। यमराज ने अपने बहीखातों में देखा और दोनों से कहा-यदि तुम दोनों अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो कह सकते हो। डाकू अत्यंत विनम्र शब्दों में बोला- महाराज! मैंने जीवनभर पाप कर्म किए हैं। मैं बहुत बड़ा अपराधी हूं। अत: आप जो दंड मेरे लिए तय करेंगे, मुझे स्वीकार होगा। डाकू के चुप होते ही साधु बोला- महाराज! मैंने आजीवन तपस्या और भक्ति की है। मैं कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चला। मैंने सदैव सत्कर्म ही किए हैं इसलिए आप कृपा कर मेरे लिए स्वर्ग के सुख-साधनों का प्रबंध करें। यमराज ने दोनों की इच्छा सुनी और डाकू से कहा- तुम्हें दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा करो। डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली। यमराज की यह आज्ञा सुनकर साधु ने आपत्ति करते हुए कहा- महाराज! इस पापी के स्पर्श से मैं अपवित्र हो जाऊंगा। मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य निर्थक हो जाएगा। यह सुनकर यमराज क्रोधित होते हुए बोले- निरपराध और भोले व्यक्तियों को लूटने और हत्या करने वाला तो इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है और एक तुम हो कि वर्षो की तपस्या के बाद भी अहंकारग्रस्त ही रहे और यह न जान सके कि सबमें एक ही आत्मतत्व समाया हुआ है। तुम्हारी तपस्या अधूरी है। अत: आज से तुम इस डाकू की सेवा करो।



 तीन विकल्प 



बहुत समय पहले की बात है , किसी गाँव में एक किसान रहता था, उस किसान की एक बहुत ही सुन्दर बेटी थी, दुर्भाग्यवश, गाँव के जमींदार से उसने बहुत सारा धन उधार लिया हुआ था।  जमीनदार बूढा और कुरूप था, किसान की सुंदर बेटी को देखकर उसने सोचा क्यूँ न कर्जे के बदले किसान के सामने उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रखा जाये। जमींदार किसान के पास गया और उसने कहा – तुम अपनी बेटी का विवाह मेरे साथ कर दो, बदले में मैं तुम्हारा सारा कर्ज माफ़ कर दूंगा, जमींदार की बात सुन कर किसान और किसान की बेटी के होश उड़ गए। तब जमींदार ने कहा –चलो गाँव की पंचायत के पास चलते हैं और जो निर्णय वे लेंगे उसे हम दोनों को ही मानना होगा, वो सब मिल कर पंचायत के पास गए और उन्हें सब कह सुनाया, उनकी बात सुन कर पंचायत ने थोडा सोच विचार किया और कहा- ये मामला बड़ा उलझा हुआ है अतः हम इसका फैसला किस्मत पर छोड़ते हैं। जमींदार सामने पड़े सफ़ेद और काले रोड़ों के ढेर से एक काला और एक सफ़ेद रोड़ा उठाकर एक थैले में रख देगा फिर लड़की बिना देखे उस थैले से एक रोड़ा उठाएगी, और उस आधार पर उसके पास तीन विकल्प होंगे।

1. अगर वो काला रोड़ा उठाती है तो उसे जमींदार से शादी करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्ज माफ़ कर दिया जायेगा।

2 अगर वो सफ़ेद पत्थर उठती है तो उसे जमींदार से शादी नहीं करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्ज भी माफ़ कर दिया जायेगा।

3 अगर लड़की पत्थर उठाने से मना करती है तो उसके पिता को जेल भेज दिया जायेगा।

पंचायत के आदेशानुसार जमींदार झुका और उसने दो रोड़े उठा लिए, जब वो रोड़ा उठा रहा था तो तब तेज आँखों वाली किसान की बेटी ने देखा कि उस जमींदार ने दोनों काले रोड़े ही उठाये हैं और उन्हें थैले में डाल दिया है।

लड़की इस स्थिति से घबराये बिना सोचने लगी कि वो क्या कर सकती है, उसे तीन रास्ते नज़र आये।

1. वह रोड़ा उठाने से मना कर दे और अपने पिता को जेल जाने दे।

2. सबको बता दे कि जमींदार दोनों काले पत्थर उठा कर सबको धोखा दे रहा हैं।

3. वह चुप रह कर काला पत्थर उठा ले और अपने पिता को कर्ज से बचाने के लिए जमींदार से शादी करके अपना जीवन बलिदान कर दे।

उसे लगा कि दूसरा तरीका सही है, पर तभी उसे एक और भी अच्छा उपाय सूझा , उसने थैले में अपना हाथ डाला और एक रोड़ा अपने हाथ में ले लिया और बिना रोड़े की और देखे उसके हाथ से फिसलने का नाटक किया, उसका रोड़ा अब हज़ारों रोड़ों के ढेर में गिर चुका था और उनमे ही कहीं खो चुका था ।

लड़की ने कहा – हे भगवान ! मैं कितनी फूहड़ हूँ, लेकिन कोई बात नहीं आप लोग थैले के अन्दर देख लीजिये कि कौन से रंग का रोड़ा बचा है, तब आपको पता चल जायेगा कि मैंने कौन सा उठाया था जो मेरे हाथ से गिर गया। थैले में बचा हुआ रोड़ा काला था , सब लोगों ने मान लिया कि लड़की ने सफ़ेद पत्थर ही उठाया  था, जमींदार के अन्दर इतना साहस नहीं था कि वो अपनी चोरी मान ले लड़की ने अपनी सोच से असम्भव को संभव कर दिया।



    

भारत भूमि को जीवन का पालन करने वाली माता के रूप में मानने के कारण उसकी मुक्ति के लिए की गई कोशिशों में स्वतन्त्रता आन्दोलन  में इस नारे का बार बार प्रयोग किया। भारत माता की वंदना करने वाली यह उक्ति हर उद्दघोष के साथ स्वाधीनता संग्राम के सिपाहियों में नए उत्साह का संचार करती थी।भारत को 'माता' कहकर संबोधित करने का श्रेय किरण चंद्र बनर्जी को जो की एक बंगला लेखक को भी जाता है। 1873 में इनके नाटक 'भारत-माता' में भारत के लिए 'माता' शब्द का प्रयोग किया गया था।आज़ादी से पहले बंगाल में दुर्गा पूजा लोगों को एकजुट करने और स्वराज (आजादी) पर चर्चा करने का एक माध्यम बनी हुई थी।



ससुराल 

अनिता काईला 



यह लेख तमाम उन लड़कियों के लिए है जिनको ये शिकायत है कि हमको ससुराल में बेटी नही समझा जाता।

पहले ये जानना जरूरी है कि बेटी थी तब क्या रोल था आपका घर में..आप आराम से उठती थी देर तक सोती रहती थी,खाना चाय नाश्ता सब मम्मी बना देती थी बाकी काम मेड करती थी कभी कभार आप घर के काम मे हाथ बंटाती थी।

अब बताएं कि आप की मम्मी भी यदि यही सोचती की मैं भी ससुराल में बेटी की तरह रहूंगी तो क्या आपको ये आराम मिलता शायद नहीं,शादी से पहले आप मां बाप की जिम्मेदारी है इसलिए वो आपकी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते है,शादी के बाद आपके ऊपर भी आपकी माँ की तरह जिम्मेदारी आती है तो आपको भी वो करना होगा जो माँ घर मे करती थी।हमने लोग अपनी शादी से पहले की ज़िंदगी खूब ऐश के साथ काटकर आते है अब जब हम पर जिम्मेदारी आयी तो घबराना क्यों,क्यों शिकायत करना ।

अब मुझे बताएं यदि आप पीहर आएं आपकी भाभी देर तक सोती रहे मम्मी रसोई में काम करें तो क्या आप उस भाभी की तारीफ करेंगी ??कभी नहीं आप मां से कहेंगी की आप क्यो रसोई में खटती है भाभी को करने दिया करो,कौन लड़की ऐसी है जो भाभी से ये कहे कि भाभी आप खूब आराम करो मम्मी सब कर लेगी??

अब एक बात जो वो कहती है कि हम सिर्फ सास ससुर पति और अपने बच्चों का करेंगे दूसरों का नही मतलब देवर ननद जेठ ...अब इसका मुझे जवाब दें कि आपके भाई की शादी पहले हो गयी और भाभी आ गयी वो सब का खाना बनाए और आपका नही तो क्या आप या आपके मां बाप को सहन होगा ,बिल्कुल नहीं...इसलिए यदि जो आप चाह रही है वो आपकी भाभी आपके साथ करे तो बुरा नही लगना चाहिए।आपको अपनी ननद उनके बच्चों का आना बुरा लगता है तो आप भी सोच लीजिये आप की भाभी भी आपके आने से खुश नही होगी।

कभी सोचा है आपने अपनी मां को घर मे पीहर की तरह महसूस करवाया है??यदि नही तो आप कैसे उम्मीद करती है कि आपको महसूस 

हो। क्या माँ ने कभी ये शिकायत की कि मुझे 



जल्दी उठना पड़ता था,काम करना पड़ता था,शायद कभी नहीं वो तो सर दर्द होने पर भी आप लोगो के लिए खाना बनाती थी।......हर जगह का अपना महत्व है ।इसलिए दोनों को महत्व दीजिये।जो लड़कियां समझती है वो तारीफ के काबिल हैं           साभार





कहाँ पर बोलना है,

और कहाँ पर बोल जाते हैं,

 जहाँ खामोश रहना है,

 वहाँ मुँह खोल जाते हैं..!!

कटा जब शीश सैनिक का,

तो हम खामोश रहते हैं,

 कटा एक सीन पिक्चर का,

  तो सारे बोल जाते हैं..!! 

नयी नस्लों के ये बच्चे,

 जमाने भर की सुनते हैं,

 मगर माँ बाप कुछ बोले,

  तो बच्चे बोल जाते हैं..!! 

बहुत ऊँची दुकानों में,

  कटाते जेब सब अपनी,

  मगर मज़दूर माँगेगा,

तो सिक्के बोल जाते हैं..!! 

अगर मखमल करे गलती,

तो कोई कुछ नहीँ कहता,

फटी चादर की गलती हो,

 तो सारे बोल जाते हैं..!! 

हवाओं की तबाही को,

सभी चुपचाप सहते हैं,

चिरागों से हुई गलती,

तो सारे बोल जाते हैं..!!

बनाते फिरते हैं रिश्ते,

जमाने भर से अक्सर हम,

मगर घर में जरूरत हो,

तो रिश्ते भूल जाते हैं..!! 

कहाँ पर बोलना है,

और कहाँ पर बोल जाते हैं,

जहाँ खामोश रहना है,

वहाँ मुँह खोल जाते हैं..!!


