गुरुवार, 30 जून 2022

दही भल्ला बनाये


दही भल्ला

दही भल्ला बनाने हेतु सामग्री

दो कप धुली मुंग की दाल ,आधा कप उड्द धुली दाल,एक  चम्मच जीरा ,अदरक दो टुकडे 

काजू,किशमिश ,कुटी काली मिर्च ,नमक ,धी/तेल,काला नमक 

तीन कप दही ,एक चम्मच चीनी लाल मिर्च 

हरी मिर्च ,चाट मसाला ,हरा धनिया 

अनार के दाने,मीठी चटनी,हरी चटनी

दही भल्ला बनाने की विधि

मूंग की दाल उड़द की दाल को बारीक पीस लें, पिसते समय अदरक, हरी मिर्च डाले | पिसने के बाद जीरा, काली मिर्च कुटी  हुई, ड्राई फ्रूट काटकर मिला दे व थोड़ा सा नमक भी डालें,अच्छी तरह फेंट लें,कढ़ाई में घी डालकर गर्म करें, जब घी गरम हो जाये तो भल्ला  बनाकर कढ़ाई में तलने के लिए डालें | हल्की आंच पर भल्ले को तले ,भल्ले को  निकालकर साथ रखें पानी में डालें ध्यान रहे उसमें थोड़ा सा नमक भी मिला दे | पानी में जब भल्ले भीग  जाए तो एक प्लेट में भल्ले  का पानी निचौर कर  कर रखें अब उनके उपर दही डाले , मीठी चटनी ,हरी चटनी ,चाट मसाला,भुना जीरा डाले | थोड़ी सा  हरा धनिया बुर्क दे | अनार के दाने,ड्राई फ्रूट व  काला नमक बुरके |

 तैयार है लाजवाब दही भल्ला 

मिथलेश शर्मा 

मुंग के दाल के लडू (राम लडू )

 


मुंग के दाल के लडू (राम लडू )

आमिर गरीब,छोटा बड़ा सब मुंग के दाल के लडू बहुत शोक से खाते है,आओ आज बनाते है मुंग की दाल के लडू जिसको आम भाषा में राम लडू भी कहते है |

मुंग की दाल के लडू व हरी चटनी बनाने की सामग्री |

दो कप मुंग की धुली दाल , 1 /2 कप चने की दाल , नमक , जीरा ,खाने का सोडा तेल पुधिना 

हरा धनिया हरी मिर्च अदरक काला नमक चाट मसाला अमचूर,निम्बू मुली |

मुंग की दाल के लडू /राम लडू बनाने की विधि 

मुंग की दाल व चने की दाल को अलग अलग भिगो दे कम से कम 5 घन्टे तक |

दाल भीग जाने के बाद बारीक़ पीस ले ,अब दोनों को एक बर्तन में मिला कर पीस ले इस में नमक व जीरा मिला दे | कड़ाई में तेल गर्म करे ,हाथ या चमक से छोटे गोल लडू बना कर हलकी आच पर तले,सुह्नेहरे होने पर छलनी में निकाले ,

 हरा धनिया ,पुधिना ,हरी मिर्च ,अदरक ,अमचूर काला नमक ,नमक ,निम्बू का रस मिला कर पीस ले चटनी तयार |

मुली को कस ले 

एक प्लेट में मुंग की दाल के लडू रखे कसी मुली व चाट मसाला बुर्के हरी चटनी के साथ खाए व खिलाये मजेदार लाजबाब मुंग की दाल के लडू |                                       मिथलेश शर्मा

शनिवार, 25 जून 2022

ज्ञानबर्धक बोध कथाएं

                    

आचरण बड़ा या ज्ञान ?

राजा की सभा में एक बडा सम्मानित राज पुरोहित था। जब वह आता राज्यसभा के सभी सभासदों के साथ राजा भी खड़े होकर उसका स्वागत करते थे। एक दिन राजा ने अपने सभासदो के सामने राजपुरोहित जी से एक प्रश्न किया.... आचरण बड़ा या ज्ञान ? राजपुरोहित ने कहा: - प्रश्न के समाधान के लिए थोड़ा वक्त चाहिए। राजपुरोहित ने एक प्रयोग किया, कोषागार से दो मोती चुरा लिए.. खजांची ने देखा और हैरान रह गया। दूसरे दिन भी ऐसा ही हुआ। राजपुरोहित ने फिर से रत्न चुरा लिए। बात राजा तक पहुंचीं और राजा ने जांच कराई, तो राजपुरोहित जी की सच्चाई सामने आई। अगले दिन राजा ने राजपुरोहित को सम्मान नहीं दिया उसके सम्मान में खड़ा नहीं हुआ पुरोहित ने मन ही मन कहा : दवा काम कर गई। राजा ने पुरोहित से पुछा आपने मोती, रत्न चुराएं है ? जी हां, पुरोहित ने कहा राजा ने पुछा क्यों ? दरअसल मैं आपको दिखाना चाहता था कि आचरण बड़ा है या ज्ञान ? मेरी राज्य सभा में जो प्रतिष्ठा है, सम्मान है, इज्जत है वह आचरण के कारण है या ज्ञान के..? आपने देखा कि मेरा ज्ञान मेरे पास था, उसमें कोई फर्क नहीं आया, उसमें कोई कमी नहीं आई। फिर भी आपने मेरा स्वागत नहीं किया खड़े होकर मेरा सम्मान नहीं किया। क्योंकि मैं आचरण से गिर गया था राजपुरोहित से चोर बन गया था*। मेरा आचरण गिरा, आपकी भौंहें तन गई। मैं समझ गया कि आचरण बड़ा है या ज्ञान? मुझे लगता है कि आपके प्रश्न का भी यही उत्तर है,,क्या समझें..चिंतन करतें रहो |

तितली का संघर्ष 

एक बार एक आदमी को अपने उद्यान में टहलते हुए किसी टहनी से लटकता हुआ एक तितली का कोकून दिखाई पड़ा. अब हर रोज़ वो आदमी उसे देखने लगा और एक दिन उसने ध्यान किया कि उस कोकून में एक छोटा सा छेद बन गया है. उस दिन वो वहीं बैठ गया और घंटों उसे देखता रहा. उसने देखा की तितली उस खोल से बाहर निकलने की बहुत कोशिश कर रही है, पर बहुत देर तक प्रयास करने के बाद भी वो उस छेद से नहीं निकल पायी और फिर वो बिलकुल शांत हो गयी मानो उसने हार मान ली हो | इसलिए उस आदमी ने निश्चय किया कि वो उस तितली की मदद करेगा. उसने एक कैंची उठायी और कोकून की उस छेद को इतना बड़ा कर दिया कि वो तितली आसानी से बाहर निकल सके. और यही हुआ, तितली बिना किसी और संघर्ष के आसानी से बाहर निकल आई, पर उसका शरीर सूजा हुआ था और पंख सूखे हुए थे | वो आदमी तितली को ये सोच कर देखता रहा कि वो किसी भी वक़्त अपने पंख फैला कर उड़ने लगेगी, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इसके उलट बेचारी तितली कभी उड़ ही नहीं पाई और उसे अपनी बाकी की ज़िन्दगी इधर-उधर घिसटते हुए बीतानी पड़ी | वो आदमी अपनी दया और जल्दबाजी में ये नहीं समझ पाया कि दरअसल कोकून से निकलने की प्रक्रिया को प्रकृति ने इतना कठिन इसलिए बनाया है ताकि ऐसा करने से तितली के शरीर में मौजूद तरल उसके पंखों में पहुंच सके और वो छेद से बाहर निकलते ही उड़ सके.

                                   बेला और कल्याणी

मुहम्मद गोरी हमारे देश को लूटकर जब वह अपने वतन गया तो गजनी के सर्वोच्च काजी व गोरी के गुरु निजामुल्क ने मोहम्मद गौरी का अपने महल में स्वागत करते हुए कहा। "आओ गौरी आओ! हमें तुम पर नाज है कि तुमने हिन्दुस्तान पर फतह करके इस्लाम का नाम रोशन किया है, कहो सोने की चिड़िया हिन्दुस्तान के कितने पर कतर कर लाए हो।’’ ‘‘काजी साहब ! मैं हिन्दुस्तान से सत्तर करोड़ दिरहम मूल्य के सोने के सिक्के, पचास लाख चार सौ मन सोना और चांदी, इसके अतिरिक्त मूल्यवान आभूषणों, मोतियों, हीरा, पन्ना, जरीदार वस्त्रा और ढाके की मल-मल की लूट-खसोट कर भारत से गजनी की सेवा में लाया हूं।’’ ‘‘बहुत अच्छा ! लेकिन वहां के लोगों को कुछ दीन-ईमान का पाठ पढ़ाया कि नहीं."? ‘‘बहुत से लोग इस्लाम में दीक्षित हो गए हैं’’! और बंदियों का क्या किया ? बंदियों को गुलाम बनाकर गजनी लाया गया है। अब तो गजनी में बंदियों की सार्वजनिक बिक्री की जा रही है। एक-एक गुलाम दो-दो या तीन-तीन दिरहम में बिक रहा है। ‘‘हिन्दुस्तान के काफिरो के मंदिरों का क्या किया’’? ‘‘मंदिरों को लूटकर 17000 हजार सोने और चांदी की मूर्तियां लायी गयी हैं, दो हजार से अधिक कीमती पत्थरों की मूर्तियां और शिवलिंग भी लाए गये हैं और बहुत से पूजा स्थलों को नष्ट भृष्ट कर आग से जलाकर जमीदोज कर दिया गया है" । फिर थोड़ा रुककर काजी ने कहा, ‘‘लेकिन हमारे लिए भी कोई खास तोहफा लाए हो या नहीं?’’ ‘‘लाया हूं ना काजी साहब !’’ ‘‘क्या".....? ‘‘जन्नत की हूरों से भी सुंदर जयचंद की पौत्री कल्याणी और पृथ्वीराज चौहान की पुत्री बेला’’ ‘‘तो फिर देर किस बात की है’’? बस आपके इशारेभर की".!! काजी की इजाजत पाते ही शाहबुद्दीन गौरी ने "कल्याणी और बेला" को काजी के हरम में पहुंचा दिया । कल्याणी और बेला की अद्भुत सुंदरता को देखकर काजी अचम्भे में आ गया, उसे लगा कि स्वर्ग से अप्सराएं आ गयी हैं। उसने दोनों राजकुमारियों से विवाह का प्रस्ताव रखा तो बेला बोली-‘‘काजी साहब! आपकी बेगमें बनना तो हमारी खुशकिस्मती होगी, लेकिन हमारी दो शर्तें हैं’’?? ‘‘कहो..कहो.. क्या शर्तें हैं तुम्हारी! तुम जैसी हूरों के लिए तो मैं कोई भी शर्त मानने के लिए तैयार हूं। ‘‘पहली शर्त से तो यह है कि शादी होने तक हमें अपवित्र न किया जाए ?  क्या आपको मंजूर है.? ‘‘हमें मंजूर है! दूसरी शर्त का बखान करो।’’ ‘‘हमारे यहां प्रथा है कि लड़की लड़के के विवाह के कपड़े लड़कीे के यहां से आते हैं। अतः दूल्हे का जोड़ा और अपने जोड़े की रकम हम भारत भूमि से मंगवाना चाहती हैं।’’ मुझे तुम्हारी दोनों शर्तें मंजूर हैं । और फिर ? बेला और कल्याणी ने कविचंद के नाम एक रहस्यमयी खत लिखकर भारत भूमि से शादी का जोड़ा मंगवा लिया। काजी के साथ उनके निकाह का दिन निश्चित हो गया। रहमत झील के किनारे बनाये गए नए महल में विवाह की तैयारी शुरू हुई। कवि चंद द्वारा भेजे गये कपड़े पहनकर काजी साहब विवाह मंडप में आए। कल्याणी और बेला ने भी काजी द्वारा दिये गये कपड़े पहन रखे थे। शादी को देखने के लिए बाहर जनता की भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। तभी बेला ने काजी से कहा- ‘‘हम कलमा और निकाह पढ़ने से पहले जनता को झरोखे से दर्शन देना चाहती हैं"! क्योंकि ? विवाह से पहले जनता को दर्शन देने की हमारे यहां प्रथा है और फिर गजनी वालों को भी तो पता चले कि आप बुढ़ापे में जन्नत की सबसे सुंदर हूरों से शादी रचा रहे हैं। शादी के बाद तो हमें जीवन भर बुरका पहनना ही है । तब हमारी सुंदरता का होना न के बराबर ही होगा। नकाब में छिपी हुई सुंदरता भला तब किस काम की.? ‘‘हां..हां..क्यों नहीं।’’ काजी ने उत्तर दिया और कल्याणी और बेला के साथ राजमहल के कंगूरे पर गया, लेकिन वहां तक पहुंचते-पहुंचते ही काजी के दाहिने कंधे से आग की लपटें निकलने लगी, क्योंकि क्योंकि कविचंद ने बेला और कल्याणी का रहस्यमयी पत्र समझकर बड़े तीक्ष्ण विष में सने हुए कपड़े भेजे थे। काजी साहब विष की ज्वाला से पागलों की तरह इधर-उधर भागने लगा, तब बेला ने उससे कहा- *‘‘तुमने ही गौरी को भारत पर आक्रमण करने के लिए उकसाया था ना ? हमने तुझे मार कर अपने देश को लूटने का बदला ले लिया है। हम हिन्दू कुमारियां हैं समझे, किसमें इतना साहस है जो जीते जी हमारे शरीर को छू भी सकें"। इतना कहकर उन दोनों बालिकाओं ने महल की छत के बिल्कुल किनारे खड़ी होकर एक-दूसरी की छाती में विष बुझी कटार भोंक दी और उनकी प्राणहीन देह उस उंची छत से नीचे लुढ़क गई। पागलों की तरह इधर-उधर भागता हुआ काजी भी जल कर तड़प-तड़प कर भस्म हो गया।