दिवाकर सिंह 

हमारे गुरुकुल

 विद्या सागर बघेल



इंग्लैंड में पहला स्कूल 1811 में खुला उस समय भारत में 7,32,000 गुरुकुल थे, आइए जानते हैं हमारे गुरुकुल कैसे बन्द हुए।हमारे सनातन संस्कृति परम्परा के गुरुकुल में क्या क्या पढाई होती थी, ये जान लेना पहले जरूरी है। 

 अग्नि विद्या (Metallurgy)  वायु विद्या (Flight)  जल विद्या (Navigation)  अंतरिक्ष विद्या (Space Science) 

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ये तो बात हुई वैज्ञानिक विद्याओं की, अब बात करते हैं व्यावसायिक और तकनीकी विद्या की ! 

 वाणिज्य (Commerce)  कृषि (Agriculture)  पशुपालन (Animal Husbandry)  पक्षिपलन (Bird Keeping)  पशु प्रशिक्षण (Animal Training)  यान यन्त्रकार (Mechanics)  रथकार (Vehicle Designing) 

 रतन्कार (Gems)  सुवर्णकार (Jewelry Designing)  वस्त्रकार (Textile)  कुम्भकार (Pottery)  लोहकार (Metallurgy)  तक्षक  रंगसाज (Dying)  खटवाकर  रज्जुकर (Logistics)  वास्तुकार (Architect)  पाकविद्या (Cooking)  सारथ्य (Driving)  नदी प्रबन्धक (Water Management)  सुचिकार (Data Entry)  गोशाला प्रबन्धक (Animal Husbandry)  उद्यान पाल (Horticulture)  वन पाल (Horticulture)  नापित (Paramedical)

जिस देश के गुरुकुल इतने समृद्ध हों उस देश को आखिर कैसे गुलाम बनाया गया होगा?* 

*मैकाले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी “देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था” को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह “अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था” लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे।*

*1850 तक इस देश में “7 लाख 32 हजार” गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे “7 लाख 50 हजार” मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में ‘Higher Learning Institute’ हुआ करते थे। उन सबमें 18 विषय पढ़ाए जाते थे और ये गुरुकुल समाज के लोग मिलके चलाते थे न कि राजा, महाराजा।* 

*अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W. Luther और दूसरा था Thomas Munro ! दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था। Luther, जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100% साक्षरता है।*

*मैकाले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है – “कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले उसे पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।” इस लिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया | जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज की तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया, उनमें आग लगा दी, उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा- पीटा, जेल में डाला।*

*गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी। इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया। उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था। इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी, ये तीनों गुलामी ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी देश में मौजूद हैं।*

*मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है वो, उसमें वो लिखता है कि “इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।”* 

*उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ साफ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, जबकि अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, हम तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, उस देश का कैसे कल्याण संभव है?*

*हमारी पुरानी शिक्षा पद्धति बहुत ही समृद्ध और विशाल थी और यही कारण था कि हम विश्वगुरु थे। हमारी शिक्षा पद्धति से पैसे कमाने वाले मशीन पैदा नहीं होते थे बल्कि मानवता के कल्याण हेतु अच्छे और विद्वान इंसान पैदा होते थे। आज तो जो बहुत पढ़ा लिखा है वही सबसे अधिक भ्रष्ट है, वही सबसे बड़ा चोर है।

*हमने अपना इतिहास गवां दिया है!*

*क्योंकि अंग्रेज हमसे हमारी पहचान छीनने में 



सफल हुए। उन्होंने हमारी शिक्षा पद्धति को बर्बाद कर के हमें अपनी संस्कृति, मूल धर्म, ज्ञान और समृद्धि से अलग कर दिया।*

आज जो स्कूलों और कॉलेजों का हाल है वो क्या ही लिखा जाए! हम न जाने ऐसे लोग कैसे 

पैदा कर रहें हैं जिनमें जिम्मेवारी का कोई एहसास नहीं है। जिन्हें सिर्फ़ पद और पैसों से प्यार है। हम इतने अससल कैसे होते जा रहें हैं? किसी भी समाज की स्थिति का अनुमान वहां के शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति से लगाया जा सकता है। आज हम इसमें बहुत असफल हैं। हमने स्कूल और कॉलेज तो बना लिए लेकिन जिस उद्देश्य के लिए इसका निर्माण हुआ उसकी पूर्ति के योग्य इंसान और सिस्टम नहीं बना पाए!

जब आप अपने देश का इतिहास पढ़ेंगे तो आप गर्व भी महसूस करेंगे और रोएंगे भी क्योंकि आपने जो गवां दिया है वो पैसों रुपयों से नहीं खरीदा जा सकता! हमें एक बड़े पुनर्जागरण की जरूरत है। सरकारें आएंगी जाएंगी, इनसे बहुत उम्मीद करना बेवकूफी होगी, जनता जब तक नहीं जागती हम अपनी विरासत को कभी पुनः हासिल नहीं कर पाएंगे! जागना होगा और कोई विकल्प नहीं |




निःस्वार्थ सेवा

अपनी 8 वर्षीय पुत्री को स्कूल से घर वापस लाने के लिए मैं स्कूल के गेट पर पहुंच गया था , जूनियर के.जी.के छात्र 10 मिनट बाद बाहर आना शुरू करते हैं , जबकि सीनियर छात्र 10 मिनट पहले | गेट पर अभिभावकों की भीड़ लगी थी | एकाएक तेज़ बारिश शुरु हो गई ! "सभी ने अपनी अपनी छतरी तान ली | मेरे बगल में एक सज्जन बिना छतरी के खड़े थे , मैंने शिष्टाचारवश उन्हें अपनी छतरी में ले लिया . गाड़ी से जल्दी जल्दी में आ गया छतरी नहीं ला सका ,, उन्होंने कहा . कोई बात नहीं ऐसा अकसर हो जाता है , मैंने कहा | जब उनका बेटा रेन कोट पहने निकला तो मैंने उन्हें छतरी से गाड़ी तक पहुंचा दिया . उन्होंने मुझे गौर से देखा और धन्यवाद कह कर चले गये | कल रात में नौ बजे पाटिल साहब का बेटा आया और बोला... अंकल बेबी (उसकी छ:माह की बेटी ) की तबीयत बहुत ख़राब है , उसे डाक्टर के पास ले चलना है . अंधेरी बरसाती रात में जब डाक्टर के यहां हम लोग पहुंचे तो दरबान गेट बंद कर रहा था .कम्पाऊंडर ने बताया कि डॉ. साहब लास्ट पेशेंट देख रहे हैं और अब उठने ही वाले हैं . अब सोमवार को ही अगला नम्बर लग पायेगा .मैं कम्पाऊंडर से आज ही दिखाने का आग्रह कर ही रहा था कि डाक्टर साहब चेम्बर से घर जाने के लिए बाहर आये . मुझे देखा तो ठिठक गये और फिर बोले - अरे ! आप आये हैं ? बोलिये भाई साहब - क्या बात है ? कहना नहीं होगा कि डाक्टर साहब वही सज्जन थे जिन्हें स्कूल में मैंने सिर्फ़ छतरी से गाड़ी तक पहुंचाया था . डाक्टर साहब ने बच्ची से मेरा रिश्ता पूछा . मेरे मित्र पाटिल साहब की बेटी है , हम लोग एक ही सोसायटी में रहते हैं , मैंने बताया .उन्होंने बच्ची को देखा . कागज़ पर दवा लिखी और कम्पाऊंडर को हिदायत दी - यह इंजेक्शन बच्ची को तुरंत लगा दो और दो तीन दिन की दवा अपने पास से दे दो , मैंने एतराज़ किया तो बोले -अब कहां इस बरसाती रात में आप दवा खोजते फिरेंगे सर ? कुछ तो अपना रंग मुझ पर भी चढ़ने दीजिये ! !! बहुत कहने पर भी डॉ. साहब ने ना फीस ली, ना दवा का दाम और अपने कम्पाउंडर से बोले -ये हमारे मित्र हैं, ये जब भी आयें तो इन्हें आने देना और वे हमें गाड़ी तक पहुंचाने आये |

निःस्वार्थ सेवा करते रहिये , शायद आपका रंग औरों पर भी चढ़ जाये ! निःस्वार्थ और निष्काम भाव से की गई छोटी सी सेवा भी कभी व्यर्थ नहीं जाती ! !


 आशीर्वाद 



घर के बड़े-बूढ़ों का अनुभव हमेशा हमारे काम आता है, इसीलिए वृद्ध लोगों का सम्मान करें |

एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार किसी राज्य में एक जवान व्यक्ति राजा बना। उसने मंत्रियों को आदेश दे दिया कि बूढ़े लोग हमारे किसी काम के नहीं हैं। ये हमेशा बीमार रहते हैं, कोई काम नहीं करते, इनकी वजह से राज्य का पैसा बर्बाद होता है। सभी बूढ़ों को मृत्यु दंड दे दो। जैसे ही ये आदेश राज्य के बूढ़ों को मालूम हुआ तो वे रातोंरात दूसरे राज्य में चले गए। एक गरीब लड़का अपने पिता से बहुत प्रेम करता था, उसके पास इतना धन भी नहीं था कि वह घर छोड़कर दूसरे राज्य जा सके। इसीलिए उसने अपने पिता को घर में ही छिपा लिया।

कुछ ही दिनों के बाद उस राज्य में अकाल पड़ गया। राजा को समझ नहीं आ रहा था कि अब प्रजा के खाने की व्यवस्था कैसे की जाए, उन दिनों भीषण गर्मी भी पड़ रही थी।

गरीब लड़के ने अपने बूढ़े पिता से अकाल से निपटने का उपाय पूछा। उसके पिता ने कहा कि राज्य से कुछ ही दूर ही हिमालय स्थित है। गर्मी से हिमालय की बर्फ पिघलने लगेगी और वह पानी उस राज्य की ओर बहता हुआ आएगा। वह पानी यहां आए इससे पहले तुम एक काम करो राज्य के मार्ग पर दोनों तरफ हल चला दो।  लड़के ने राज्य के लोगों को ये उपाय बताया, लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं मानी।

लड़के ने अकेले ही रास्ते पर दोनों तरफ हल चला दिया। जल्दी ही हिमालय का पानी राज्य के रास्ते पर आ गया। कुछ ही दिनों में राज्य की सड़कों पर अनाज के पौधे उग आए। जब ये बात राजा को मालूम हुई तो उस गरीब लड़के को दरबार में बुलवाया गया। राजा ने लड़के से पूछा कि ये अनाज उगाने का ये तरीका तुम्हें किसने बताया?

लड़के ने कहा कि महाराज ये उपाय मेरे पिताजी ने बताया था। आपने जब बूढ़ों को मारने का आदेश दिया था तो मैंने उन्हें अपने घर में उन्हें छिपा लिया था। ये सुनकर राजा ने उस बूढ़े व्यक्ति को भी दरबार में बुलवाया।

बूढ़े व्यक्ति ने राजा से कहा कि महाराज हमारे राज्य से लोग अपने खेतों से अनाज अपने घर ले जाते थे और कुछ लोग दूसरे राज्य अनाज बेचने जाते थे तो अनाज के कुछ दाने रास्ते के दोनों और गिर जाते थे। जब मेरे बेटे ने रास्ते की दोनों तरफ हल चलाया और हिमालय का पिघला हुआ पानी वहां पहुंचा तो वो दाने अंकूरित हो गए और अनाज उग आया। बूढ़े व्यक्ति की ये बात सुनकर राजा को अपने आदेश का बहुत पछतावा हुआ और राज्य से गए हुए सभी बूढ़े लोगों को वापस अपने राज्य में बुलवा लिया। 




मूल नक्षत्र विचार अगस्त - 2022 





दिनांक

शुरू 

दिनांक

समाप्त 

07

16-30

09

12-17

15

21-06

17

21-57

25

16-16

27

20-25


ग्रह स्थिति जुलाई - 2022

ग्रह स्थिति - दिनांक - 1 बुध सिंह में,दिनांक - 7 शुक्र कर्क में,दिनांक -8 मंगल वर्षभ में,दिनांक -17 सूर्य सिंह में,दिनांक - 21 बुध कन्या में,दिनांक - 31 शुक्र सिंह में |


चौघड़िया मुहूर्त 

चौघड़िया मुहूर्त देखकर कार्य या यात्रा करना उत्तम होता है। एक तिथि के लिये दिवस और रात्रि के आठ-आठ भाग का एक चौघड़िया निश्चित है। इस प्रकार से 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात मानें तो प्रत्येक में 90 मिनट यानि 1.30 घण्टे का एक चौघड़िया होता है जो सूर्योदय से प्रारंभ होता है|

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

 

पंचक विचार अगस्त - 2022  


पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा  पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है पंचक विचार- दिनांक 12 को 14 - 49 से दिनांक 16 से 21 - 06 बजे तक पंचक हैं |

 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

 

 

 

दिनांक 

भारतीय व्रत उत्सव अगस्त - 2022

1

विनायक चतुर्थी व्रत

2

नाग पंचमी 

वरुण  षष्टी,कलिक जयंती  

गो तुलसीदास जयंती ,शीतला सप्तमी 

श्री दुर्गा अष्टमी,मेला नयना देवी व चिंतपुरनी 

पवित्रा एकादशी व्रत 

भोम प्रदोष व्रत 

11 

सत्य व्रत,रक्षाबंधन 

12 

अमर नाथ यात्रा , गायत्री जयंती 

14  

कज्जली तीज 

15 

श्री गणेश  चतुर्थी व्रत,बहुला चौथ  

17  

हल छठ संक्रांति पुन्य 

18 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी  

19 

श्री कृष्ण जन्माष्टमी  

20 

गोगा नवमी ,नन्द महोत्सव ,मंगला गौरी पूजन 

23  

अजा एकादशी व्रत  

24  

वत्स द्वादशी ,प्रदोष व्रत 

25  

मास शिव रात्रि 

27 

शनिचरी अमावस्या 

30 

हरितालिका तीज ,वराह जयंती ,

31 

श्री गणेश जन्मौत्स्व ,कलंक चतुर्थी ,सिद्धि विनायक व्रत 



 

 

 

भद्रा विचार अगस्त - 2022 

 

भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार - भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना, स्नान करना, अस्त्र शस्त्र का प्रयोग, ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना, अग्नि लगाना, किसी वस्तु को काटना,घोड़ा ऊंट संबंधी कार्य, प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि  शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अति आवश्यक कार्य भूलोक की भद्रा ,भद्रा मुख चोट क्र भद्रा पंच में शुभ कार्य कर सकते है |


अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

दिनांक 

शुरू 

दिनांक 

समाप्त 

01

16-49

02

05-13

05

05-06

05

16-36

08

10-29

08

21-00

11

10-38

11

20-32

15

09-43

15

21-02

17

20-24

18

08-47

21

14-21

22

03-36

25

10-38

25

23-31

31

03-28

31

15-23



अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

राहू काल 

 

 राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |




सर्वार्थ सिद्धि योग अगस्त -2022

दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी  शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु  को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक  है| अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227


दिनांक

प्रारंभ

दिनांक

समाप्त

03

05-48

03

18-23

14

21-55

15

05-54

16

21-06

17

05-55

20

05-56

21

04-39

22

05-57

22

07-40

25

05-59

25

16-16

28

21-56

29

06-01


सुर्य उदय- सुर्य अस्त अगस्त -2022 


दिनांक

उदय 

दिनांक

अस्त 

05-43

1

19-09

5

05-46

5

19-06

10

05-48

10

19-02

15

05-51

15

18-57

20

05-54

20

18-52

25

05-56

25

18-47

30

05-59

30

18-42


 

 

सेवया (जवे)  की खीर 

 

सेवया (जवे)  की खीर बनाने की सामग्री -

रोस्टेड सेवेया एक कप ,१/2 लीटर दूध,काजू बादाम,पिस्ता,छोटी इलाइची पावडर,दो चम्चच कस्टर्ड पावडर,किसमिस,नारियल पावडर,एक चमच्च देसी घी,चीनी स्वाद अनुसार |

सेवया (जवे)  की खीर बनाने की विधि -

काढ़ाइ को गैस पर हल्की आंच पर रख कर उसमे एक चमच्च घी डाले ,  सेवया डाल कर भुने हल्के लाल होने पर दूध उबाल कर डाले अब इसे चलाते हुए पकाए एक उबाल आने पर दूध में मिला कस्टर्ड पावडर ( ढंठे दुथ में घोल कर ) डाले इलाइची पावडर व केसर डाले,इसे पकाए चीनी डाल कर दो तीन उबाल आने पर गैस बंद कर दे | उपर से काजू बादाम किसमिस पिस्ता के छोटे छोटे टुकडे कर डाले व सर्व करे | तैयार है स्वादिष्ट सेवाया की खीर |

मिथलेश शर्मा 

कृष्ण जन्माष्टमी की पूजन विधि व मन्त्र 

द्वापर युग में श्री कृष्ण ने भाद्रपद मास की आश्त्मी क्रष्ण पक्छ, रोहिणी नक्षत्र में जन्म लिया था

कृष्ण जन्माष्टमी की पूजन विधि -  को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराएं और उन्हें नए वस्त्र पहनाकर उनका सुंदर श्रृंगार करें। श्रृंगार करने के बाद कान्हा को अष्टगंध चन्दन, अक्षत और रोली का तिलक लगाएं. माखन मिश्री और अन्य भोग सामग्री अर्पण करें.बाल गोपाल को धूप, दीप दिखाएं।कृष्ण जी पूजा में गंगाजल और तुलसी के पत्ते अवश्य उपयोग करे |जन्माष्टमी पर पूजा के दौरान भगवान श्री कृष्ण को परिजात के फूल चढ़ाएं तथा जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण जी को चांदी की बांसुरी अर्पित करें | शंख में दूध भरकर कान्हा जी जी को अर्पित करें. इससे मां लक्ष्मी जी और भगवान कृष्ण जी का आशीर्वाद प्राप्त होगा. मान्यता है कि ऐसा करने से आपकी हर मनोकामना पूर्ण होगी. श्री कृष्ण के विशेष मंत्रों का जाप करें. विसर्जन के लिए हाथ में फूल और चावल लेकर चौकी पर छोड़ें और प्रधना करे |

भगवान क्रष्ण के मन्त्र .-

गोकुल नाथाय नमः - आठ अक्षरों वाले इस श्रीकृष्णमंत्र का जो भी मानव जपता  है उसकी सभी इच्छाएं व अभिलाषाएं पूर्ण होती हैं। इच्छा धन से संबंधित हो, भौतिक सुखों से संबंधित हो या किसी भी निजी कामना को पूरा करने के लिए हो। इस मंत्र का सही उच्चारण करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। “ॐ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय”- इस  मंत्र के जाप से  सभी सुख एवं संपदा से प्राप्त होती है | यह ऐसा मंत्र है जो विवाह से जुड़ा है। जो साधक प्रेम विवाह करना चाहते हैं लेकिन किन्हीं कारणों से हो नहीं रहा तो वे प्रात: काल में स्नान के बाद इस मंत्र का 108 बार जाप करें। कुछ ही दिनों में उन्हें मन मुताबिक  फल प्राप्त होगा।“कृं कृष्णाय नमः” - श्रीकृष्ण का मूलमंत्र है जिसके प्रयोग से व्यक्ति का अटका हुआ धन प्राप्त होता है। इसके अलावा इस मूलमंत्र का जाप करने से घर-परिवार में सुख व दन धन्य की प्राप्ति होती है



रक्षाबंधन 

एक बार जब भगवान विष्णु के पाताल लोक चले गये तब  माता लक्ष्मी और सभी देवता बहुत चिंतित हुए।नारदजी ने लक्ष्मी जी को एक उपाय बताया। माता लक्ष्मी ने  गरीब स्त्री के वेश धर कर  पाताल लोक  गयी और राजा बलि को राखी बांधी व राजा बलि से भगवान विष्णु को वहां से वापस ले जाने का वचन मांगा। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी। तभी से रक्षाबंधन मनया जाता है। वैसे अनादी काल से रक्षा सूत्र बंधने की परम्परा है | पुरोहित यजमान को रक्षा सूत्र बांध कर धर्म की रक्षा करने का संकल्प कराते थे  |

राखी वीरों वाली

राखी वीरों वाली

पहन के वर्दी सैनिक की,

गुजार दी सारी जिंदगी,

सर्दी गर्मी बरसात धूप,

में काट दी सारी जिंदगी।

हम चैन से घर पे सोते रहे,

तुम खड़े जागते सीमा पर ,

ये देश सदा माफूज रहे,

सर वार दिए तलवारों पर |

यारों की छूट गई टोली,

खेल खिलौने बमगोली,

त्योहारो में खूँ की होली,

अब दुश्मन तेरे हमजोली |

तेरा देश ही परिवार है,

तू देश का पहरेदार है ,

कलाई पर सजा लेना,

ये राखी नही तलवार है।

तू भी तो मेरे जैसा है,

तुझे दिल से मेरा वंदन है,

तू रहे सलामत हर जंग में,

तुम्हे भेजा रक्षा बंधन है।


मौत से जंग तू लड़ता है,

मरने से तू डरता ही नहीं ,

बाते चाहे कितनी कर लें,

पर तेरे जैसा कोई नहीं ।

पर तेरे जैसा कोई नहीं ।

पर तेरे जैसा कोई नहीं |

सुनील अग्रहरि


एहलकॉन इंटरनेशनल स्कूल 

दिल्ली










नाड़ी शोधन 


नाड़ी शोधन प्राणायाम को बहुत ही सरल माना जाता है और हर प्राणायाम की शुरुआत से पहले नाड़ी शोधन प्राणायाम किया जाता है  | इसको करने के लिए सबसे अच्छा समय प्रातः काल को माना जाता है | इससे नाड़ियों की शुद्धि होती है और उन्हें मजबूती मिलती है |