       

संकल्प का प्रभाव 

एक गांव में एक नास्तिक रहता था जिसका नाम शिवराम था,,न जाने क्यों, वह भगवान के नाममात्र से ही भड़क उठता था। यहाँ तक कि किसी आस्तिक से बात करना भी वह पाप समझता था। एक बार उसके गाँव में एक बड़ महात्मा प्रवचन देने के लिये आए। पूरा गाँव उनका प्रवचन सुनने के लिए उमड़ पड़ा। कई दिनों तक महात्मा जी का प्रवचन चलता रहा। मगर उसने उधर जाना तक उचित न समझा। एक दिन वह संध्या के समय अपने खेत से लौट रहा था, सभी प्रवचन दे रहे महात्मा जी का स्वर उसके कानों से टकराया, “ अगर तुम जीवन में सफल होना चाहते हो तो मन में कुछ न कुछ दृढ़ संकल्प कर लो और पूर्ण निष्ठा से उसे पूरा करने में लगे रहो। एक न एक दिन तुम्हें उसका सुफल जरूर मिलेगा। न चाहते हुए भी आखिर यह बात उसके कानों टकरा ही गयी। उसने इस बात को भूल जाना चाहा, लेकिन जब रात में सोया तो रह- रहकर महात्मा जी के कहे शब्द उसके दिमाग में गूँजने लगे। लाख कोशिश करके भी वह उनसे अपना पीछा नहीं छुड़ा पाया। आखिर थक-हारकर उसने इस कथन की सत्यता को परखने का निश्चय किया। लेकिन वह क्या दृढ़ संकल्प करें? उसने ऐसी बात सोचनी चाही जिससे कभी भी कोई प्रतिफल न मिलने वाला हो। उसका मंतव्य सिर्फ इतना था कि किसी भी तरह महात्मा जी का कथन असत्य सिद्ध हो जाए। काफी सोच विचार में उलझे रहने के बाद उसका ध्यान अपने घर के सामने रहे वाले कुम्हार पर गया। उसने संकल्प किया वह प्रतिदिन कुम्हार का मुँह देखे बिना भोजन नहीं करेगा। अपनी इस सोच पर वह मन ही मन खूब हँसा, क्योंकि वह जानता था कि इसका किसी तरह कोई भी सुफल नहीं मिल सकता है। अगले ही दिन से उसने अपने संकल्प पर अमल करना शुरू कर दिया। अब वह अंधेर में ही उठकर अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठ जाता जब कुम्हार उठकर बाहर आता जाता तो वह उसका मुँह देख लेता, फिर अपने काम में लग जाता। कभी-कभी ऐसे भी अवसर आते, जब कुम्हार बाहर चला जाता तो उसके एक दो दिन तक उपवास करना पड़ता। लेकिन न तो वह इससे विचलित हुआ और नहीं उसने अपने संकल्प की भनक कुम्हार अथवा अपने किसी परिवार जन को लगने दी।

   धीरे धीरे छह महीने बीत गए। किंतु उसे कुछ भी लाभ न हुआ। फिर भी अपने संकल्प पर अटल एवं अडिग रहा। उस पर तो नास्तिकता का भूत सवार था। कुछ भी करके वह महात्मा जी की बात झूठी साबित करना चाहता था। एक दिन उसकी नींद देर से खुली। तब तक कुम्हार मिट्टी लेने के लिए गाँव के बाहर खदान में चला गया था। जब उसे इसका पता चला तो वह भी घूमते-घूमते उधर जा निकला ताकि कुम्हार का मुँह देख ले। उसने थोड़ी खड़े होकर कुम्हार को देखा। वह मिट्टी खोदने में तल्लीन था। अतः वह चुपचाप वापस चल पड़ा उधर मिट्टी खोदते-खोदते कुम्हार के सामने सोने की चार ईंटें निकल आयीं। उसने गरदन उठाकर चारों तरफ देखा कि कोई उसे देख तो नहीं रहा है। तभी उसकी नजर कुछ दूर तेज कदमों से जाते उस पर पड़ी। उसने अपनी घबराहट पर नियंत्रण किया और उसे पुकारा अरे भाई शिवराम किधर से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो? और कहा जा रहे हो? वह किधर से आया था, पूछकर कुम्हार तसल्ली कर लेना चाहता था। उसने रुककर जवाब दिया, “ बस इधर ही आया था। जो देखना था सो देख लिया। अब वापस घर जा रहा हूँ।” उसके कहने का तो मतलब था कि उसने कुम्हार का मुँह देख लिया था। लेकिन कुम्हार घबरा गया। उसे पक्का विश्वास था कि उसने सोना देख लिया है। कहीं उसने रियासत के राजा से शिकायत कर दी तो हाथ आयी लक्ष्मी निकल जायेगा। उसने तुरंत कुछ निर्णय किया और उससे बोला “अरे भाई शिवराम देख लिया है तो तुम भी आधा ले जाओ। लेकिन राजा से शिकायत न करना” उसने सोचा कि कुम्हार मजाक कर रहा है। वह मना करते हुए चल पड़ा। अब तो कुम्हार एकदम घबरा गया। उसने दौड़कर उसे पकड़ लिया और हाथ जोड़ते हुए बोला, भाई तुम्हें आधा ले जाने में क्या हर्ज है?” अब तो वह थोड़ा चकराया। कुम्हार उसे अपने साथ खदान में ले गया। वहाँ सोने की ईंटें पड़ी देखकर वह सारा माजरा समझ गया उसने चुपचाप चार में दो ईंटें उठा ली। ईंटें उठाते समय महात्मा जी के वाक्य की महिमा समझ में आ रही थी। वहां से लौट कर उसने वह सारा सोना गाँव वालों के हित में लगा दिया। इसी के साथ उसने शेष जीवन कठोर तप एवं भगवद्भक्ति में लगान का निश्चय किया। संकल्प के इसी प्रभाव के कारण अब उसे लो नास्तिक नहीं परम आस्तिक, महान तपस्वी महात्मा शिवराम के नाम से जानने लगे थे। 

 मदद

रात के 11:00 बजे थे और अचानक घर की घंटी बजी। रवि चौंक गया!! इतनी रात को कौन आया? दरवाजा खोल कर घर के बाहर आया तो देखता है कि सामने एक वृद्ध सज्जन खड़े हैं। एक ऑटो पर आए हुए तेजी से हाफ रहें थे और उन सज्जन ने उससे पूछा, "बेटा, आपका नाम?" 

उसने बोला ,"रवि" 

वृद्ध सज्जन ने कहा, "हे भगवान तेरा लाख-लाख शुक्रिया, घर मिल गया।" रवि को कुछ समझ नहीं आया, वृद्ध सज्जन ने कहा,"पानी मिलेगा?" रवि ने कहा, "आइए, घर के अंदर आइए।" और रवि ने उनको पानी पिलाया।उसके बाद वृद्ध सज्जन ने रवि के हाथ में एक चिट्ठी दी। रवि ने उस चिट्ठी को पढ़ा, पढ़कर वह दूसरे कमरे मे गया। 3-4 मिनट्स मे रवि वहाँ वापिस आया और उस ऑटो वाले को कहा,"भाई साहब आप चले जाइए।" और वृद्ध सज्जन का सामान उतार कर घर के अंदर ले आया और कहा, "अंकल रात बहुत हो गई है, आप सो जाइए। मैं आपका काम कल सुबह कर दूँगा।" 

उस चिट्ठी में रवि के पिता ने रवि के लिए कुछ लिखा था। और वृद्ध सज्जन ने कहा कि, "आपके पिता ने मुझे भरोसा दिलाया है कि मेरा लड़का आपका काम जरूर से जरूर करेगा, आप बिना किसी चिंता के निसंकोच वहाँ चले जाओ।" बात यह थी कि उस वृद्ध सज्जन के एकमात्र बेटे का अचानक एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया था। सिर्फ बुजुर्ग दंपत्ति घर में थे और लालन-पालन की दिक्कत होने लग गई थी। यहाँ तक कि दैनिक जीवन के खर्चों की भी पूर्ति नही कर पा रहे थे। वह तो नहीं चाहते थे, अपने बेटे की मृत्यु का कंपनसेशन लेना, लेकिन जब कोई रास्ता ना बचा तो मजबूरी में उनको कंपनसेशन लेने का सोचना पड़ा और जब सोचना पड़ा तो उन्हें पता चला कि एक कागज है जो उन्हें दिल्ली में जाकर सर्टिफाई कराना पड़ेगा। सालों साल वृद्ध सज्जन अपने छोटे से गाँव से बाहर निकले नहीं थे, दिल्ली उनके लिए बहुत डरावनी और बहुत बड़ी जगह थी। इतने में उनके पुराने मालिक ने अपने बेटे के नाम से चिट्ठी बनाकर दी कि जाओ मेरा बेटा रवि आपकी मदद करेगा। अगले दिन सुबह अंकल उठे, रवि ने उनको बढ़िया नाश्ता कराया। अपनी गाड़ी में बिठाया। रवि ने छुट्टी ली और छुट्टी लेकर रवि उस ऑफिस में गया, फिर बहुत मेहनत मशक्कत करके आखिर वह दस्तावेज निकाल दिए। दस्तावेज सर्टिफाइड कराने के बाद अंकल के बस की टिकट करा दी। टिकट के साथ मिठाई का एक डब्बा दिया और बस स्टैंड पर छोड़कर निकलने ही वाला था कि इतने में वृद्ध सज्जन ने हाथ जोड़कर कहा, "रवि तुम्हारे पिता धन्य है कि उन्होंने तुम्हारे जैसी संतान को पैदा किया। वे बहुत भाग्यशाली है। तुम कुछ कहना चाहते हो क्या? मैं आपके पिता को संदेश दे दूँगा। कहना तो मुझे भी बहुत कुछ है, पर अगर आपकी कोई बात पहुँचानी हो तो....." रवि एक पल के लिए एकदम शांत हो जाता है। फिर धीरे से कहता है, "माफ कीजिएगा अंकल, आपसे एक बात कहना चाहता हूँ।" वे सज्जन बोले, "कहिए न बेटा।" रवि ने कहा, "अंकल मैं वह रवि नहीं हूँ।" उस पर उस वृद्ध सज्जन ने हैरानी से कहा, "पर बेटा तुम्हारे मकान के बाहर तो रवि निवास लिखा था।" "हाँ, वह मेरा रवि निवास है। मेरा नाम भी रवि है, लेकिन मैं वह रवि नहीं हूँ, जिसे आप ढूँढने आए थे।"उस वृद्ध सज्जन को कुछ समझ नहीं आया, तो रवि बोला, "कल रात को जब आप आए थे, तब आप हाफ रहे थे, लेकिन आपकी आँखों में वह उम्मीद थी कि उनका बेटा आपकी मदद जरूर करेगा। जब मैंने चिट्ठी पढ़ी तो मैंने आपके वाले रवि को फोन किया। वह एकदम से परेशान हो गया और असमंज मे पड़ गया क्योंकि वह कहीं बाहर गया हुआ था और आठ दस दिन बाद आने वाला था। साथ ही आपको देखकर मुझे मेरे पिता याद आ गए, जिनके लिए मैं जीवन भर कुछ ना कर पाया। मेरे पास हिम्मत भी नहीं थी कि मैं आपकी उम्र और भावना को देखते हुए आपको वापस भेज सकूँ। तब मैंने निर्णय लिया कि आपका यह काम मैं करूँगा।" उस वृद्ध व्यक्ति की आँखों से आँसु बहने लगे और वह बोले कि, "तुम रवि को जानते नहीं हो?" रवि बोला, "अंकल मैं उसको नही जानता , आपकी चिट्ठी में उनका फोन नंबर था, मैंने उन्हें फोन लगाया।" उस पर उन्होंने फिर से पूछा, "तुम वह रवि भी नहीं हो?" वह फिर से बोला, "हाँ, मैं वह रवि भी नहीं हूँ।" उस पर उस वृद्ध ने कहा, "फिर भी तुमने मेरे लिए छुट्टी ली और इतना किया। कौन कहता है भगवान नहीं होता।" इसको बार-बार दोहराते हुए वह बस में बैठ कर चले गए। रवि अपने घर पहुँचा और उस रात उसे अपने जीवन की सबसे ज्यादा सुकून वाली नींद आई।