नाड़ी शोधन प्राणायाम करने की विधि - इसको करने के लिए आप सुखासन में बैठ जाएं और अपने मित्रों को खुला रखें आप अपनी बाईं नासिका को बंद कर के बाईं नासिका से सांस को अंदर खींचें और उसे नाभि चक्र तक ले जाएं आप महसूस करें कि खींचा हुआ आप  को स्पर्श कर रहा है फिर आप इसे अपने भीतर रोकने का प्रयास करें | आप जिस नासिका से सांस खींचा था उसी नासिका से सांस को बाहर निकाले इस क्रिया को दो तीन बार करें | बाएं नासिका से  इसी क्रिया को करे | उसके बाद दोनों नासिका से गहरा लंबा सांस लें और थोड़ी देर रोक कर छोड़ दें | 

नाड़ी शोधन प्राणायाम करने से लाभ - ये  आपकी श्वसन प्रणाली को मजबूत करता है  और आपको साँस से होने वाली हर तरह की समस्या से निजात दिलाता है | इसको करने से आपके मन को शांति मिलती है | और आप सारा दिन ताजा और तनावमुक्त महसूस करती/करते  हैं |


पुत्रदा एकादशी कथा 


पुत्रदा एकादशी - यह एकादशी श्रावण मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को कहा बनाई जाती है इस दिन भगवान विष्णु के नाम पर व्रत रखकर पूजा की जाती है। इसके पश्चात ब्राह्मणों को भोजन करा कर दान देकर आशीर्वाद देना चाहिए। सारा दिन भगवान की वंदना कीर्तन कर और रात में भगवान को मूर्ति के पास ही जागरण करना चाहिए। इस व्रत को करने वाले निसंतान व्यक्ति को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

 पुत्रदा एकादशी की कथा - एक समय की बात है महिष्मती नगर में महिजीत नाम का राजा राज करता था।  वह बड़ा ही धर्मात्मा शांतिप्रिय और दानी था । परंतु उसके कोई संतान नहीं थी यही सोच सोच कर राजा बहुत ही दुखी रहता था। एक बार राजा ने अपने राज्य के समस्त ऋषिओ और महात्माऔ को बुलाया और संतान प्राप्त करने के उपाय पूछे इस पर परम ज्ञानी लोमस ऋषि ने बताया कि आपने पिछले जन्म में सावन मास की एकादशी को अपने तालाब से प्यासी गाय को पानी नहीं पीने दिया था और उसे हटा दिया था। उसके श्राप  के कारण आपके कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई है। इसलिए आप सावन मास की पुत्रदा एकादशी का व्रत नियम पूर्वक व्रत रखें तथा रात्रि जागरण कीजिए आपको पुत्र अवश्य प्राप्त होगा।  ऋषि की आज्ञा अनुसार राजा ने एकादशी का व्रत किया जिससे उसे पुत्र की प्राप्ति हुई|



अजा ( प्रबोधिनी ) एकादशी

अजा ( प्रबोधिनी ) एकादशी -  अजा (प्रबोधिनी) एकादशी भाद्रपद मास में पक्ष की एकादशी को कहते हैं। इस एकादशी को और भी कई नामों से पुकारा जाता है जैसे प्रबोधिनी, जया, दामिनी अजा, इस दिन विष्णु भगवान की उपासना कर रात में जागरण करना चाहिए व्रत के करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

 अजा एकादशी की कथा - एक बार सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के सपने में ऋषि विश्वामित्र को अपना राज्य दान कर दिया। अगले दिन ऋषि विश्वामित्र दरबार में गए तो राजा ने सचमुच में अपना सारा राजपाट सौंप दिया। ऋषि ने अपनी दक्षिणा की 500 स्वर्ण मुद्राएं और मांगी दक्षिणा चुकाने के लिए राजा को अपनी पत्नी पुत्र और खुद को बेचना पड़ा। राजा हरिश्चंद्र को डोम ने खरीदा था। उसने हरिश्चंद्र को श्मशान में नियुक्त किया और उन्हें यह कार्य सौंपा कि वह मृतकों के संबंधियों से कर ले कर अंतिम संस्कार करने दे। उन्हें यह कार्य करते हुए जब अधिक वर्ष बीत गए तब अचानक ही उनकी भेंट गौतम ऋषि से हुई राजा ने गौतम ऋषि को अपनी सारी आपबीती सुनाई तब उन्हें इसी अजा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। राजा ने यह व्रत कथा करना आरंभ कर दिया इसी बीच उसके पुत्र रोहतास को सर्प के डसने के कारण स्वर्गवास हो गया। जब उनकी पत्नी अपने पुत्र का अंतिम संस्कार करने हेतु शमशान पर अपने पुत्र कि लाश का वहाँ लेकर आई तो राजा हरिश्चंद्र ने उसे श्मशान का कर मांगा। परंतु उसके पास शमशान का कर्ज चुकाने के लिए कुछ भी नहीं था। उसने अपनी चुनरी का आधा भाग देकर शमशान का कर्ज चुकाया। तत्काल आकाश में बिजली चमकी प्रभु ने प्रकट होकर बोले "महाराज! तुमने सत्य को जीवन में धारण करके उच्चतम आदर्श प्रस्तुत किया है।  अतः तुम्हारी कर्तव्यनिष्ठा धन्य है। तुम इतिहास में सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के नाम से अमर रहोगे।  भागवत कृपा से रोहित जीवित हो गया। तीनों प्राणी चिरकाल तक सुख भोगकर अन्त मे स्वर्ग को चले गए। 



शनि अमावस्या का महत्व 

ज्योतिष शास्त्र में मुहूर्त आदि की जो व्यवस्था है उसका रहस्य इतना ही है कि अंतरिक्ष में स्थित ग्रह नक्षत्रों का अमृत-विष व उदय गुण वाली रशिमयो का प्रभाव सदैव एक समान नहीं रहता है | यह पूरा विश्व 30 सप्ताह के संकल्प मात्र से अस्तित्व में आया है उसी की इच्छा अनुसार नवग्रहों के ऊपर इस विश्व जिस सता के संकल्प मात्र से असितत्व में आया है उसी की इक्छा अनुसार नवग्रहों के उपर इस विश्व के समस्त जड़ चेतन को नियंत्रित व अनुशासित करते रहने का भार भी है | मानव समेत समस्त प्राणियों को मिलने वाले सुख-दुख ग्रहों के द्वारा ही प्रदान किए जाते हैं | यह बात अलग है कि किसी भी प्राणी को मिलने वाले सुख-दुख के मूल में उस प्राणी के किय गये कर्म ही होते हैं | शनि  एक ऐसा ग्रह है जिसका मानव पर परस्पर विरोधी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है | अगर शनि अनुकूल होता है तो व्यक्ति को धन वैभव से भर देता है | और प्रतिकूल होने पर वह कष्टों को देता है | कहते हैं ना भगवान जब देते हैं तो छप्पर फाड़ कर देते हैं चाहे वह दुख हो चाहे सुख | शनि की अनुकूल दशा में साधक को स्मरण शक्ति,धन,वैभव व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है | गलत कर्मों में शामिल होने के फलस्वरूप उसे निंदा का पात्र बनना पड़ता है | उसे हर वक्त बीमारी व अपमान का सामना करना पड़ता है | याद रखें शनि के कोप का भाजन वही लोग होते हैं जो गलत काम करते हैं | शनि के दोष व कोप की शांति का  दिन ही शनिचरी अमावस्या है अधिक जानकारी के लिए फोन करें - शर्मा जी  - 9312002527

उत्तराखण्ड में जलस्रोत व जल-प्रबन्धन 

- डॉ. मोहन चंद तिवारी

भारत के लगभग 5 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल में स्थित उत्तर पश्चिम से उत्तर पूर्व तक फैली हिमालय की पर्वत शृंखलाएं न केवल प्राकृतिक संसाधनों जैसे जल, वनस्पति‚ वन्यजीव, खनिज पदार्थ जड़ी-बूटियों का विशाल भंडार हैं, बल्कि देश में होने वाली मानसूनी वर्षा तथा तथा विभिन्न ऋतुओं के मौसम को नियंत्रित करने में भी इनकी अहम भूमिका है. हिमालय पर्वत से प्रवाहित होने वाली नदियों एवं वहां के ग्लेशियरों से पिघलने वाले जलस्रोतों के द्वारा ही उत्तराखण्ड हिमालय के निवासियों की जलापूर्ति होती आई है. जनसंख्या की वृद्धि तथा समूचे क्षेत्र में अन्धाधुंध विकास की योजनाओं के कारण भी स्वतः स्फूर्त होने वाले हिमालय के ये प्राकृतिक जलस्रोत सूखते जा रहे हैं तथा भूगर्भीय जलस्तर में भी गिरावट आ रही है. पर्यावरण सम्बन्धी इसी पारिस्थितिकी के कारण देश के अन्य प्रान्तों की भांति उत्तराखण्ड क्षेत्र भी आज एक भीषण जलसंकट के दौर से गुजर रहा है | स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले कुमाऊँ तथा गढ़वाल दोनों कमिश्नरियों में समूचे जलप्रबन्धन तथा जलसंचयन की व्यवस्था ग्राम पंचायतों की सामुदायिक भागीदारी से संचालित होती थी. पेयजल का प्रबन्धन हो या सिंचाई आदि की व्यवस्था करना अथवा कुएं तालाबों,नहरों का निर्माण करना जलप्रबन्धन के ये सभी कार्य स्थानीय जनता की भागीदारी से किए जाते थे. किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अन्य प्रान्तों की भांति उत्तराखण्ड में भी सामुदायिक जल-वितरण और प्रबन्धन का दायित्व राज्य सरकारों के द्वारा निर्वाहित किया जाने लगा. जलप्रबन्धन के केन्द्रीकरण के कारण ग्राम पंचायतों एवं सामुदायिक भागीदारी की गतिविधियों में कमी आने लगी जिसके परिणामस्वरूप उत्तराखण्ड की जलसमस्या दिन प्रतिदिन गम्भीर होती गई |

उत्तराखण्ड में जल समस्या के निदान तथा उसके समाधान हेतु वर्त्तमान उत्तराखण्ड के जलस्रोतों के सम्बन्ध में किए गए आधुनिक शोधपूर्ण अनुसन्धानों के निष्कर्षों की जानकारी भी आवश्यक है ताकि इस दिशा में जल संकट की समस्या का समुपचित रूप से समाधान निकाला जा सके | उत्तराखण्ड से सम्बन्धित एक जलवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार उत्तराखण्ड हिमालय में जलवैज्ञानिक पारिस्थिकी को प्रभावित करने वाले निकायों में इस समय 8 जल-प्रस्रवण संस्थान (कैचमैंट)‚ 26 जलविभाजक संस्थान (वाटर शैड)‚ 116 उप जल- विभाजक संस्थान (सब-वाटर शैड), 1‚120 सूक्ष्मजल विभाजक संस्थान (माइक्रो-वाटरशैड) सक्रिय हैं | हमारे उत्तराखंड की एक खासियत यह भी है कि समय समय पर  जलवैज्ञानिकों के द्वारा जो सिफारिशें की जातीं हैं, उन पर सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा कभी कार्यान्वयन नहीं किया जाता है. यही सबसे बड़ी विडंबना है,उत्तराखंड के जल प्रबंधन की | वनों की अंधाधुन्ध कटाई तथा पक्की सड़कों के निर्माण के कारण उत्तराखण्ड के पारम्परिक जलस्रोत आज सूखते जा रहे हैं. अल्मोडा जिले के अन्तर्गत द्वाराहाट नामक शहर में सन् 1900 में 360 नौलों के द्वारा नगरवासी जलापूर्ति करते थे परन्तु वर्त्तमान में वे अधिकांश रूप से जलविहीन हो चुके हैं.इसी प्रकर नैनीताल जिले में गौला नदी से संचालित रहने वाले 46 प्रतिशत जलस्रोत सूख चुके हैं तथा 60 प्रतिशत स्रोत वर्षा ऋतु में ही सक्रिय रह पाते हैं.