 कठिनाईयां 

एक धनी राजा ने सड़क के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा पत्थर रखवा दिया और चुपचाप नजदीक के एक पेड़ के पीछे जाकर छुप गया। दरअसल वो देखना चाहता था कि कौन व्यक्ति बीच सड़क पर पड़े उस भारी-भरकम पत्थर को हटाने का प्रयास करता है। कुछ देर इंतजार करने के बाद वहां से राजा के दरबारी गुजरते हैं। लेकिन वो सब उस पत्थर को देखने के बावजूद नजरअंदाज कर देते हैं। इसके बाद वहां से करीब बीस से तीस लोग और गुजरे लेकिन किसी ने भी पत्थर को सड़क से हटाने का प्रयास नहीं किया। करीब डेढ़ घंटे बाद वहां से एक गरीब किसान गुजरा। किसान के हाथों में सब्जियां और उसके कई औजार थे। किसान रुका और उसने पत्थर को हटाने के लिए पूरा दम लगाया। आखिर वह सड़क से पत्थर हटाने में सफल हो गया। पत्थर हटाने के बाद उसकी नजर नीचे पड़े एक थैले पर गई। इसमें कई सोने के सिक्के और जेवरात थे। उस थैले में एक खत भी था जो राजा ने लिखा था कि ये तुम्हारी ईमानदारी, निष्ठा, मेहनत और अच्छे स्वभाव का इनाम है। जीवन में भी इसी तरह की कई रुकावटें आती हैं। उनसे बचने की बजाय उनका डटकर सामना करना चाहिए। 

शिक्षा 

मुसीबतों से डर कर भागे नहीं, उनका डटकर सामना करेंl

भाग्य की दौलत 



एक बार एक महात्मा जी निर्जन वन में भगवद्चिंतन के लिए जा रहे थे। तो उन्हें एक व्यक्ति ने रोक लिया। वह व्यक्ति अत्यंत गरीब था। बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटा पाता था। उस व्यक्ति ने महात्मा से कहा..महात्मा जी, आप परमात्मा को जानते है, उनसे बातें करते है। अब यदि परमात्मा से मिले तो उनसे कहियेगा कि मुझे सारी उम्र में जितनी दौलत मिलनी है, कृपया वह एक साथ ही मिल जाये ताकि कुछ दिन तो में चैन से जी सकूँ। महात्मा ने उसे समझाया - मैं तुम्हारी दुःख भरी कहानी परमात्मा को सुनाऊंगा लेकिन तुम जरा खुद भी सोचो, यदि भाग्य की सारी दौलत एक साथ मिल जायेगी तो आगे की ज़िन्दगी कैसे गुजारोगे ? किन्तु वह व्यक्ति अपनी बात पर अडिग रहा। महात्मा उस व्यक्ति को आशा दिलाते हुए आगे बढ़ गए। इन्हीं दिनों में उसे ईश्वरीय ज्ञान मिल चूका था। महात्मा जी ने उस व्यक्ति के लिए अर्जी डाली। परमात्मा की कृपा से कुछ दिनों बाद उस व्यक्ति को काफी धन - दौलत मिल गई। जब धन -दौलत मिल गई तो उसने सोचा,-मैंने अब तक गरीबी के दिन काटे है, ईश्वरीय सेवा कुछ भी नहीं कर पाया। अब मुझे भाग्य की सारी दौलत एक साथ मिली है। क्यों न इसे ईश्वरीय सेवा में लगाऊँ क्योंकी इसके बाद मुझे दौलत मिलने वाली नहीं। ऐसा सोचकर उसने लगभग सारी दौलत ईश्वरीय सेवा में लगा दी। समय गुजरता गया। लगभग दो वर्ष पश्चात् महात्मा जी उधर से गुजरे तो उन्हें उस व्यक्ति की याद आयी। महात्मा जी सोचने लगे - वह व्यक्ति जरूर आर्थिक तंगी में होगा क्योंकी उसने सारी दौलत एक साथ पायी थी। और कुछ भी उसे प्राप्त होगा नहीं। यह सोचते -सोचते महात्मा जी उसके घर के सामने पहुँचे। लेकिन यह क्या ! झोपड़ी की जगह महल खड़ा था ! जैसे ही उस व्यक्ति की नज़र महात्मा जी पर पड़ी, महात्मा जी उसका वैभव देखकर आश्चर्य चकित हो गए। भाग्य की सारी दौलत कैसे बढ़ गई ? वह व्यक्ति नम्रता से बोला, महात्माजी, मुझे जो दौलत मिली थी, वह मैंने चन्द दिनों में ही ईश्वरीय सेवा में लगा दी थी। उसके बाद दौलत कहाँ से आई - मैं नहीं जनता। इसका जवाब तो परमात्मा ही दे सकता है। महात्मा जी वहाँ से चले गये। और एक विशेष स्थान पर पहुँच कर ध्यान मग्न हुए। उन्होंने परमात्मा से पूछा - यह सब कैसे हुआ ? महात्मा जी को आवाज़ सुनाई दी। किसी की चोर ले जाये , किसी की आग जलाये

धन उसी का सफल हो जो ईश्वर अर्थ लगाये।


प्रभु की कृपा
एक राजा था। उसका मन्त्री भगवान् का भक्त था। कोई भी बात होती तो वह यही कहता कि भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी! एक दिन राजा के बेटे की मृत्यु हो गयी। मृत्यु का समाचार सुनते ही मन्त्री बोल उठा - भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी! यह बात राजा को बुरी तो लगी, पर वह चुप रहा। कुछ दिनों के बाद संयोगवस राजा की पत्नी की भी मृत्यु हो गयी। मन्त्री ने पुनः कहा - भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी! राजा को गुस्सा आया, पर उसने गुस्सा पी लिया, कुछ बोला नहीं। एक दिन राजा के पास एक नयी तलवार बनकर आयी। राजा अपनी अंगुली से तलवार की धार का परीक्षण करने लगा तो धार बहुत तेज होने के कारण चट उसकी अँगुली कट गयी! मन्त्री पास में ही खड़ा था । वह पुनः बोला- भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी! अब राजा के भीतर भरा क्रोध बाहर निकला और उसने तुरन्त मन्त्री को राज्य से बाहर निकल जाने का आदेश दे दिया और कहा कि मेरे राज्य में अन्न-जल ग्रहण मत करना। मन्त्री बोला - भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी! मन्त्री अपने घर पर भी नहीं गया, साथ में कोई वस्तु भी नहीं ली और राज्य के बाहर निकल गया। कुछ दिन बीत गये। एक बार राजा अपने साथियों के साथ शिकार खेलने के लिये जंगल गया जंगल में एक हिरण का पीछा करते-करते राजा बहुत दूर घने जंगल में निकल गया। उसके सभी साथी बहुत पीछे छूट गये। वहाँ जंगल में डाकुओं का एक दल रहता था। उस दिन डाकुओं ने कालीदेवी को एक मनुष्य की बलि देने का विचार किया हुआ था। संयोग से डाकुओं ने राजा को देख लिया। उन्होंने राजा को पकड़कर बाँध दिया। अब उन्होंने बलि देने की तैयारी शुरू कर दी। जब पूरी तैयारी हो गयी, तब डाकुओं के पुरोहित ने राजा से पूछा- तुम्हारा बेटा जीवित है? राजा बोला- नहीं, वह मर गया। पुरोहित ने कहा कि इसका तो हृदय जला हुआ है। पुरोहित ने फिर पूछा-तुम्हारी पत्नी जीवित है? राजा बोला - वह भी मर चुकी है। पुरोहित ने कहा कि यह तो आधे अंगका है । अत: यह बलि के योग्य नहीं है। परन्तु हो सकता है कि यह मरने के भय से झूठ बोल रहा हो! पुरोहित ने राजा के शरीर की जाँच की तो देखा कि उसकी अँगुली कटी हुई है। पुरोहित बोला-अरे! यह तो अंग-भंग है,बलि के योग्य नहीं है ! छोड़ दो इसको ! डाकुओं ने राजा को छोड़ दिया। राजा अपने घर लौट आया। लौटते ही उसने अपने सिपाहियों को आज्ञा दी कि हमारा मन्त्री जहाँ भी हो, उसको तुरन्त ढूँढ़कर हमारे पास लाओ। जब तक मन्त्री वापस नहीं आयेगा, तब तक मैं अन्न ग्रहण नहीं करूँगा। राजा के सैनिको ने मन्त्री को ढूँढ़ लिया और उससे तुरन्त राजा के पास वापस चलने की प्रार्थना की। मन्त्री ने कहा - भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी! मन्त्री राजा के सामने उपस्थित हो गया। राजा ने बड़े आदरपूर्वक मन्त्री को बैठाया और अपनी भूल पर पश्चात्ताप करते हुए जंगल वाली घटना सुनाकर कहा कि 'पहले मैं तुम्हारी बात को समझा नहीं। अब समझ में आया कि भगवान् की मेरे पर कितनी कृपा थी! भगवान् की कृपा से अगर मेरी अँगुली न कटती तो उस दिन मेरा गला कट जाता! परन्तु जब मैंने तुम्हें राज्य से निकाल दिया, तब तुमने कहा कि भगवान् की बड़ी कृपा हो गयी तो वह कृपा क्या थी, यह अभी मेरी समझ में नहीं आया ! मन्त्री बोला-महाराज, जब आप शिकार करने गये, तब मैं भी आपके साथ जंगल में जाता। आपके साथ मैं भी जंगल में बहुत दूर निकल जाता; क्योंकि मेरा घोड़ा आपके घोड़े से कम तेज नहीं है। डाकूलोग आपके साथ मेरे को भी पकड़ लेते। आप तो अँगुली कटी होने के कारण बच गये, पर मेरा तो उस दिन गला कट ही जाता! इसलिये भगवान की कृपा से मैं आपके साथ नहीं था, राज्य से बाहर था; अत: मरने से बच गया। अब पुन: अपनी जगह वापस आ गया हूँ। यह भगवान् की कृपा ही तो है! कथा सार कहानी का सार यह है कि आज कल मनुष्य को सुविधा भोगने की इतनी बुरी आदत हो गयी है की थोड़ी सी भी विपरीत परिस्थिति में विचलित हो जाता है कई बार तो भगवान के अस्तित्त्व को भी नकारने लगता है उनके लिये यही संदेश है कि उस परमात्मा ने जब हम जन्म दिया है तो हमारा योगक्षेम भी वहां करने की जिम्मेदारी उसी की है बस हमे उसके प्रति निष्ठा बनाये रखनी होगी जिसे एक पिता के दो पुत्र हो एक कपूत दूसरा सपूत फिर भी पिता होने के नाते उसे दोनो की ही फिक्र रहेगी परंतु किसी भी कार्य अथवा सहयोग में प्राथमिकता सपूत को ही दी जाएगी। इसी प्रकार हमें उस परमात्मा के प्रति निष्ठा बनाये रखनी होगी सुख दुख जीवन में धूप छांया की तरह बने रहते है कभी स्थायी नही रहते हमारे अंदर उनको व्यतीत करके का धैर्य जगाना होगा और यह केवल परमात्मा की भक्ति से ही संभव है..!!