डॉ. के.एस.बल्दिया और एस.के.बर्तया के उत्तराखण्ड के जलस्रोतों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि परम्परागत जलस्रोतों में पानी की कमी होने का मुख्य कारण जंगलों का कटान है. इसी सन्दर्भ में 1952-53 और 1984-85 के मध्य जलागम क्षेत्र के जंगलों में 69.6 प्रतिशत से 56.8 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई. इससे भी महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि 1956 से 1986 के मध्य जलागम क्षेत्र भीमताल में वर्षा में 33 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई परन्तु स्रोतों के पानी में 25 से 75 प्रतिशत की कमी देखी गई जिसके कारण क्षेत्र के 40 प्रतिशत गांव जलापूर्ति की दृष्टि से प्रभावित हुए. कुछ स्रोत तो पूरी तरह से सूख गए |

कुमाऊँ के 60 जल स्रोतों के अध्ययन से भी यह तथ्य सामने आया है कि 10 स्रोतों (17 प्रतिशत) में जलप्रवाह पूरी तरह से समाप्त हो गया था जबकि 18 स्रोतों (30 प्रतिशत) में जलप्रवाह मौसमी हो गया तथा शेष 32 स्रोतों (53 प्रतिशत) में जल के प्रवाह की गति मन्द पड़ गई थी.इसका मुख्य कारण यह था कि क्षेत्र के बांज के जंगल बड़े पैमाने पर नष्ट हो गए थे |

कुमाऊँ विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा परिसर में डॉ. जे.एस.रावत केद्वारा उत्तराखण्ड में किए गए जलस्रोत सम्बन्धी अध्ययन से ज्ञात होता है कि अल्मोड़ा की कोसी नदी में पानी का बहाव 1992 में 800 मीटर लीटर प्रति सैकिन्ड से घटकर सन् 2004 में 196 लीटर प्रति सैकिन्ड रह गया. इस अध्ययन से यह भी संकेत मिला कि ऊपरी ढलानों के जंगलों में वर्षा के द्वारा भूमिगत जल में 31 प्रतिशत की वृद्धि होती है. बांज के जंगलों से भूजल संग्रहण में 23 प्रतिशत‚ चीड से 16 प्रतिशत‚ खेतों की हरियाली से 13 प्रतिशत‚ बंजर भूमि से 5 प्रतिशत और शहरी भूमि से केवल 2 प्रतिशत की मात्र में भूमिगत जल की वृद्धि हो पाती है.डॉ.रावत की सिफारिश है कि उत्तराखण्ड क्षेत्र में भूमिगत जल की वृद्धि हेतु पर्वत के शिखर से ढलान की तरफ 1000 से 1500 मीटर तक सघन रूप से मिश्रित वनों का निर्माण होना चाहिए.

पूरे राज्य में जलागम क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने के लिए ऊपरी ढलानों पर चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों को लगाने के साथ बड़े पैमाने पर वनीकरण किया जाना बहुत जरूरी है.चीड़ के पेड़ों का वैज्ञानिक आधार पर कटान कर उनके स्थान पर चौड़ी पत्ती वाले पेड़ लगाए जाने चाहिए. साथ ही जंगल में वर्षा जल के संचयन के लिए नालियां भी खोदी जानी चाहिए और रिसाव रोकने के उपाय किये जाने चाहिए | परम्परागत जल संचयन के ढांचों और उनके जलागम क्षेत्र को बहाल करने से ही भूमिगत जल को ऊपर उठाया जा सकता है. पर हमारे उत्तराखंड की एक खासियत यह भी है कि समय समय पर  जलवैज्ञानिकों के द्वारा जो सिफारिशें की जातीं हैं, उन पर सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा उनपर कभी कार्यान्वयन नहीं किया जाता है.यही सबसे बड़ी विडंबना है,उत्तराखंड के जल प्रबंधन की | पिछले वर्ष के बजट में हर घर में पानी पहुंचाने के अभियान के तहत धनराशि आवंटित करने की घोषणा भी कर दी गई थी. पर उत्तराखंड को केंद्र सरकार के इस जल शक्ति अभियान से क्या लाभ मिला? इसकी खबर न तो यहां के नेताओं को है और न यहां की जनता को. हालांकि पिछले कई वर्षों से कुमाऊं हो या गढ़वाल पानी की गम्भीर समस्या से लोग आक्रोशित रहे हैं | पिछले वर्ष 8 जुलाई,2019 को ‘डाउन टू अर्थ’ में त्रिलोचन भट्ट ने अपने एक लेख में यह महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है कि उत्तराखंड जल संस्थान की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्त्तमान में उत्तराखंड राज्य के 500 जलस्रोत सूखने की कगार पर हैं. इसके बावजूद केंद्रीय सरकार और उत्तराखंड की राज्य सरकार अपने राज्य की जलप्रबंधन व्यवस्था को सुधारने की दृष्टि से बेखबर और उदासीन हैं और जलस्रोतों को नष्ट करने वाले सड़क चौड़ीकरण के प्रोजेक्टों को ज्यादा अहमियत देने में लगी है |

भारत सरकार की भी उत्तराखंड के प्रति जलनीति भी अन्य हिमालयीय राज्यों की तुलना में भेदभाव पूर्ण लगती है. केन्द्र सरकार द्वारा देशभर के 256 जिलों को सबसे ज्यादा जल संकट वाले मानते हुए पिछले सालों में 1 जुलाई से 15 सितम्बर, 2019 तक इन संकटग्रस्त जिलों में जलशक्ति अभियान शुरू किया गया. इस अभियान के तहत हर जिले के सचिव अथवा अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकारी की देखरेख में एक टीम बनाकर जिलेके संकटग्रस्त ब्लॉकों में जाकर पानी की स्थिति का अध्ययन करना और वहां के हालात सुधारने की दिशा में काम करना था | पिछले वर्ष के बजट में हर घर में पानी पहुंचाने के अभियान के तहत धनराशि आवंटित करने की घोषणा भी कर दी गई थी. पर उत्तराखंड को केंद्र सरकार के इस जल शक्ति अभियान से क्या लाभ मिला? इसकी खबर न तो यहां के नेताओं को है और न यहां की जनता को. हालांकि पिछले कई वर्षों से कुमाऊं हो या गढ़वाल पानी की गम्भीर समस्या से लोग आक्रोशित रहे हैं. किन्तु राज्य प्रशासन जल संकट का आज तक कोई संतोषजनक समाधान नहीं निकाल पाया है |

दरअसल, देश के हिमालयी राज्यों में पेयजल की स्थिति लगातार खराब होती रही है. अनेक गैर सरकारी संगठनों की रिपोर्टों के साथ स्वयं भारत सरकार की नीति आयोग की रिपोर्ट भी इस तरफ संकेत करती है. पर हिमालय में गम्भीर जलसंकट की स्थिति के बावजूद भी जल शक्ति अभियान में हिमालयी राज्यों के मात्र 13 जिलों को ही शामिल किया गया है. इनमें हिमाचल प्रदेश के चार जिले शामिल किए गए हैं, जबकि उत्तराखंड की आबादी हिमालय प्रदेश के मुकाबले अधिक होने और हिमाचल प्रदेश के मुकाबले जलसंकट भी गम्भीर होने के बावजूद भी उसके एक ही जिले नैनीताल को ही भारत सरकार के इस जलशक्ति अभियान से जोड़ा गया | हिमनदियों-गिरिस्रोतों का उद्गम स्थल उत्तराखंड झेल रहा है भीषण जल संकट

राज्य के जलसंकट के समाधान के लिए कमसे कम इस अभियान में उत्तराखंड के पांच संकट ग्रस्त जिलों को शामिल किए जाने की आवश्यकता थी. जबकि स्वयं नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में पिछले 300 वर्षों में 150 जलस्रोत सूख गये हैं. पर हाल ही में एक दो महीने पहले एक संतोषजनक खबर यह मिली है कि ‘राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन’ के 50 वैज्ञानिकों के सहयोग से उत्तराखंड के चार जल स्रोतों को नया जीवन मिलने की उम्मीद जगी है. (अमर उजाला,17 नवंबर,2020) उत्तराखंड जल संस्थान, टेरी स्कूल ऑफ एडवांस साइंसेज, टेरी इंस्टीट्यूट और डीएवी पीजी कॉलेज के 50 वैज्ञानिकों की टीम ने जिन चार  क्षेत्रों के स्रोतों का जल वैज्ञानिक अध्ययन किया है,वे हैं – मसूरी के सेलूखेत, प्रतापनगर, कर्णप्रयाग और चंबा के जलस्रोत. इस प्रोजेक्ट के मुख्य अन्वेषक डॉ. प्रशांत सिंह ने बताया कि उत्तराखंड में 1150 सूखे जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया जा रहा है.इन जलस्रोतों का जल स्तर गिरने की वजह से पूरे प्रदेश में आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हो रही है. अब तक वैज्ञानिकों द्वारा इनका सर्वे, जियोफिजिकल इनवेस्टिगेशन, मिट्टी का टेस्ट हो चुका है. पानी की गुणवत्ता की जांच भी की जा चुकी है. इसके साथ ही जीआईएस रिमोट सेंसिंग की मदद से पूरा विश्लेषण किया गया है | हजारों वर्षों से चली आ रही जल संरक्षण से जुड़ी परंपरागत तकनीक और उपेक्षित पड़े पारंपरिक जल संसाधनों को सहेजने-समेटने और उन्हें पुनर्जीवित करने की चिंता न जलवैज्ञानिकों को है और न राज्य प्रशासन को |