गुरुवार, 16 जून 2022

बोलना भी एक कला है


बोलना एक कला है 


      एक राजा भगवान का बड़ा भक्त तथा प्रजा वत्सल था। उनके बहुत बड़ा परिवार था। एक बार राजा को सपना आया। स्वपन में राजा ने देखा सामने पीपल का वृक्ष है उसके सारे पत्ते गिर गए। केवल एक पत्ता रह गया। दूसरे दिन राजा ने एक विद्वान ब्राह्मण से इस स्वपन का क्या अर्थ है के विषय में पूछा। वह ब्राह्मण विद्वान तो था लेकिन ज्ञानी नहीं था। ज्ञानी और विद्वान में फर्क रहता है। उसने अपने प्रश्न लग्न के अनुसार राजा के प्रश्न का उत्तर दिया ~"हे राजन आपका समस्त  परिवार मर जाएगा केवल आप ही बचेंगे।" राजा को इस बात पर बड़ा गुस्सा आया, उसने उस ब्राह्मण को कैद में डाल दिया। दूसरे दिन एक दूसरे ब्राह्मण को बुलवा करके अपने सपने की बात का उत्तर पूछा। वह ब्राह्मण विद्वान के साथ-साथ ज्ञानी भी था ।किस समय  किस आदमी के साथ कैसी बात करनी चाहिए वहअच्छी तरह से जानता था।

          .उस पंडित जी ने कहा *ओहो महाराज आप बहुत बड़े भाग्यशाली हैं आपके परिवार में सबसे लंबी आयु के आप ही हैं*। राजा ने मंत्री से कहा इस ब्राह्मण को मुंह मांगा इनाम दे दो। ब्राह्मण ने कहा महाराज आप यदि मुंह मांगा इनाम ही देना चाहते हैं तो कल जिस ब्राह्मण को आप ने जेल में डाला था उसको मुक्त कर दीजिए। क्योंकि वही बात मैंने कही है।

      आपके परिवार में सबसे लंबी आयु के आप ही हैं इसका मतलब आपके परिवार में सब मर जाएंगे केवल आप ही बचेंगे यानी कि आपकी ही लंबी आयु है।

       प्रिय सज्जनों बात वही है लेकिन कहने का तरीका अलग से है *बोलना एक कला है*

      ओरछा के राजा छत्रसाल के राज कवि केशवदास। एक बार केशवदास ने *रामचंद्रिका* नामक ग्रंथ की रचना करके राजा को भेंट में दिया। राजा ने राज कवि को प्रसन्न होकर के एक लाख रुपए दिए और कहा कविराज प्रसन्न हो गए हो ना। केशव दास जी ने मन में विचार किया राजा को अहंकार आ गया कि मैं ही सबसे बड़ा दानी हूं। 

      केशव दास ने कहा महाराज आपने एक लाख देकर के कौन सी बड़ी बात कर दी। इस पुस्तक में ऐसी ऐसी बातें हैं, एक एक बात का एक लाख मिलता है। राजा ने कहा कि इसका प्रमाण दो तभी कवि ने कहा कि मेरे पीछे आप अपने विश्वसनीय दो जासूस लगा दीजिए मैं किस व्यक्ति से क्या बात करूं ? इसकी सूचना आपको देते रहें।

         राजा ने वैसा ही किया ।राज कवि केशवदास जी वहां से आगरा पहुंचते हैं। एक भाग में रुक कर के अपने दूत को अकबर बादशाह के पास भेजा। वह दूत बादशाह से कहता है कि "ओरछा के राजकवि केशव दास जी आए हैं और थोड़ी देर के लिए ही ठहरेंगे" बादशाह अकबर ने बीरबल को इस बात का पता लगाने के लिए भेजा कि वह कवि कितना इनाम पाने का हकदार है।

       बीरबल कवि की अगवानी करने के लिए पहुंचा। बीरबल को केशव दास जी ने दूर से ही झुक कर देखने की एक्टिंग करते हुए देखा। ज्यूं ही बीरबल पास में आया केशव दास जी ने अपना मुंह फेर लिया। बीरबल ने कहा - कविराज मैं इतना गया बीता नहीं हूं कि आप मेरी शक्ल ही नहीं देखना चाहते हो ।

 *कविराज ने कहा नहीं नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है मैंने तो सुना था कि जो बीरबल का एक बार भी मुंह देख लेता है उसकी दरिद्रता उसी क्षण दूर हो जाती है मैं अपनी दरिद्रता को पीछे मुड़ कर देख रहा था कि वह कितनी दूर भाग गई*। 

     इस एक ही बात से बीरबल बहुत ही~प्रसन्न हो गया। और बादशाह से बोला- महाराज यह कवि महान कवि है इनको 2 लाख और एक हाथी भेंट में दिया जाए।

              प्रिय सज्जनों बोलना एक कला है रेल की यात्रा में पास में बैठी हुई महिला से व्यक्ति बोलता है माताजी थोड़े से आप दूर खिसक जाए तो मैं भी बैठ जाऊं ।

    यहां *माताजी* शब्द का अर्थ तो यही होता है न कि "मेरे बाप की औरत" लेकिन ऐसा कहने पर जूते पड़ने लग जाते हैं।

    महाराज छत्रसाल के विश्वसनीय दूतों ने सारी बात राजा को बताई
       वाणी घाव भी कर देती है और मल्हम भी लगा देती है ।

  *मिट जाएगा घाव तलवार का बोली का घाव भरे नहीं*

महारानी द्रौपदी  ने दुर्योधन को जब वह पानी को सुखी जगह समझकर उस में गिर जाता है तब "अंधों का बेटा अंधा ही होता है" ऐसा कह दिया था । इस एक ही वाक्य से भयंकर महाभारत का युद्ध हुआ।

    वाणी की देवता सरस्वती है हम अपने मुंह से गंदे शब्द निकाल कर के मां सरस्वती का महान अपराध करते हैं।

        संसार में जितने भी शब्द मुंह से निकलते हैं वह कभी समाप्त नहीं होते और आकाश में समा जाते हैं। दूरवचन दुष्प्रभाव डालते हैं। और सद्वचन सत प्रभाव डालते हैं। इसलिए कभी भी किसी भी हालत में मुंह से गंदे शब्द नहीं निकालना चाहिए।

       संसार में जितने कितने भी शब्द हैं वह सब के सब शब्द ब्रह्म का कोई न कोई अंग ही तो है

 *इसलिए गंदे शब्दों से शब्दब्रह्म का अपमान होता है*
        इसलिए हमारे शास्त्रों में लिखा है
   *प्रिय वाक्य प्रदानेन  सर्वे तुष्यंति जंतुवा:* 
 *तस्मात् एव वद:वचने का दरिद्रता*
*सत्यम ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात न ब्रूयाद् सत्यमप्रियम* 
*प्रियम्चनानृतं ब्रूयात् एष धर्म सनातन* 
*कागा किसका धन हरे कोयल किसको देय* *जीभडल्यांउ इमारत बसें जुगअपना कर लेय।*
*ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोए*
 *औरन को शीतल करे आप हो शीतल होय*
 प्रिय सज्जनों अपनी वाणी के द्वारा हम किसी के गुणों का बखान करें, किसी की प्रशंसा करें तो हमें पुण्य लाभ तो मिलता ही है इसके साथ-साथ वह व्यक्ति भी और उसके साथ वाले व्यक्ति भी हमसे प्रसन्न रहते हैं। इसलिए ऐसा बोलें कि सामने वाला यह कह दे वाह भाई वाह इस व्यक्ति से तो थोड़ी देर और बात करें तो अच्छा लगता है।

वर वधू के लिए निम्नलिखित फार्म भरे ।


Fill the following form for the bride and groom।
sumansangam.com 

           


शुक्रवार, 10 जून 2022

व्यापार/दया



 व्यापार या दया


हमेशा की तरह दोपहर को सब्जीवाली दरवाजे पर आई और चिल्लाई, चाची, "आपको सब्जियां लेनी हैं?"

 माँ हमेशा की तरह अंदर से चिल्लाई, "सब्जियों में क्या-क्या है?" सब्जीवाली :- ग्वार, पालक, भिन्डी, आलू , टमाटर....

दरवाजे पर आकर माँ ने सब्जी के सिर पर भार देखा और पूछा, "पालक कैसे दिया?"

सब्जीवाली :- दस रुपए की एक गठी।

मां:- पच्चीस रुपए में चार दो।

सब्जीवाली:- चाची नहीं जमेगा।

मां : तो रहने दो।

सब्जीवाली आगे बढ़ गयी, पर वापस आ गई।

सब्जीवाली:- तीस रुपये में चार दूंगी।

मां:- नहीं, पच्चीस रुपए में चार लूंगी।

सब्जीवाली :- चाची बिलकुल नहीं जमेगा...

और वो फिर चली गयी.......

थोड़ा आगे जाकर वापस फिर लौट आई। दरवाजे पर माँ अब भी खड़ी थी, पता था सब्जीवाली फिर लौट कर आएगी। अब सब्जीवाली पच्चीस रुपये में चार देने को तैयार थी।

माँ ने सब्जी की टोकरी उतरने में मदद की, ध्यान से पलक कि चार गठीयाँ परख कर ली और पच्चीस रुपये का भुगतान किया। जैसे ही सब्जीवाली ने सब्जी का भार उठाना शुरू किया, उसे चक्कर आने लगा। माँ ने उत्सुकता से पूछा, "क्या तुमने खाना खा लिया?"

सब्जीवाली:- नई चाची, सब्जियां बिक जाएँ, तो किरना खरीदूंगी, फिर खाना बनाकर खाऊँगी।

माँ: एक मिनट रुको बस यहाँ। 

और फिर माँ ने उसे एक थाली में रोटी, सब्जी, चटनी, चावल और दाल परोस दिया, सब्जीवाली के खाने के बाद पानी दिया और एक केला भी थमाया।

सब्जीवाली धन्यवाद बोलकर चली गयी।

मुझसे  नहीं रहा गया। मैंने अपनी माँ से पूछा, "आपने इतनी बेरहमी से कीमत कम करवाई, लेकिन फिर जितना तुमने बचाया उससे ज्यादा का सब्जीवाली को खिलाया।"

माँ हँसी और उन्होंने जो कहा वह मेरे दिमाग में आज तक अंकित है एक सीख कि तरह.....

व्यापार करते समय दया मत करो, किन्तु दया करते समय व्यापर मत करो!

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गुरुवार, 9 जून 2022

संवाद

 पति पत्नी का एक खूबसूरत संवाद -

 मैंने एक दिन अपनी पत्नी से पूछा ~

क्या तुम्हें बुरा नही लगता मैं बार-बार तुमको बोल देता हूँ डाँट देता हूँ फिर भी तुम पति भक्ति में लगी रहती हो, जबकि मैं कभी पत्नी भक्त बनने का प्रयास नही करता ?

मैं वेद का विद्यार्थी और मेरी पत्नी विज्ञान की परन्तु उसकी आध्यात्मिक शक्तियाँ मुझसे कई गुना ज्यादा है क्योंकि मैं केवल पढता हूँ और वो जीवन में उसका पालन करती है !!

मेरे प्रश्न पर जरा वो हँसी और गिलास में पानी देते हुए बोली ~ ये बताइए एक पुत्र यदि माता की भक्ति करता है तो उसे मातृ भक्त कहा जाता है परन्तु माता यदि पुत्र की कितनी भी सेवा करे उसे पुत्र भक्त तो नही कहा जा सकता न !!

मैं सोच रहा था आज पुनः ये मुझे निरुत्तर करेगी मैंने प्रश्न किया ~ ये बताओ .... जब जीवन का प्रारम्भ हुआ तो पुरुष और स्त्री समान थे, फिर पुरुष बड़ा कैसे हो गया जबकि स्त्री तो शक्ति का स्वरूप होती है ?

मुस्काते हुए उसने कहा ~आपको थोड़ी विज्ञान भी पढ़नी चाहिए थी !

                  मैं झेंप गया !

उसने कहना प्रारम्भ किया ~ दुनिया मात्र दो वस्तु से निर्मित है ...

         "ऊर्जा और पदार्थ"

पुरुष - ऊर्जा का प्रतीक है और स्त्री - पदार्थ की ..!

पदार्थ को यदि विकसित होना हो तो वह ऊर्जा का आधान करता है ना की ऊर्जा पदार्थ का ..!!

ठीक इसी प्रकार ... जब एक स्त्री एक पुरुष का आधान करती है तो शक्ति स्वरूप हो जाती है और आने वाली पीढ़ियों अर्थात् अपनी संतानों के लिए  प्रथम पूज्या हो जाती है क्योंकि वह पदार्थ और ऊर्जा दोनों की स्वामिनी होती है जबकि पुरुष मात्र ऊर्जा का ही अंश रह जाता है ..!

मैंने पुनः कहा ~ तब तो तुम मेरी भी पूज्य हो गई न क्योंकि तुम तो ऊर्जा और पदार्थ दोनों की स्वामिनी हो ?

अब उसने झेंपते हुए कहा ~ आप भी पढ़े लिखे मूर्खो जैसे बात करते है !