अभी तक के उत्तराखंड राज्य के जलस्रोतों के जलप्रबंधन से जुड़े जो अधुनातन नए तथ्य सामने आए हैं, उनके अनुसार राज्य के 330 जलस्रोतों के बहाव में 50 प्रतिशत की कमी आ चुकी है. कुल 1229 स्प्रिंग स्रोतों के जल स्तर पर पर्यावरणीय व अन्य कारकों का असर पड़ रहा है | विडम्बना यह भी है कि पहाड़ों पर पानी उपलब्ध कराने के लिए सरकार और आधुनिक जलवैज्ञानिक भारी भरकम बजट वाली बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को ही ज्यादा तरज़ीह देने में लगे हैं,किन्तु उससे राज्य की जल समस्या को हल करने में कोई मदद मिली हो, उसका कोई ठोस परिणाम अभी तक सामने नहीं आया. दूसरी ओर हजारों वर्षों से चली आ रही जल संरक्षण से जुड़ी परंपरागत तकनीक और उपेक्षित पड़े पारंपरिक जल संसाधनों को सहेजने-समेटने और उन्हें पुनर्जीवित करने की चिंता न जलवैज्ञानिकों को है और न राज्य प्रशासन को. इन सब परेशानियों और कठिनाइयों के बावजूद भी अनेक जल पुरुष और जल नारियां तथा पर्यावरणवादी संगठन उत्तराखंड में नौलों, धारों और जलस्रोतों के संरक्षण की मुहिम युध्दस्तर पर चलाए हुए हैं। संकट में है उत्तराखण्ड जलप्रबन्धन के पारम्परिक जलस्रोतों का अस्तित्व उत्तराखंड के जल वैज्ञानिक डॉ. ए.एस. रावत तथा रितेश शाह ने ‘इन्डियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नौलिज’ (भाग 8 (2‚ अप्रैल 2009, पृ. 249-254) में प्रकाशित एक लेख‘ ट्रेडिशनल नॉलिज ऑफ वाटर मैनेजमेंट इन कुमाऊँ हिमालय’ में उत्तराखण्ड के परम्परागत जलसंचयन संस्थानों पर जलवैज्ञानिक दृष्टि से प्रकाश डालते हुए, इन जलनिकायों को उत्तराखण्ड के परम्परागत ‘वाटर हारवेस्टिंग’ प्रणालियों की संज्ञा दी है. स्थानीय भाषा में इन जल प्रणालियों के परंपरागत नाम हैं- गूल‚ नौला‚धारा‚ कुण्ड, खाल‚ सिमार‚ गजार इत्यादि.उत्तराखण्ड के जल प्रबन्धन के सांस्कृतिक स्वरूप को जानने के लिए ‘पीपल्स साइन्स इन्स्टिट्यूट’‚ देहारादून से प्रकाशित डॉ.रवि चोपड़ा की लघु पुस्तिका ‘जल संस्कृति ए वाटर हारवेस्टिंग कल्चर’ भी उल्लेखनीय है | इस पुस्तिका में लेखक ने उत्तराखण्ड के लोक प्रचलित ‘वाटर हारवैस्टिंग’ प्रणालियों जैसे -चाल, खाल, नौला‚ धारा‚ गुल‚ घराट आदि से सम्बन्धित ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक चित्र प्रस्तुत किए हैं जो इस तथ्य का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि जल की आपूर्ति करने वाले जल निकायों के प्रति उत्तराखण्ड के धरती पुत्रों का मात्र एक उपभोक्तावादी दृष्टिकोण नहीं था बल्कि गूढ धार्मिक‚ सांस्कृतिक तथा सामाजिक सन्निवेश के रूप में इनकी स्थापना की गई थी. इन नौलों के माध्यम से अत्यन्त उत्कृष्ट स्तर की स्थापत्यकला और वास्तुकला को भी संरक्षण दिया गया था. भारतीय परम्परा के अनुसार जलाशय के निकट ही देवमन्दिर तथा देवप्रतिमाओं का भी निर्माण किया गया था ताकि उनकी पवित्रता बनी रहे | उत्तराखण्ड के अधिकांश वानिकी क्षेत्र नदियों के संवेदनशील प्रवाह क्षेत्र की सीमा के अन्तर्गत स्थित हैं. ये वानिकी क्षेत्र न केवल उत्तराखण्ड हिमालय की जैव-विविधता (बायो-डाइवरसिटी) का संवर्धन करते हैं बल्कि समूचे उत्तराखण्ड की पर्यावरण पारिस्थितिकी‚जलवायु परिवर्तन तथा ग्लेशियरों से उत्पन्न होने वाले नदीस्रोतों के भी नियामक हैं.उत्तराखंड का जलप्रबंधन इन्हीं प्राकृतिक और पारम्परिक जलस्रोतों के कारण संतुलित रहा और कहीं भी विकृति आई तो आधुनिक जलवैज्ञानिक सोच और सरकार की अन्धविकासवादी नीतियों के कारण. इसलिए आज यदि उत्तराखंड के जलप्रबंधन को गति और दिशा देनी है तो फिजूल की भारी बजट की प्रभावहीन जलवैज्ञानिकों योजनाओं पर अमल करने और नेताओं तथा ठेकेदारों की कमाई का स्रोत बढाने के बजाय ग्रामीण जनों के सहयोग द्वारा परम्परागत भारतीय जल विज्ञान के फार्मूलों द्वारा धारे, नौलों,चाल, खाल, तालाब आदि के जलस्रोतों को बढाने की जरूरत है.

उत्तराखण्ड की परम्परागत ‘वाटर हारवेस्टिंग’ प्रणालियां

उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में नौले, धारे‚ पोखर‚ ताल‚गूल आदि जलापूर्ति के प्रमुख और प्राकृतिक संसाधन हैं जिनकी संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है-

गूल- उत्तराखण्ड में प्राचीनकाल से ही सीढ़ीनुमा खेतों की सिंचाई के लिए निकटवर्ती किसी नदी अथवा प्राकृतिक जलस्रोत से निकाली गई कृत्रिम प्रकार की नहर अथवा कूल को ‘गूल’  कहते हैं. उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में मूल जलस्रोत के स्थान पर एक बांध या ‘बान’ बनाकर पहले जलभंडारण किया जाता है और उसके बाद वहाँ से ‘कूल’ या नहर निकाली जाती है. सिंचाई के अतिरिक्त ‘गूल’  प्रणाली का प्रयोग पेय जल एवं ‘घराट’ नामक पनचक्की के लिए भी किया जाता है. गढ़वाल में प्रचलित माधोराम मलेथा के कूल निर्माण की गाथा उत्तराखण्ड हिमालय की इसी गुल व्यवस्था की ऐतिहासिक गाथा है|

नौला- भूमिगत जलस्रोत के भण्डारण हेतु ‘नौला’ नामक कृत्रिम जल निकाय की अत्यन्त लोकप्रिय व्यवस्था है. नौलों का भूमिगत जलस्रोत अत्यन्त संवेदनशील जल नाड़ियों से संचालित रहता है. इसलिए व्यापक स्तर पर मानवीय विकासपरक गतिविधियों तथा समय-समय पर होने वाले भूकम्पीय झटकों से इन नौलों के जलप्रवाह बाधित हो जाते हैं तथा नौले सूखने लगते हैं. उत्तराखण्ड हिमालय में अन्धाधुन्ध विकास एवं कंकरीट की सड़के बनने के कारण भूमिगत जलस्रोत विखंडित हुए हैं तथा वर्तमान में अधिकांश नौले जलविहीन होने के कारण सूख गए हैं. एक सर्वेक्षण के अनुसार नौलों के लिए प्रसिद्ध कुमाऊ के द्वाराहाट स्थित जलनिकाय इसी प्राकृतिक प्रकोप के कारण जलविहीन हो गए |

नौले सामूहिक सम्पत्ति माने जाते हैं तथा सभी ग्रामवासी अपने अपने नौलों की साफ सफाई तथा मरम्मत के लिए सजग रहते हैं. नौले के पास आवंले का वृक्ष लगाया जाता था ताकि इसका जल शुद्ध होने के साथ साथ रिचार्ज भी हो सके. उत्तराखण्ड में वराहमिहिर के जलविज्ञान से प्रेरणा लेकर नौले के चारों ओर विभिन्न प्रकार के वृक्षों को लगाया जाता था जिनमें बड़, खड़िक, शिलिंग‚ पीपल‚ बरगद‚तिमिल‚ दुधिला‚पदम‚ आमला‚ शहतूत आदि के वृक्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. चन्द तथा कत्यूरी वंश के राजाओं ने अनेक नौलों का निर्माण करवाया था जिनका उल्लेख उनके द्वारा जारी ताम्र-पत्रें में भी मिलता है |

धारों के निकट भी वृक्षारोपण की प्रथा उत्तराखण्ड में अत्यन्त लोकप्रिय रही है क्योंकि इन्हीं वृक्षों के परिणाम स्वरूप धारों के प्राकृतिक स्रोत सदैव सक्रिय रहते हैं तथा जलापूर्ति बाधित नहीं होती. सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि से भी इन जलधारों को इतनी पवित्रता प्रदान कर दी गई थी कि इनको साक्षी मानकर विवाह इत्यादि कृत्य भी किए जाते थे.

धारा- सार्वजनिक पेय जल का फाउण्टेननुमा जलड्डोत धारा कहलाता है. पर्वत शिखर में तथा घाटियों में बसी आबादी की जलापूर्ति इन्हीं प्राकृतिक धारों से होती है. नैनीताल में ‘पर्दधारा’ तथा ‘सिफई धारा’ का प्रयोग सार्वजनिक स्नान इत्यादि के लिए किया जाता है तथा चुनाधारा‚टनस्टेंनहाल धारा‚ हनुमानगढ़ी धारा‚ रौद्र धारा‚मोटापानी धारा तथा गुफा महादेव धारा ऐसे ही लोकप्रिय धारे हैं जहाँ से भारी मात्र में पेयजल की आपूर्ति होती है. धारों के निकट भी वृक्षारोपण की प्रथा उत्तराखण्ड में अत्यन्त लोकप्रिय रही है क्योंकि इन्हीं वृक्षों के परिणाम स्वरूप धारों के प्राकृतिक स्रोत सदैव सक्रिय रहते हैं तथा जलापूर्ति बाधित नहीं होती. सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि से भी इन जलधारों को इतनी पवित्रता प्रदान कर दी गई थी कि इनको साक्षी मानकर विवाह इत्यादि कृत्य भी किए जाते थे. कुमाऊँ उत्तराखण्ड में ‘कुम्भ विवाह’ नामक एक ऐसी विवाह पद्धति को भी सामाजिक मान्यता प्राप्त है जब वधु का विवाह वर की अनुपस्थिति में उसके प्रतिनिधि बने जलधारा के साथ किया जा सकता था. ए.एस. रावत तथा रितेश शाह ने कुमाऊँ उत्तराखण्ड के जलधारों का सर्वेक्षण करते हुए तीन प्रकर के धारों का उल्लेख किया है |

सिरपतिया धारा- जिसमें खड़े होकर जल पीया जा सके.