आपकी ऊर्जा का अंश मैंने ग्रहण किया और शक्तिशाली हो गई तो क्या उस शक्ति का प्रयोग आप पर ही करूँ ?

        ये तो कृतघ्नता हो जाएगी ..!

मैंने कहा ~ मैं तो तुम पर शक्ति का प्रयोग करता हूँ फिर तुम क्यों नही ?

उसका उत्तर सुन ... मेरी आँखों में आँसू आ गए !!

उसने कहा ~ जिसके संसर्ग मात्र से मुझमें जीवन उत्पन्न करने की क्षमता आ गई और ईश्वर से भी ऊँचा जो पद आपने मुझे प्रदान किया *जिसे माता कहते है !!* उसके साथ मैं विद्रोह नही कर सकती ! फिर मुझे चिढ़ाते हुए उसने कहा ~ यदि शक्ति प्रयोग करना भी होगा तो मुझे क्या आवश्यकता ? मैं तो माता सीता की भाँति,लव कुश तैयार कर दूँगी,जो आपसे मेरा हिसाब किताब कर लेंगे !

 नमन है ... सभी मातृ शक्तियों को जिन्होंने अपने प्रेम और मर्यादा में समस्त सृष्टि को बाँध रखा है ....!!*

          *'विज्ञान और अध्यात्म का अनोखा संगम'*

 राजा और चार रानियाँ 🍁


    एक समय की बात है, एक राजा था। उसकी चार पत्नियां थीं, जो एक से बढ़कर एक सुन्दर एवं गुणों से युक्त थीं। राजा उन चारों से अनुराग रखता था परंतु उसे चौथी पत्नी सर्वाधिक प्रिय थी फिर तीसरी, दूसरी और पहली। पहली पत्नी उनमें सर्वाधिक वयस्क थी। 


 एक दिन राजा वन में आखेट के लिए गया। वहाँ उसे एक अज्ञात कीट ने काट लिया और वह एक दुर्लभ बीमारी से ग्रसित हो गया। वैद्य एवं तांत्रिकों ने अपनी सारी विद्या का प्रयोग किया परंतु उसकी अवस्था को सुधार नहीं पाए। अंतत: उन्होंने यह कहा कि राजा की मृत्यु निकट है और अब वह कुछ ही दिनों के अतिथि हैं। 


 राजा ने अपनी संपत्ति को रानियों में विभाजित करने का निर्णय किया, क्योंकि उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं था। परंतु सामान्य रूप से विभाजन करने की जगह कौनसी रानी उसे कितना प्रेम करती है इस आधार पर संपत्ति को बांटने का निर्णय किया। उसने एक चतुर योजना बनाई और सभी रानियों को एक-एक कर के बुलाया।

 

 उसने कहा- “मेरे जीवन के केवल तीन दिन शेष हैं" मैं तुम्हें एक रहस्य बताता हूँ। बहुत पहले मुझे एक साधू ने एक शक्तिशाली यंत्र दिया था जिससे मुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी। यदि मैं साथ में एक और व्यक्ति को ले जाऊं। परंतु इससे पहले की स्वर्ग में प्रवेश करें हमे दारुण यंत्रणा सहन करनी होगी और नर्क में सात वर्ष व्यतीत करने होंगे। क्योंकि हम एक दूसरों से सर्वाधिक प्रेम करते हैं इसलिए मैंने यह निश्चय किया है कि मैं तुम्हें अपने साथ आने का यह अवसर प्रदान करूँगा।” 


 उसने चौथी रानी से आरम्भ किया जो सब से छोटी थी और जिससे वह सबसे अधिक प्रेम करता था। उन्होंने उससे पूछा, “क्या तुम मरने के बाद, मेरे साथ चलोगी ? रानी को राजा की आसन्न मृत्यु पर पूर्ण विश्वास था, और उसने भावना रहित स्वर में कहा “इसमें संदेह नहीं कि मैं आप से प्रेम करती हूं परंतु प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मृत्यु का स्वयं ही सामना करना होता है। "मैं यहॉ ही रानी के रूप में रहना पसंद करूंगी। मुझे तो प्रेम एवं सत्कार की आदत है।” मतलब चौथी पत्नी ने साफ़ मना कर दिया और चली गई। 


 राजा को अपनी तीसरी पत्नी भी बहुत प्यारी थी और उसपर उन्हें गर्व था। उन्होंने उसे बुलाया और साथ में मरने का पूछा। तीसरी पत्नी बोली, “मैं आपको यह सिद्ध करूँगी कि मैंने आपसे सबसे अधिक प्रेम किया है। पर मै आपके साथ नहीं चल सकती, मुझे अपनी ज़िन्दगी बहुत प्यारी है। 


 राजा की दूसरी पत्नी, हर मुश्किल समय में उनका साथ देती आ रही थी। राजा ने उससे भी साथ चलने का पूछा। दूसरी पत्नी ने कहा, “माफ़ कीजिये महाराज" ! मैं इसमें आपकी कोई मदद नहीं कर सकती। मैं आपका अंतिम संस्कार ज़रूर करवा सकती हूँ और मैं उस वक़्त तक आपके साथ रहूंगी। 


 तभी एक आवाज़ आती है, “मैं आपके साथ चलूंगी और जहाँ भी जाएंगे वहां जाऊँगी। भले ही वो मौत के बाद का सफर हो। ”राजा ने देखा, ये उनकी पहली पत्नी की आवाज़ थी। राजा अब शांति अनुभव करता है कि कोई तो है जो उसे बिना किसी अपेक्षा के प्रेम करता है। पर उन्होंने उसपर सबसे कम ध्यान दिया था।  


 राजा को बहुत शर्मिंदा महसूस हुआ। उन्होंने कहा, “जब तक मैं जीवित था, तुम्हारा ध्यान रखना चाहिए था। तुम्हारी कद्र करनी चाहिए थी।” उन्होंने पहली पत्नी से माफ़ी मांगी। 


 इस कहानी का भावार्थ हमें क्या सिखाती है?? वास्तव में यह कथा आप की, हमारी और प्रत्येक मनुष्य की है। हर व्यक्ति की चार निम्नलिखित पत्नियां होती हैं– 


 चौथी पत्नी है, हमारा (शरीर) हम इसे खूब सजाते हैं, गहने पहनाते हैं, अच्छे कपडे पहनाते हैं पर आखिर में ये हमारा साथ छोड़ देती है। 


 हमारी तीसरी पत्नी होती है (धन- संपत्ति) हम जीवन का बहुत सारा समय, घर को साजो सामान से भरने में लगा देते हैं। वो भी हमारे साथ नहीं चल सकती। 


 दूसरी पत्नी है हमारा (परिवार और दोस्त) वो हमारा हर सुख दुःख में साथ देते हैं, लेकिन ज़्यादा से ज़्यादा, वो हमारे आखरी समय में हमे अलविदा कहने आ सकते हैं। पर साथ में नहीं चल सकते। 


पहली पत्नी होती है हमारा (चरित्र व संस्कार) जिस पर हम ज़्यादा ध्यान नहीं देते। पर ये ही वो पत्नी है जो मरने के बाद भी हमारा साथ नहीं छोड़ती, सदा साथ जुडी रहती है।


 हममे से अधिकतर लोग इस कहानी के राजा की तरह ही जीवन जीते हैं। ऊपर लिखे क्रमानुसार ही अपनी पत्नियों से प्रेम करते हैं। हालांकि यह जीवन का आधार भी हैं और आवश्यक भी है कि साजो सामान के साथ आरामदायक जीवन जियें। परिवार और दोस्तों को, प्यार से संजो कर रखें। अपने शरीर का ध्यान रखें, इसे स्वस्थ रखें

बुधवार, 8 जून 2022

जानकारी काल - जून - 2022

 हिंदी मासिक 

जानकारी काल 

वर्ष-23,             अंक-01 ,           जून - 2022,          पृष्ठ 44,        मूल्य-2-50

 


पिवन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः, स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः । 

नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः, परोपकाराय सतां विभूतयः ॥ 

भावार्थ - नदियाँ अपना पानी स्वयं  नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते, बादल अपने जल से उगा हुआ अनाज स्वयं नहीं खाते । इसी प्रकार सत्पुरुष भी अपने सत्प्रयासों से प्राप्त लाभ/ उपलब्धि का भोग स्वयं नहीं करते। वास्तव में सत्पुरुषों का जीवन परोपकार के लिए ही होता है

संरक्षक

 श्रीमान कुलवीर शर्मा

महामंत्री समर्थ शिक्षा समिति

डॉ वी  एस नेगी

प्रोफेसर भगत सिंह कॉलेज सांध्य


 प्रधान संपादक व  प्रकाशक

 सतीश शर्मा 


 

 कार्यालय

 ए 214 बुध नगर इंद्रपुरी

 नई दिल्ली 110012


 मोबाइल

  9312002527


 संपादक मंडल

 सौरभ  शर्मा,कपिल शर्मा,

गौरव शर्मा,डॉ अजय प्रताप सिंह, करुणा ऋषि, डॉ मधु वैध, भूप  सिंह यादव, ऋतु सिंह, राजेश शुक्ल  


प्रकाशक व मुद्रक सतीश शर्मा के लिय ग्लैक्सी प्रिंटर-106 F,कृणा नगर नई दिल्ली 110029, A- 214 बुध नगर इं पूरी नई दिल्ली  110012 से प्रकाशित |


सभी लेखों पर संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है पत्रिका में किसी भी लेख में आपत्ति होने पर उसके विरुद्ध कार्रवाई केवल दिल्ली कोर्ट में ही होगी

 

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        इन्हें भी पड़े 


सम्पादकीय   - 2 

राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष  - 3  ,

संतान के लिए अपमान भी मंजूर  - 7  ,

नविन शिक्षा नीति  - 8   ,

पक्षी की बोली व व्यवहार की पढाई  - 10  ,

दबाव  - 11 , कहानी 

दान   -  , कहानी 

स्वामी विवेकानन्द का शिक्षा दर्शन  -13  ,

एतिहासिक नीलामी   - 16  , कहानी 

हवन में नवग्रह की समिधा का महत्व   - 18 

शीतल पेय से दूर रहो स्वस्थ रहो  - 20 ,

जून मास के महत्व पूर्ण दिवस - 23 , 

मानस पूजा  25 ,

जून का महिना कविता  - 26

गुरु कौन - 27

भगवती - 29 

मासिक पंचांग,पंचक विचार,भद्रा विचार,जून मास के व्रत,सर्वार्थ सिद्ध योग,मूल विचार - 30

श्री राम और नाम - 33 

अनकही कथा पुस्तक का विमोचन - 34

कर्मफल - 35 

मुंग की दाल के लडू ,राम लडू - 38

विभिन्न वारो में पैदा हुए बच्चों का स्वभाव - 39 

राहू ग्रह के गोचर का हमारे जीवन पर प्रभाव - 41    



सम्पादकीय  

तिः शमो दमः शौचं कारुण्यं वागनिष्ठुरा। 

मित्राणाम् चानभिद्रोहः सप्तैताः समिधः श्रियः।। 

अर्थ– धैर्य, मन पर अंकुश, इन्द्रियसंयम, पवित्रता, दया, मधुर वाणी और मित्र से द्रोह न करना ये सात चीजें लक्ष्मी को बढ़ाने वाली हैं।

मन एकाग्र होने से काम करने की शक्तियां जागृत होती है जिससे शक्तियों  के साथ संबंध बना रहता है दूसरी बात मन को एकाग्र करने के लिए अभ्यास की आवश्यकता है जो बाहरी शक्ति की सहायता के बिना संभव नहीं है | तीसरी बात एकाग्र  होने पर मन कुछ समय के लिए निरुद्ध हो जाता है | जिससे फिर रुकावट उत्पन्न हो जाती है | यह रूकावट बाहरी शक्ति  से संबंध होने के कारण ही होता है | तात्पर्य है कि मन एकाग्र होने से बाहरी शक्तियों से संबंध भी खत्म  नहीं होता अपितु शक्तियों  के साथ और जोड़ता है |परंतु चाहत का नाश होने पर बाहरी शक्ति  से संबंध विच्छेद हो जाता है | इसलिए गीता में  मन की एकाग्रता का कोई बहुत बढ़ा महत्व नहीं है | राग रहित होने का महत्व है | मन को वश में करने अथार्त  शुद्ध करने के दो  उपाय हैं – कहीं भी लगाव व चाहत हो ना सब में प्रभु  को देखना | जब तक हम सबके  के भीतर चाहत व लगाव  रहता  हैं  तब तक वह सब में प्रभु को नहीं देख पाते और  जब तक हम सब  में भगवान को नहीं देखते तब तक मन सर्वदा बस में नहीं होता | कारण कि जब तक हमारी  दृष्टि एक प्रभु  के सिवाय दूसरी सत्ता की मान्यता रहती है तब तक मन का सर्वदा निरोध नहीं हो सकता | जिस प्रकार भोर की प्रथम किरणों के साथ कुछ पुराने फूल झड़ जाते हैं और नयें फूल खिल उठते हैं व प्रकृत्ति को सुवासित करते हैं। कुछ सूखे पत्ते पेड़ से जमीन पर गिर जाते हैं और नयीं कोंपलें फूट पड़ती हैं व प्रकृत्ति को श्रृंगारित करती हैं।उसी प्रकार मन प्रभु सत्ता मानते ही प्रसन्न हो जाता है | उसी प्रकार एक नया दिन एक एक नईं ऊर्जा और एक नयें विचार के साथ आता है। एक नया दिन आता है तो साथ में नया उल्लास और नईं आश लेकर भी आता है ताकि हम अपने जीवन को नयें विचारों से सुवासित एवं उल्लासित कर सकें। समय के साथ साथ जो पुराना है, जो ताज्य है और जो अनावश्यक है उसका परित्याग करना भी अनिवार्य हो जाता है। मानव मन को भी रोज रोज सद्विचार और सत्संग रूपी साबुन से सफाई की जरूरत होती है ताकि कुविचारों की कलुषिता को अच्छे से साफ करके जीवन को उज्ज्वलता और धवलता प्रदान की जा सके। विचारों की कलुषिता का मार्जन हो सके। बुद्धि को भी रोज के रोज साफ करके कुछ श्रेष्ठ विचार, कुछ सद्विचार न भरे जाएं तो हमारे वही अपवित्र विचार जीवन की  उन्नति में बाधक बन जाते हैं। 


         



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना को 100 वर्ष


डॉ. मनमोहन वैद्य

सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना को 100 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं. 1925 में नागपुर में संघ स्थापना हुई थी. इस घटना को इस वर्ष 2022 की विजयादशमी को 97 वर्ष पूर्ण होंगे. संघ का कार्य किसी की कृपा से नहीं, केवल संघ के कार्यकर्ताओं के परिश्रम, त्याग, बलिदान के आधार पर तथा समाज के लगातार बढ़ते समर्थन से और सर्वशक्तिमान श्रीपरमेश्वर के आशीर्वाद से सतत बढ़ता आ रहा है. अनेक विरोध, अवरोध और संकटों को पार कर संघ का व्याप, शक्ति और प्रभाव लगातार बढ़ता रहा है. इसलिए संघ की चर्चा भी सर्वत्र होती दिखती है. संघ अपनी शताब्दी कैसे मनाएगा इसकी भी उत्सुकता लोगों में है.

संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार की दृष्टि बहुत स्पष्ट थी कि संघ समाज में एक संगठन के नाते नहीं, बल्कि समूर्ण समाज का संगठन है. संघ के ज्येष्ठ चिंतक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी कहते थे कि परिकल्पना की दृष्टि से संघ और हिन्दू समाज समव्याप्त है (conceptually RSS and Hindu society are co-terminus) और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से वह एकात्म है. ( psychologically they are one.)

इसलिए संघ की शताब्दी का उत्सव मनाने का विचार ही नहीं हो सकता है. संघ सम्पूर्ण समाज है. संघ की साधना को समाज व्यापी करना यही लक्ष्य होना चाहिए. डॉ. हेडगेवार तो कहते थे कि हमें संघ का रौप्य महोत्सव भी नहीं मनाना है. उस के पहले कार्य पूर्ण कर डालना है. इसी लगन से वे संघ कार्य को बढ़ाने में पूर्ण शक्ति के साथ जुट गए थे. अर्थात उन्हें केवल १५ वर्ष मिले. इसलिए शताब्दी वर्ष के पूर्व संघ कार्य पूर्ण करना, यही शताब्दी मनाने का निहितार्थ हो सकता है. “कार्यमग्नता जीवन हो और कार्यपूर्ति ही विश्रांति” ऐसा एकसंघ गीत है.

संघ कार्य की इस विस्तार यात्रा के चार प्रमुख पड़ाव (phases) रहे हैं. पहला पड़ाव संघ स्थापना से स्वाधीनता तक माना जाएगा. जिस में एक चित्त से, एकाग्रता से केवल संगठन पर ही ध्यान केंद्रित था. क्योंकि हिन्दू समाज संगठित हो सकता है, कदम से कदम मिलाकर एक दिशा में एक साथ चल सकता है, एक मन से एक स्वर में भारत की, हिन्दुत्व की बात कर सकता  है, ऐसा विश्वास निर्माण करना आवश्यक था. इसीलिए इसी को केंद्र बिंदु बनाकर सारे कार्य चल रहे थे. स्वयंसेवक व्यक्तिगत स्तर पर उस समय चल रहे स्वाधीनता आंदोलन, समाज सुधार आदि आंदोलनों में भाग ले रहे थे, पर संघ संगठन के नाते पूरा ध्यान संगठन पर ही केंद्रित था.

हज़ार वर्षों के सतत संघर्ष के उपरांत स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा ‘स्व’ के आधार पर समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समाज एवं राष्ट्र जीवन की दिशा खड़ी हो इस हेतु से शिक्षा, विद्यार्थी, राजनीती, मजदूर, वनवासी समाज, किसान आदि क्षेत्रों में भारत के शाश्वत राष्ट्रीय विचार से प्रेरित विविध संगठन आरम्भ हुए. संगठन का कार्य तो चल ही रहा था, परन्तु उसके साथ साथ सम्पूर्ण समाज जीवन को व्याप्त करने वाले अनेक जनसंगठन भी आरम्भ हुए.

आज संघ कार्य शाखा के रूप में 90 % विकास खंडों तक पहुंचा है और 35 से भी अधिक जनसंगठन समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं, प्रभावी भी हैं.

संघ कार्य की विकास यात्रा का तीसरा पड़ाव डॉ. हेडगेवार जन्मशती के पश्चात् 1990 से शुरू हुआ. सम्पूर्ण समाज को आत्मीयता और प्रेम के आधार पर संगठित करना है तो समाज के वंचित, दुर्बल, पिछड़े और विकास की सुविधाओं के अभाव में जीने वाले अपने ही समाज के बांधवों तक पहुँच कर उनकी सहायता तथा सेवा करना अपना दायित्व मान कर उनके समग्र विकास के उद्देश्य से सेवा विभाग का (1990 में) आरम्भ हुआ.

उसी तरह “राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने के लिए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक (स्वयंसेवक) बना हूँ"... ऐसी प्रतिज्ञा स्वयंसेवक करता है. यह सर्वांगीण उन्नति का कार्य केवल स्वयंसेवक करेंगे, यह संभव ही नहीं हैं. समाज में अनेक प्रभावी, अच्छे मन के लोग है जो समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, स्वयं कर भी रहे हैं. उनकी और उनके कार्य की जानकारी संघ को नहीं है और संघ की सही जानकारी, संघ का राष्ट्रीय विचार उन तक नहीं पहुंचा है.

समाज के ऐसे प्रभावी लोगों की विशेषता, सक्रियता, उपलब्धि, समाज में योगदान आदि की जानकारी प्राप्त करना और संघ का विचार, कार्य आदि की जानकारी उन्हें देना, इस हेतु से संपर्क विभाग का कार्य 1994 से आरम्भ हुआ. संपर्क विभाग के माध्यम से नए सम्पर्कित व्यक्ति शायद संघ से नहीं भी जुड़ेंगे पर संघ स्वयंसेवक के नाते हम उनसे जुड़ें, परस्पर विचारों का, अनुभवों का, उपलब्धियों का आदान- प्रदान हो और समान रूचि के विषयों में हम मिलकर साथ कार्य कर सकें.

1967 में पहली बार मध्यप्रदेश और ओडिसा राज्यों में ईसाई कन्वर्जन को रोकने हेतु वहां की विधान सभा में बिल पारित हुआ था. तब केंद्र में तथा इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की ही सरकार थी. उसके पश्चात् साधारणतः भारतीय जनता पार्टी के शासन काल में ही विभिन्न राज्यों में कन्वर्जन को रोकने के लिए बिल पारित हुए. इसमें एकमात्र अपवाद हिमाचल प्रदेश का है. 2006 में श्री वीरभद्रसिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने कन्वर्जन के विरुद्ध बिल पारित किया था. अभी कुछ वर्ष पूर्व संघ के अधिकारी संपर्क विभाग के अंतर्गत श्री वीरभद्रसिंह जी से मिलने गए थे. तब उन्होंने ही, स्वयं हो कर, उनके ही कार्यकाल में कैसे यह कन्वर्ज़न विरोधी बिल पारित हुआ था, यह बताकर आगे कहा कि हिमाचल प्रदेश के बाहर भारत में कहीं पर भी कन्वर्जन को रोकने के लिए उनका उपयोग होता है तो वे साथ आ सकते हैं. 2008 - 09 में जब गौ-ग्राम रथ यात्रा निकली थी, तब अनेक स्थानों पर सर्वोदय के कार्यकर्ता इस यात्रा में सहभागी हुए थे. इस तरह मुद्दों के आधार पर (issue based) सहकार्य और सक्रियता संपर्क के कारण ही संभव हुई. हो सकता है कि सभी विषयों पर संघ के विचार या दृष्टिकोण से ये लोग सहमत नहीं भी हों.

उसी तरह विविध प्रसार माध्यमों का उपयोग करते हुए संघ के राष्ट्रीय विचारों का प्रसार समाज में हो, संघ के विरुद्ध सहेतुक गलत प्रचार करते हुए संघ की एक नकारात्मक छवि निर्माण करने का जो प्रयास लगातार चल रहा है, उस का उत्तर देते हुए संघ की सही जानकारी लोगों तक पहुँचाने के लिए और संघ के स्वयंसेवकों द्वारा जो रचनात्मक कार्य बड़ी संख्या में चल रहे हैं, उनकी जानकारी इन माध्यमों द्वारा समाज को देने के उद्देश्य से 1994 में ही प्रचार विभाग का आरम्भ हुआ. प्रसार के, जनसंवाद के सभी माध्यमों का उपयोग एवं प्रयोग करते हुए संघ का प्रचार विभाग अब सक्रिय है, इसकी दखल भी ली जा रही है. ये तीनों (सेवा, संपर्क तथा प्रचार) संघ के कार्य विभाग के माध्यम से सुदूर लोगों तक संघ पहुँचाकर (outreach) समाज जागरण के कार्य में स्वयंसेवक लगे हैं.

इसी समय समाज की कुछ समस्याओं के लिए तुरंत विशेष ध्यान देकर समाज परिवर्तन के कार्य भी शुरू हुए. “धर्मजागरण विभाग” के माध्यम से हिन्दू समाज को कन्वर्ट करने के चल रहे योजनाबद्ध प्रयासों को विफल करना तथा वे कनवर्टेड लोग जो फिर से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए मार्ग सुलभ करने का कार्य आरम्भ हुआ.

सरकार पर निर्भर न रहते हुए अपने गांव का विकास सभी ग्रामवासी मिलकर करेंगे, सरकारी योजनाओं का आवश्यक उपयोग करते हुए ग्राम का सर्वांगीण विकास हम सब मिलकर करेंगे, इस उद्देश्य से “ग्राम-विकास” का कार्य आरम्भ हुआ.

हमारा एकसंध हिन्दू समाज विभिन्न जातियों के नाम से जाना जाता रहा है. परन्तु जातीय विद्वेष बढ़ाकर जातिभेदों में समाज को बाँटने का कार्य भी कुछ निहित तत्व करते रहे हैं. सामाजिक सद्भाव बैठकों के माध्यम से सभी ने एकत्र बैठ कर कुछ सांझी समस्याओं और चुनौतियों के बारे में विचार करना तथा उससे उबरने के सामूहिक प्रयास करने की दृष्टि से “सामाजिक सद्भाव” बैठकों की श्रृंखला शुरू हुई. हमारे ही समाज के कुछ वर्ग को अछूत कहकर शिक्षा, सुविधा और सम्मान से दुर्भाग्य से वंचित रखा गया. यह सरासर अन्यायपूर्ण था. इस अन्याय को दूर कर अपनी सांझी विरासत को याद कराते हुए सब को साथ लेकर आगे बढ़ने के प्रयास “सामाजिक समरसता” के माध्यम से आरम्भ हुए.