मुरपतिया धारा- जिसमें घुटनों को झुकाकर जल पीया जा सके.

पतविदिया धारा-जिसमें पत्तों इत्यादि के कारण जल स्रोत में रुकावट आ जाती है किन्तु वर्षा ऋतु के आने पर ये धारे फिर से सक्रिय होने लगते हैं | यहां यह उल्लेखनीय है कि कोई जल प्रशासन से सम्बंधित अधिकारी या कर्मचारी इन पारम्परिक स्रोतों से रुकावट आदि अवरोधों को हठाने तो आएगा नहीं,इसलिए अपने क्षेत्र के जल संकट की इन छोटी मोटी समस्याओं का समाधान करना है तो सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के भरोसे न रह कर वहां के गांव वासियों को स्वयं ही इस कार्य को करना होगा.

बांध- उत्तराखण्ड में नदियों के पानी को रोककर बांध बनाने की परम्परा भी बहुत पुरानी है.ऐसे बांधों में सेती, जमरानी, तुमड़िया‚ हरिपुरा‚ नानक सागर आदि उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध बांध माने जाते हैं.

खाल- पर्वतीय क्षेत्रों में ‘खाल’ अथवा ‘खाव’ वाटर हारवेसि्ंटग के बहु प्रचलित जल संग्रहण निकाय हैं. स्वरूप से ये खाल बड़े-बड़े गड्ढ़ों के आकार के होते हैं. वर्षा-पानी को इकट्ठा करने के लिए भी पहाड़ की चोटी पर छोटे-छोटे तालाब भी ‘खाल’ कहलाते हैं. सूखा या अनावृष्टि के दौरान भी इन्हीं खालों की सहायता से खेतों की सिंचाई इत्यादि का कार्य किया जाता है. गर्मियों के दिनों में गुलों का पानी जब सूख जाता है तो इन्हीं खालो में संग्रहीत जल का उपयोग किया जाता है.मगर आज ये खाल सूख चुके हैं. द्वाराहाट क्षेत्र में सुंगर खाल, छतिना खाल नाम के खाल रह गए हैं.


हमारे आज के जलवैज्ञानिकों को शायद ही मालूम हो कि उत्तराखंड के ये बड़े बड़े पोखर और खाल ही थे जिनमें वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से जलभंडारण होता रहता था और इन्ही खालों से आस पास के नौले धारे निरन्तर रूप से रिचार्ज होते रहते थे. किन्तु जब इन इन पोखरों और खालों का हमने नाम निशान ही मिटा दिया तो आस पास के नौले धारे भी सूख गए.मगर आधुनिक जलवैज्ञानिकों के पास ऐसी कोई वैज्ञानिक तकनीक नहीं,जिनसे इन लुप्त हुए जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया जा सके.

ताल- अनेक स्थानों पर बरसात के जल को संचयित करने के लिए झीलों और तालों की अवस्थिति पुरातन काल से चली आ रही है. ऐसे तालों में नैनीताल,भीमताल नौकुचियाताल आदि प्रसिद्ध ताल हैं.कुछ परम्परागत ताल अब 

भूमिगत जल के लुप्त होने के कारण सूख गए हैं जिनमें सूखाताल‚ लम्पोखरा ताल‚ मलवा ताल आदि उल्लेखनीय हैं.

चौपतौला- पशुओं के पानी पीने के लिए बनाए गए जलनिकाय ‘चौपतौला’ कहलाते हैं. ये अस्थायी जल संग्रहण के निकाय हैं. भूमिगत जलस्रोत अथवा वर्षाजल को संग्रहीत करके इनका निर्माण किया जाता है. घरेलु तथा जंगली पशु पक्षियों की जलापूर्ति इन ‘चौपतौलों’ का मुख्य प्रयोजन होता है.

सिमार- ‘सिमार’अथवा ‘गजार’ भी उत्तराखण्ड का मुख्य जलसंचय निकाय है. सिमार भूमिगत जलस्रोत से निर्मित होते हैं. इन जलबहुल सिमारों में प्रायः बासमती धान‚ तथा ओषधीय पौधों की खेती की जाती है.ब्राह्मी‚ हल्दी इत्यादि औषधीय पौधे ‘सिमारों’ में ही उत्पन्न होते हैं. किसी जमाने में गगास घाटी के रावल सेरा आदि के सीमार और जालली घाटी के सीमार अपने धान उत्पादन के लिए मशहूर थे,किन्तु  मुख्य नदियों में पानी की मात्रा कम होने और उनकी सहायक गाड़ गधेरों के सूख जाने के कारण अब इन धान के सीमारों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है |

बन्धारा- उत्तराखण्ड के गांवों में ‘बन्धारा’ की विधि से वाटर हारवेस्टिंग प्रणाली का भी विशेष प्रचलन है. मकान की ढलानदार छत से बहने वाले वर्षा के जल को किसी जलपात्र में संग्रहीत करना या किसी बड़े गड्ढे में उसे नालियों के 

माध्यम से संचयित करना ‘बन्धारा’ विधि कहलाती है जिसे आधुनिक काल में ‘टॉप रूफ 



वाटर हारवेस्टिंग’ के नाम से जाना जाता है. इस बंधारा विधि से संग्रहीत जल द्वारा घर के आस पास बाग बगीचों की सिंचाई में मदद मिल सकती है | जलसंकट का समाधान ‘वाटर हारवेस्टिंग’ प्रणाली आधुनिक जल वैज्ञानिकों का भी वराहमिहिर इत्यादि प्राचीन भारतीय जलवैज्ञानिकों की भांति यह मानना है कि नदियों एवं प्राकृत जलस्रोतों में जल की पर्याप्त उपलब्धि हेतु वनक्षेत्रों का संवर्धन एवं परिपोषण अत्यावश्यक है ताकि जलवैज्ञानिक पारिस्थिकी को प्रभावित करने वाले उपर्युक्त भूस्तरीय जलविभाजक एवं सूक्ष्म जलविभाजक जलनिकायों की भूमिगत जल नाड़ियां सक्रिय हो सकें |

आज उत्तराखण्ड जलप्रबन्धन के पारम्परिक जलस्रोतों का अस्तित्व संकट में है.इस समस्या को यदि सुलझाना है तो राज्य सरकार तथा यहां के स्थानीय निवासियों की साझा‚भागीदारी से परम्परागत ‘वाटर हारवेस्टिंग’ प्रणाली को युध्दस्तर पर पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है तथा प्राचीन भारत के जलवैज्ञानिक फार्मूलों एवं जलसंचयन की आधुनिक तकनीकों के माध्यम से जलसंकट की समस्याओं का समाधान भी खोजना होगा.

डॉ मोहन चंद तिवारी,

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)





                                                        

जय  कामाख्या  माता

  किशन लाल शर्मा



आजकल विज्ञापन के क्षेत्र में ; "पहले इस्तेमाल करें ,फिर विश्वास करें। "  कथन छाया हुआ है। इस कथन को यदि हम धार्मिक क्षेत्र में देखें तो पाएंगे कि कभी कोई व्यक्ति  विकट समस्या से जूझ रहा हो और बहुत ही परेशान हो तो वह  अपने मित्रों  या  जानकारों  से अपनी  चिंता को बांटता है और लोग अपने अनुभवों के अनुसार उसे  सलाह मशवरा देते हैं।  हाल ही में महाराष्ट्र में जब शिवसेना पार्टी में  विद्रोह हुआ  और एकनाथ शिंदे के समर्थन वाले  विधायक पहले गुजरात के सूरत और बाद में गौहाटी में अपनी कामना पूर्ति के लिए  मां कामाख्या की शरण में गौहाटी  पहुंच गए।  बच्चों की एक कविता में आता है ," एक चिड़िया के बच्चे चार , घर से निकले पंख पसार।  पूरब से पश्चिम को आये। .......", यहां तो एकनाथ शिंदे और उनके विधायक उल्टी दिशा में  आये,पश्चिम  से  पूरब को आये।  मां कामाख्या का आशीर्वाद प्राप्त किया और भारतीय जनता पार्टी   के साथ मिल कर महाराष्ट्र में सरकार बनाई। एकनाथ शिंदे को पूरा भरोसा था यदि वह मुंबई से इतनी दूर गौहाटी में  मां कामाख्या की शरण  में जायेंगे तो वह अवश्य कामयाब होंगे। राजनीती के अखाड़े में यह नुस्खा पहले भी प्रयोग में लाया जा चुका था। एक बार जब मन मोहन सिंह की सरकार सेंटर में अल्पमत में आ गई थी और  उन्हें  बहुमत साबित करने  के लिए 67 मतों की आवश्यकता थी।  कांग्रेस ने 67 बकरों की भेंट मां कामाख्या मंदिर में दी थी और कांग्रेस पार्टी  अपना लोक सभा में बहुत मत साबित करने में सफल रही। पहले प्रयोग किया हुआ उपाय  एकनाथ शिंदे ने इस्तेमाल किया और सफल हुए। 

सन 1970 की बात है। मैं 83 वर्ष पुराना हूँ तो मेरी बात भी पुरानी ही होगी। मेरी पोस्टिंग जम्मू से मिजोरम में हुई। किसी शुभचिंतक ने  कहा पहली बार जा रहे हो। ब्रह्मपुत्र नदी पार करते समय उसमें तांबे के कुछ सिक्के डाल देना नहीं तो यह नदी बार बार पार करनी पड़ेगी। 