भारतीय नस्ल की गायों से प्राप्त गौ उत्पाद के औषधीय महत्त्व के विषय में जनजागृति करना, भारतीय नस्ल की गायों का संरक्षण, संवर्धन, नस्ल सुधार करते हुए गोबर आधारित सेंद्रिय खेती करने के लिए किसानों को प्रशिक्षण, प्रबोधन एवं प्रोत्साहन देने की दृष्टि से “गौसेवा-गौसंवर्धन" का कार्य भी बहुत अच्छा चल रहा है. सारे भारत में हज़ारों की संख्या में गौशाला आरम्भ हुई है.

भारतीय संस्कृति और परंपरा में कुटुंब का विशेष महत्त्व है. पश्चिम का चिंतन मानता है कि समाज की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति है. पर भारतीय चिंतन की मान्यता है कि वह कुटुंब है. भारतीय आध्यात्मिक दृष्टि से कुटुंब यह “मैं से हम की यात्रा” का पहला कदम है. अभी शहरीकरण के कारण और जीवन की आपाधापी बढ़ने के कारण कुटुंब छोटे हुए हैं और सब को एक साथ बैठकर अपनी धरोहर, परंपरा, रिश्ते, त्यौहार आदि की चर्चा करने का समय भी नहीं मिल रहा है. इसलिए सप्ताह में कम से कम एक बार परिवार के सभी सदस्य एकत्र बैठ कर अपनी राष्ट्रीय धरोहर, परम्परा, सांस्कृतिक तथा वर्त्तमान सामाजिक परिस्थिति का राष्ट्रीय दृष्टि से विश्लेषण और उसके प्रकाश में अपने कर्तव्य की चर्चा करें, इस हेतु से “कुटुंब प्रबोधन" का कार्य आरम्भ हुआ.

सृष्टि हमारी, सभी प्राणियों की माँ है. परन्तु भौतिकतावादी जीवन के प्रभाव के कारण प्रकृति का शोषण ही होता रहा है. पश्चिम के विकास के मानकों (paradigm) के आधार पर चल कर हुए विकास ने केवल 500 वर्षों में ही सृष्टि के संतुलन को बिगाड़ दिया है. उस बिगड़े संतुलन को फिर से वापिस संतुलित करने के प्रयास में जनसहभाग बढ़ाकर “पर्यावरण" के बारे में जाग्रति और सक्रियता लाने की दृष्टि से “पर्यावरण संरक्षण” का कार्य शुरू हुआ है. ये सभी कार्य गतिविधि के नाम से समाज को आगे रख कर स्वयंसेवकों ने आरम्भ किये हैं. यह भी संघ कार्य की विकास यात्रा के तीसरे पड़ाव का ही भाग हैं.

अब संघ कार्य की विकास यात्रा का चौथा पड़ाव चल रहा है. प्रत्येक स्वयंसेवक राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने के लिए संघ के साथ घटक के नाते जुड़ता है. इसलिए प्रत्येक व्यवसायी या कमाने वाले तरुण स्वयंसेवक ने समाज परिवर्तन के लिए अपनी रूचि एवं क्षमता के अनुसार किसी भी एक क्षेत्र को चुनकर समाज जागरण एवं परिवर्तन के लिए सक्रिय सहभाग एवं सहयोग करना चाहिए, यह अपेक्षित है. संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी के 1940 के शिक्षा वर्ग में उन्होंने कहा था कि संघ कार्य को शाखा तक ही सीमित नहीं रखना है, उसे समाज में जा कर करना है. अपने परिवार के लिए आवश्यक अर्थार्जन करना, परिवार का ध्यान रखना और शाखा में नियमित जाना इतने मात्र से नहीं चलेगा. समाज परिवर्तन और जागरण के किसी भी कार्य में अपने समय का नियोजन कर सक्रिय होना यह संघ कार्य है. समाज में संघ कार्य प्रभावी पद्धति से करने हेतु अपने आप को तैयार करना, अखिल भारतीय दृष्टि प्राप्त कर आसेतु हिमाचल सारा समाज एक है, मेरा अपना है और सभी सामान है. इस भाव की अनुभूति करना, समाज को साथ लेकर स्वयं को पीछे रख कर समाज का नेतृत्व करने की सीख प्राप्त करने हेतु, उसका नियमित अभ्यास (practice) करने हेतु शाखा में नियमित जाना और शाखा द्वारा अर्जित इन सारे गुणों का प्रयोग करते हुए समाज परिवर्तन के लिए किसी भी एक क्षेत्र में सक्रिय होना, इसी पर सभी का ध्यान केंद्रित होना आवश्यक है. इसी के साथ साथ स्वयंसेवकों का समाज में अभिसरण बढ़ना चाहिए. जिससे समाज का नया वर्ग स्वयंसेवकों द्वारा संघ के सम्पर्क में आएगा, संघ को समझेगा, संघ के राष्ट्रीय विचारों को जानेगा और समाज का अंगभूत घटक के नाते हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति और हिन्दू समाज का संरक्षण कर इस राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने के लिए सन्नद्ध और सक्रिय होगा.

संगठन एवं व्यक्ति निर्माण का कार्य (संगठन श्रेणी) तो चलते ही रहेगा. समाज जागरण के कार्य (जागरण श्रेणी) भी साथ साथ चलेंगे. व्यवस्था परिवर्तन की दृष्टि से समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में विविध संगठनों के माध्यम से स्वयंसेवक सक्रिय हैं. अब प्रत्येक स्वयंसेवक ने समाज परिवर्तन के लिए अपने आप को सक्रिय करना और इन सभी के द्वारा संघ कार्य पूर्ति की ओर अग्रेसर होते हुए संघ कार्य पूर्णत्व की ओर ले जाना, यही शताब्दी का पर्व मनाने का उत्तम उपाय है. 

किमन्यैः श्रमै: शुन्यै:




संतान के लिए अपमान भी मंजूर 



एक धनवान व्यक्ति था। उसके कई सारे मित्र थे, उसमे एक मित्र तो बहुत अधिक निर्धन था। एक दिन धनवान व्यक्ति ने अपने जन्मदिवस पर सभी मित्रो को अपने घर भोजन का आमंत्रण देता है, सभी मित्र धनवान व्यक्ति  के घर आते है।

 भोजन के बाद धनवान व्यक्ति को ख्याल आता है कि उसने एक उंगली मे कीमती हीरे जड़ित अंगूठी पहनी हुई थी, थोड़ी ढीली होने के कारण कही गिर गई है। सभी मित्र घर मे अंगूठी खोजने मे मदद करते है। लेकिन नही मिलती।

 एक मित्र कहता है, आप हम सभी की तलाशी ले सकते है। एक व्यक्ति की वजह से हम सभी हमेशा के लिए आप की नजर मे शक के दायरे मे रहेगे…!!  सभी मित्र तलाशी के लिये तैयार हो जाते है… सिवाए उस अधिक निर्धन मित्र के…वो अपनी तलाशी देने से मना कर देता है, सभी मित्र उसका अपमान करते है।

धनवान व्यक्ति किसी की तलाशी ना लेकर सभी को विदा करता है। दूसरे दिन सुबह जब धनवान व्यक्ति अपने कोट की अंदर वाली जेब में हाथ डालता है तो अंगूठी मिल जाती है। और वो सीधा गरीब मित्र के घर आता है और अपने मित्रों द्वारा किये गऐ अपमान की क्षमा माँगता है और अपनी तलाशी ना देने की वजह पूछता है।

निर्धन मित्र पलंग पर सोये हुये अपने बीमार पुत्र की ओर संकेत करते हुए कहता है,मै जब आपके यहाँ आ रहा था, इस ने मिठाई खाने की जिद की थी।

    आप के यहाँ जब भोजन कर रहा था तो मिठाई मिली तो मैने वो स्वंय न खाकर अपने पुत्र के लिये जेब मे रख ली थी।

अगर तलाशी ली जाती तो अंगूठी की ना सही मिठाई की चोरी का आरोप जरूर लगता,इसीलिये अपमान सहना बेहतर समझा क्योंकि रात को सच बताता तो बीच मे बेटे का नाम भी आता.. और मैं अपनी परेशानी बताना नहीं चाहता था !!

यह सुनकर धनवान व्यक्ति ने उसके बेटे के इलाज के लिए मदद भी की।

इस कहानी से हमे सीख लेनी चाहिए!

माता-पिता अपनी संतान की छोटी-छोटी ख़ुशी के लिये क्या-क्या सहन नहीं करते..


नवीन शिक्षा नीति

समय और आवश्यकता के अनुसार नए कानून नीतियां और नीतियां बनाई जाती हैं। यह योजनाएं जनता और देश के हित को ध्यान में रखते हुए निर्धारित होती हैं। इनके सुपरिणाम तभी आ सकते हैं जब इनको अमल में लाने का कार्य सुचारु रुप से किया जाए। बच्चे ही किसी देश का भविष्य होते हैं और युवा पीढ़ी देश की रुधिर का काम करती है यदि वही मजबूत नहीं होगी तो देश का ढांचा भी मजबूत नहीं हो पाएगा इस सच्चाई को ध्यान में रखते हुए शिक्षा प्रणाली का दुरुस्त होना अति आवश्यक है। अतः केंद्र सरकार ने 34 साल पुरानी व्यवस्था को बदलते हुए नई शिक्षा नीति 2020 का ऐलान किया। इससे पहले 1986 में शिक्षा नीति लागू की गई थी। 1992 में इस नीति में कुछ संशोधन किए गए थे। यानि 34 साल बाद देश में एक नई शिक्षा नीति लागू की जा रही है। नई शिक्षा नीति में विद्यालय पाठ्यक्रम के 10 + 2 ढांचे की जगह 5 + 3 + 3 + 4 की नई पाठयक्रम संरचना लागू की जाएगी जो क्रमशः 3-8, 8-11, 11-14, और 14-18 उम्र के बच्चों के लिए है। सभी ग्रेजुएशन कोर्स में ‘मेजर’ और ‘माइनर’ का डिवीज़न होगा। जैसे विज्ञान का छात्र भौतिकी को मुख्य विषय तथा संगीत को ऐच्छिक विषय के रूप में चुन पाएगा। बच्चे 2 से 8 साल के बीच काफी तेजी से भाषा को सीख लेते हैं और कई भाषाएं जानना मस्तिष्क पर काफी सकारात्मक प्रभाव डालता है। इसलिए शुरू से ही तीन भाषाएं पढ़ाई जाएंगी। पाँचवी कक्षा तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई का माध्यम रखने की बात कही गई है। विदेशी भाषाओं की पढ़ाई सेकेंडरी स्तर से होगी। साल 2030 तक स्कूली शिक्षा में माध्यमिक स्तर तक 'एजुकेशन फ़ॉर ऑल' का लक्ष्य रखा गया है। अभी स्कूल से दूर रह रहे दो करोड़ बच्चों को दोबारा मुख्य धारा में लाया जाएगा। इसके लिए स्कूल के बुनियादी ढांचे का विकास और नवीन शिक्षा केंद्रों की स्थापनी की जाएगी। इस प्रकार यह नवीन शिक्षा नीति हमारे लिए नई उम्मीदें लेकर आई है जिसे अभिभावकों, अध्यापकों तथा छात्रों ने परस्पर सहयोग से  सफल बनाना है।

चित्रा


 राजा  भागीरथ ने गंगा को लाने के लिय कठोर तपस्या की। जिस दिन गंगा नदी स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरी उस दिन  ज्येष्ठ शुक्ल दशमी धी व हस्त नक्षत्र था। गंगा के इस दिन आने के कारण  इस त्योहार को गंगा दशहरा के नाम से भी जाना जाता है | गंगा का अवतरण दिवस । भक्त फल,शरवत का  दान करते हैं | आजकल कुछ लोग गरीबो में भोजन वितरण करते है | सडक के किनारे गर्मी से राहत डंडे पानी की छबील लगाते | गंगा दशहरा पर स्नान करने से और दान करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है |


पक्षियों की बोली—व्यवहार की होगी पढ़ाई

अरुण कुमार सिंह 




अब इंजीनियरिंग के छात्रों को पक्षियों की बोली-व्यवहार की भी पढ़ाई कराई जाएगी। इसके लिए पाठ्यक्रम तैयार कर लिया गया है। 