हम सोते रह गए और नदी में सिक्का नहीं डाल पाए। मिज़ोरम पहुँच गए। पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजिउर्रहमान को प्रधान मंत्री ना बनाने   पर वहां विद्रोह शुरू हो गया और भारत में बंगाली शरणार्थियों का आना शुरू हो गया। देश में हलचल शुरू हो गयी।अगस्त 1971 में त्रिपुरा में अगरतला आना पड़ा और मुक्ति वाहिनी ट्रेनिंग कैम्पस लगाने पड़े। ऐसे व्यस्त हुए कि लड़ते - लड़ते  हम चटगांव , बांग्ला देश पहुँच गए और 16 दिसम्बर 1971 आ गया। पूर्वी पाकिस्तान अब सोनार बांग्ला देश , एक स्वतंत्र देश बन गया।  " लौट लाट  जब घर को आये , माता को ये वचन सुनाए ,  देख लिया हमने जग सारा ,सबसे अच्छा घर है हमारा। " हम  मिजोरम वापस अपने स्थान   पर पहुँच गए। इस समय उत्तर पूर्वी सीमा क्षेत्र में बहुत हलचल रही जो दो तीन साल में स्थिर हुई। ईश्वर से बहुत प्रार्थनाओं के बाद चार साल बाद   उदयपुर , राजस्थान एक पीस स्टेशन में मेरी  पोस्टिंग हुई।  जनवरी 1974 में फेयरवेल पार्टी में मित्रों ने कुछ ज्यादा ही स्नेह पिलाया। मिजोरम से   गौहाटी तक मेरे सहायक की पूरी मदद रही।  वेटिंग रूम , गौहाटी में जनवरी के महीने में ठन्डे पानी की नल के नीचे आधे घंटे तारों को   जमीन पर लाने का प्रयास किया। वेटिंग रूम के अन्य लोग समझ तो गए और शिष्टाचार के अनुसार मुस्कुराते हुए नमस्कार करते रहे। नाश्ता करने के बाद कुछ करने को नहीं था। अपनी ट्रेन शाम को थी।  सोचा कामाख्या माता मंदिर दर्शन के लिए जाएँ। इन चार सालों की अवधि   में पहली बार माता कामाख्या मंदिर आया था। प्रसाद ले कर लम्बी लाइन में लग गया।  बहुत भीड़ थी। एक तरफ छोटे छोटे दुर्बल से बकरों की  बलि दी जा रही थी। उत्साह और हर्ष का वातावरण था। हम आधे सोये जागे से गत चार वर्षों की गतिविधियों को याद कर रहे थे।  कहाँ घर से  इतनी दूर रहे।  जब पत्नी बहुत सख्त बीमार डी० आई० लिस्ट पर थी ;हमें चार दिन की  छुट्टी मिली। फिर भी हवाई जहाज की टिकट ना मिलने पर घर नहीं जा सके.  मिजोरम के जंगल ,मलेरिया के मोटे मोटे  मच्छर और खून पीने के लिए जंगलों की जोंक। कोई फ़ोन नहीं और घर से चिट्ठी भी आठ दिन में आती। ये टेन्योर  कष्ट दायक ही रहा। लाइन में खड़े एक व्यक्ति ने मुझसे पुछा , क्या आप माता  मंदिर में पहले भी आये हैं ? मैंने कहा नहीं। वह कहने लगा , इस मंदिर जो एक बार  आता है वह यहां मंदिर में दोबारा अवश्य आता है। माता सच्ची माता है।  सबकी मुरादें पूरी करती हैं।  मैंने झट से कहा , भाई साहब ! ये मेरा प्रसाद   पकड़ो और माता को चढ़ा देना। मैं तो माता मंदिर में इसलिए आया हूँ कि मुझे अब इस इलाके में दुबारा नहीं आना पड़े।  उस व्यक्ति के झेंपते हुए कहा , जब आप मंदिर आये ही हैं तो माता के दर्शन कर लो और प्रसाद खुद ही चढादो।  बातों बातों मैं मेरा नंबर  भी आ गया।  मैंने घुटने टेक  कर पूरी श्रद्धा के साथ माता को प्रणाम किया।  पंडित जी को प्रसाद अर्पण करने के लिए दिया।  हाथ जोड़ कर  मैंने माता से सच्चे दिल से सिर्फ ये ही प्रार्थना की हे माता ! अगली बार इधर नहीं। प्रसाद लेकर  मंदिर से वापस वेटिंग रूम आगये। राजस्थान में उदयपुर एक अच्छा ऐतिहासिक और दर्शनीय घूमने फिरने वाला  शहर है।  ढाई साल बीत गए पता ही नहीं चला। पलटन का मूव  .आइजोल, मिजोरम  आया और साथ ही  मेरी पोस्टिंग एन० सी० सी० ऑफिसर ट्रेनिंग स्कूल , काम्पटी। बहुत लोगों ने कोशिश की मेरी पोस्टिंग काम्पटी  ना हो लेकिन कोई कामयाब नहीं हुआ।  मिजोरम में चार साल रह कर  उदयपुर आया था और फिर दोबारा मिजोरम ?  मैं लगभग ढाई साल  काम्पटी में रहा।पल्टन ने ब्रह्मपुत्र नदी पार की और लगभग ढाई साल आइजल , मिजोरम रह कर रंगिया - तामुलपुर , असम  में आ गई। ट्रेनिंग आदि के लिए भूटान   सीमा , बरपेटा , सरूपेटा  जो ब्रह्मपुत्र नदी के पश्चिम का एरिया है , इन सभी इलाकों में ट्रेनिंग के लिए पल्टन को टास्क मिला। भूटान भी   ट्रेनिंग के लिए जाने का काम पड़ता था।  मेरा काम्पटी में ढाई साल का टेन्योर जब पूरा हुआ और मेरी पलटन में वापस पोस्टिंग हुई तब तक पलटन  अपना मिजोरम का टेन्योर पूरा कर  रंगिया -तामिलपुर  आ गई।  मैं पलटन में आया और जैसा  मैंने मां कामाख्या से प्रार्थना की थी , अगली बार इधर नहीं , तो वैसा ही हुआ।  मैंने   ब्रह्मपुत्र नदी पार नहीं की। शायद ये घटना सन 1979 के आस पास की है।  अचानक कुछ मिज़ो भूमिगत विद्रोहियों ने आइजवल में स्थित पुलिस हेडक्वार्टर  ऑफिस  में घुस कर सभी टॉप पुलिस अधिकारिओं की हत्या कर दी। मिजोरम में  हा हा  कार  मच गया।  एडमिनिस्ट्रेशन सक्ते में पड़  गया। स्थिति को संभालने  और कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए अतिक्त पुलिस फ़ोर्स  और अधिक सेना  बल को बाहर से बुलाना पड़ा। हमारी पलटन तो कुछ समय   पहले ही आइजोल से आयी  थी।  हम मिजोरम के  पुरे एरिया से परिचित थे। हमारी पलटन को तत्काल मिजोरम जाने के आदेश दे दिए गए। जोर शोर से जाने की तैयारी   शुरू हो गई। रास्ते  के लिए मीठी पूरी , शक्कर पारे  इमरजेंसी राशन पैक हो गया।  हथियार - एम्युनिशन सब को इशू हो गया। इस तैयारी  में शाम हो गई। बाकी गाड़ियां तो पल्टन के पास होती हैं पर जवानों के लिए एक पल्टन को तीस बस या ट्रक चाहियें।  बस या ट्रक आदि का प्रबंध ऊपर के अधिकारी कर रहे थे। पलटन  जाने के लिए तैयार है और सब तैयारियां हो गयी है;इसकी  रिपोर्ट देने के लिए मैं अपने कमान अधिकारी के बाशा  में गया। उन्हें तैयारिओं के बारे में   विस्तार से बताने के बाद जब मैं अपने बाशा जाने की इजाज़त मांगने लगा तो उन्होंने कहा बैठ जाओ।  सुबह से तुम पलटन को मूव के लिए तैयार करने में लगे   रहे हो। हैव ए ड्रिंक।  मना करते हुए मैंने उनसे  कहा; आप  तो जानते हैं ; मैं ड्रिंक नहीं करता। बाशा  में जा कर नहा धोकर खाना खाऊंगा।  सी० ओ० ने जबरदस्ती  बैठा लिया।  दुसरे ड्रिंक के बाद मैंने अपने सी० ओ० को कहा , सर ! हमारा ये मूव कैंसिल होगा।  उन्होंने पूछा मैं ऐसा कैसे कह रहा हूँ।   मैंने उन्हें बताया कि मैंने जनवरी 1974 में कामाख्या  माता मंदिर में प्रार्थना की थी कि अगली बार इधर नहीं। अब आप जरा देखें उदयपुर से  पलटन का मूव जब   मिजोरम के लिए आया तो मेरी पोस्टिंग काम्पटी हो गयी। पलटन  जब तक मिजोरम में थी ; मेरी पोस्टिंग पलटन में नहीं आयी .. अब जब पलटन ब्रह्मपुत्र नदी के पश्चिम   में आई है तो मेरी पोस्टिंग पलटन में आ गई।  मैंने माता कामाख्या से प्रार्थना की थी  और मुझे  माता पर पूरा पूरा विश्वास है कि वह मुझे ब्रह्मपुत्र नदी के उस पार नहीं भेजेगी। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ , हम कल नहीं जा रहे हैं।  आप मेरी बात पर विश्वास करें। इसके बाद  मैंने सी० ओ० से इजाजत ली और बाशा में सोने चला गया। अपने बाशा  में सोने से पहले मैंने टेलीफोन एक्सचेंज में ऑपरेटर को आदेश दिए कि मैं बाशा में आराम कर रहा हूँ।  जैसे ही जवानों के लिए गाड़ियों आती हैं,उनकी लाइट दिखाई देती है तो मुझे जगा देना।  मैं बहुत थक गया था।  आँख बंद करते ही गहरी नींद आ गई।  जाने के लिए सिर्फ तीस बस या ट्रक का इन्तजार था।  उनके आते ही हम उनमें बैठ कर मिजोरम के लिए रवाना हो जायेंगे।  मेरे मन में कोई संदेह नहीं था। पहले तो इतनी बस या ट्रकों का इतनी जल्दी प्रबंध नहीं हो

पायेगा। दूसरा माता मुझे किसी भी हालत में मिजोरम नहीं भेजेंगी। मुझे पूरा विश्वास था क्योंकि पिछले चार वर्षों में जो कुछ भी हुआ उस से साफ़ जाहिर हो रहा था।  मैं मिजोरम 

नहीं जाऊंगा। पूर्व के प्रांतों में सूर्य देवता जल्दी सवेरा कर देते हैं। सुबह - सुबह सी० ओ० का फ़ोन आ गया।  टेलीफोन ऑपरेटर ने बताया , साहब ! सी० ओ०  साहब आपसे बात करना चाहते हैं ।  दूसरी तरफ से सी० ओ० साहब की आवाज थी।बोले,शर्मा तुम ठीक निकले।हमारा मिजोरम जाना कैंसिल हो  गया है।यू  आर राइट।  मुझे बहुत ख़ुशी हुई और मैंने हाथ जोड़ कर माता को बहुत बहुत  धन्यवाद् किया । प्रतिवर्ष माता के  दोनों  नवरात्रों पर कामाख्या माता मंदिर के एक पांडे को मैं  पैसे  भेज देता हूँ और वह पूजा के बाद  माता का प्रसाद मुझे पार्सल से प्रसाद भेज देता है।मेरी पूरी श्रद्धा माता में है और मुझ पर माता की असीम कृपा भी है। आप भी कभी गुवाहाटी जाने का मौका मिले तो अवश्य ही मां कामाख्या मंदिर दर्शनों के लिए जाएँ।

                                                                      

       



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