आल इंडिया काउंसिल फार टेक्नीकल एजुकेशन यानी एआईसीटीआई ने इंजीनियरिंग के छात्रों के लिए ऑर्निथालॉजी (पक्षी विज्ञान) का नया पाठ्यक्रम शुरू किया है। यह पाठ्यक्रम 12 हफ्तों का होगा। इसमें इंजीनियरिंग पढ़ने वाले छात्रों को पक्षियों की बोली, व्यवहार और उनकी बनावट के बारे में बताया जाएगा। इस पाठ्यक्र्म के लिए अब तक पूरे देश में 2,350 छात्रों ने पंजीकरण  कराया है। अगले वर्ष 24 जनवरी से यह पाठ्यक्रम शुरू होगा। एआईसीटीई का कहना है कि इंजीनियरिंग के छात्रों को सभी विषयों की जानकारी रखनी चाहिए। इसलिए पक्षी विज्ञान के रूप में यह नया पाठ्यक्रम शुरू किया गया है।

एआईसीटीई का कहना है कि पक्षी विज्ञान की पढ़ाई से छात्रों को रोजगार का एक नया अवसर प्राप्त होगा। इसकी पढ़ाई करने के बाद छात्रों को कृषि, वन जीवन और दूसरे उद्योगों में नौकरी मिल सकती है। इस पाठ्यक्रम में पहले सप्ताह में पक्षी विज्ञान की आधारभूत जानकारी दी जाएगी। दूसरे सप्ताह में एनाटॉमी और फिजियोलॉजी पढ़ाई जाएगी। तीसरे सप्ताह में पक्षियों के जीवन का इतिहास पढ़ाया जाएगा। चौथे और पांचवें हफ्ते में पक्षियों के व्यवहार के बारे में बताया जाएगा। छठे हफ्ते में पक्षियों के पलायन के बारे में जानकारी दी जाएगी। सातवें हफ्ते में पक्षियों की जनसंख्या के बारे में पढ़ाया जाएगा। आठवें हफ्ते में 'मिक्स स्पेशिज' की जानकारी मिलेगी। नौवें हफ्ते में डाटा विश्लेषण के बारे में बताया जाएगा। 10वें और 11वें हफ्ते में केस स्टडी व 12वें हफ्ते में सीटिजन साइंस ऑफ ऑर्निथालॉजी के बारे में बताया जाएगा।


दबाव

बीते दिनों बेटे का टूर्नामेंट था। आयोजन नोएडा के एक प्रतिष्ठित स्कूल में था।  हम दोनों बाप बेटा एक लंबी ड्राइव के बाद आयोजन स्थल पर पहुंचे। स्कूल की चकाचौंध देखते ही बनती थी। बेटा बड़े गौर से इर्द गिर्द देख रहा था। वह महसूस कर रहा था के वह एक अजनबी जगह पर अजनबी लोगों के बीच आ गया है। अंडर 13 ऐज ग्रुप में उसका पहला मैच उसी स्कूल के  लड़के के साथ था। उसके चेहरे से झलक रहा था के उस नए माहौल में वह दबाव में है। नई जगह पर जा कर एडेप्ट होने में समय लगता है और 12 साल के बालक के लिये तो स्वयं को उन परिस्थितियों में एक दम से ढाल लेना मुश्किल था। मैच शुरू हुआ और दबाव खेल पर झलकने लगा। विपक्षी हावी हो रहा था और उसके फेवर में दबा कर हूटिंग हो रही थी। बेटा मैच हार गया। उस दिन लीग सिस्टम के हिसाब से कुल चार मैच होने थे। अभी तीन मैच शेष थे। झल्लाहट और गुस्सा ऊसके चेहरे से टपक रहा था। झल्लाहट आंसुओं में तब्दील हो रही थी। मैं पास खड़ा था और उसके शांत होने का इंतजार कर रहा था। उसने घूंट भर पानी पिया। मैंने उसे सहलाया। कुछ मिनट बाद मैंने उससे पूछा के हार का क्या कारण रहा। कुछ समय वह निशब्द खड़ा रहा। फिर बोला "नया कोर्ट है,कुछ समझ में नहीं आया।"

मैं उसके बताने से पहले ही समझ चुका था के नई जगह और एक दम से एडेप्ट करने में उसे झिझक हो रही है।हम देसी आदमी हैं। परिस्थिति विकट होती है तो राम याद आते हैं। 

बातों बातों में मुंह से निकल गया "लंका भी तो राम जी के लिये नई जगह थी? राम जी तो प्रेशर में ना आये। उलटा रावण को ही उसके होम ग्राउंड पर पछाड़ दिया।बेटे ने मेरी ओर देखा। और हिमालय जब बजरंग बलि हिमालय गए संजीवनी लेने तो उनके लिये भीतो हिमालय नया कोर्ट था? नया ग्राउंड था?वो तो भगवान थे ! लड़के ने सुबकते हुए कहा।तो हम उनके भक्त हैं।अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया। 

अगले कुछ समय में हमने अगले 3 मैच के विषय पर चर्चा की। पीठ ठोकने या तारीफ के लिये नहीं कह रहा,लेकिन अगले 3 मैच लड़के ने एकतरफा जीते।ना माथे पर शिकनना दिल में डर। निर्भीक निडर हो कर खेला। बिंदास होकर खेला। उस मैदान को उस कोर्ट को अपना कोर्ट समझ कर खेला। उसकी जीत उसके खेल में नहीं थी वह समझ रहाथा के वह संजीवनी खोजने निकला है और खाली हाथ वापिस नहीं आ सकता।उसकी जीत इस विचार में थी जो उसके मन मस्तिष्क में कौंध रहा था। 

कौन कहता है राम केवल रामायण में हैं,जीवन के हर कदम पर हर परिस्थिति में राम हमारा हाथ पकड़ कर चल रहे हैं। हमारे साथ श्री रघुनाथ फिर किस बात की चिंता। शरण में रख दिया जब माथ फिर किस बात की चिंता।।

लेखक : रचित सतीजा 


दान



एक बुज़ुर्ग शिक्षिका भीषण गर्मियों के दिन में बस में सवार हुई, पैरों के दर्द से बेहाल, लेकिन बस में सीट न देख कर जैसे – तैसे खड़ी हो गई। 

कुछ दूरी ही तय की थी बस ने कि एक उम्रदराज औरत ने बड़े सम्मानपूर्वक आवाज़ दी, "आ जाइए मैडम, आप यहाँ बैठ जाएं” कहते हुए उसे अपनी सीट पर बैठा दिया। खुद वो गरीब सी औरत बस में खड़ी हो गई। मैडम ने दुआ दी, "बहुत-बहुत धन्यवाद, मेरी बुरी हालत थी सच में।"

  उस गरीब महिला के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान फैल गई।

   कुछ देर बाद शिक्षिका के पास वाली सीट खाली हो गई।  लेकिन महिला ने एक और महिला को, जो एक छोटे बच्चे के साथ यात्रा कर रही थी और मुश्किल से बच्चे को ले जाने में सक्षम थी, को सीट पर बिठा दिया।

     अगले पड़ाव पर बच्चे के साथ महिला भी उतर गई, सीट खाली हो गई, लेकिन नेकदिल महिला ने बैठने का लालच नहीं किया ।

 बस में चढ़े एक कमजोर बूढ़े आदमी को बैठा दिया जो अभी - अभी बस में चढ़ा था।

 सीट फिर से खाली हो गई। बस में अब गिनी – चुनी सवारियां ही रह गईं थीं। अब उस अध्यापिका ने महिला को अपने पास बिठाया और पूछा, "सीट कितनी बार खाली हुई है लेकिन आप लोगों को ही बैठाते रहे, खुद नहीं बैठे, क्या बात है?"

     महिला ने कहा, "मैडम, मैं एक मजदूर हूं, मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं कुछ दान कर सकूं।"  तो मैं क्या करती हूं कि कहीं रास्ते से पत्थर उठाकर एक तरफ कर देती हूं,  कभी किसी जरूरतमंद को पानी पिला देती हूं, कभी बस में किसी के लिए सीट छोड़ देती हूं, फिर जब सामने वाला मुझे दुआएं देता है तो मैं अपनी गरीबी भूल जाती हूं । दिन भर की थकान दूर हो जाती है ।  और तो और, जब मैं दोपहर में रोटी खाने के लिए बैठती हूं ना बाहर बेंच पर, तो ये पंछी - चिड़ियां पास आ के बैठ जाते हैं, रोटी डाल देती हूं छोटे-छोटे टुकड़े करके । जब वे खुशी से चिल्लाते हैं, तो उन भगवान के जीवों को देखकर मेरा पेट भर जाता है। पैसा धेला न सही, सोचती हूं दुआएं तो मिल ही जाती है ना मुफ्त में। फायदा ही है ना और हमने लेकर भी क्या जाना है यहां से ।

    शिक्षिका अवाक रह गई, एक अनपढ़ सी दिखने वाली महिला इतना बड़ा पाठ जो पढ़ा गई थी उसे ।

 अगर दुनिया के आधे लोग ऐसी सोच को अपना लें तो धरती स्वर्ग बन जाएगी


स्वामी विवेकानन्द का शिक्षा दर्शन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति

 – डॉ. रवीन्द्र नाथ तिवारी

स्वामी विवेकानन्द महान चिन्तक, दार्शनिक एवं भारतीय सनातन संस्कृति के पुरोधा थे। धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रवृति उन्हें विरासत में मिली थी। उन्होंने अपने व्याख्यानों एवं चिन्तन से यह सिद्ध किया कि यदि वेदान्त को आधुनिक आवश्यकताओं एवं मूल्यों से जोड़ा जाय तो भारत की अनेक समस्याओं का समाधान संभव है। स्वामी विवेकानन्द ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अप्रतिम योगदान दिया। शिक्षा के क्षेत्र में अपने मौलिक चिन्तन से समाज को जागृत कर समग्र विकास हेतु अतुलनीय प्रयास किया।

स्वामी विवेकानन्द ऐसी शिक्षा प्रणाली को उपयुक्त मानते थे जो व्यक्ति को जीवन में आने वाले संघर्ष के लिए तैयार कर सके। उसे इस योग्य बनाये कि भविष्य की चुनौतियों का डटकर सामना कर सके। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को स्वावलम्बी बनाये, उसमें आत्मविश्वास की भावना का विकास कर सके। उन्होंने शिक्षा संबंधी सिद्धान्त में प्रमुख रूप से माना था कि विद्यार्थी को व्यवहारिक प्रशिक्षण देना चाहिए। छात्र सर्वांगीण विकास कर सके ऐसी शिक्षा होनी चाहिए। उनका मानना था कि छात्र को कोई सिखा नहीं सकता, वह स्वयं ही सीखता है। ज्ञान तो व्यक्ति में पहले से ही है, केवल उपयुक्त वातावरण की आवश्यकता होती है। छात्रों के साथ-साथ छात्राओं की शिक्षा पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए। देश के औद्योगिक विकास के लिए तकनीकी शिक्षा अवश्य दी जानी चाहिए।विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य छात्र के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास, चारित्रिक विकास, नैतिक विकास, आध्यात्मिक विकास, त्याग की भावना का विकास, राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास, धर्म के प्रति उचित दृष्टिकोण का विकास, विविधता में एकता की भावना का विकास, श्रद्धा की भावना का विकास तथा शक्ति सबल बनाने वाली होनी चाहिए। व्यक्ति का चरित्र, राष्ट्र का चरित्र बनता हैं। व्यक्ति का नैतिक आचरण, सामाजिक उत्थान में योगदान देता है। अतः शिक्षा को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि विद्यार्थियों में धर्म के प्रति उचित दृष्टिकोण का विकास हो सके तथा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को आचरण में ला सके। वास्तव में हमारी शिक्षा का उद्देश्य मानव का निर्माण करना होना चाहिए। पाठ्यक्रम के संबंध में स्वामी जी का विचार था कि विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम के माध्यम से अतीत के प्रति सम्मान, वर्तमान की चुनौतियों एवं संघर्ष के लिए सक्षम तथा भावी जीवन को सुखद एवं सुन्दर बनाने में समर्थ बनाना चाहिए। पाठ्यक्रम सैद्धांतिक के साथ-साथ व्यवहारिक भी होना चाहिए तथा वह व्यक्ति को पूर्णता की ओर अग्रसर करने में सहायक होना चाहिए। स्वामी जी का मानना था कि यदि व्यक्ति एकाग्र होकर अध्ययन, मनन एवं चिन्तन करे तो उसे इसी अर्थ में ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। जो व्यक्ति किसी भी विषय में या ज्ञान विज्ञान की किसी भी धारा में यदि अधिकारपूर्ण एवं पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहता है तो उसे एकाग्रता को अपनाना होगा। विद्यार्थी को ऐसा वातावरण देना चाहिए कि वह स्वयं सीख सके क्योंकि सीखता तो वह स्वयं ही है, कोई उसे ज्ञान आवश्यक रूप से सिखा नहीं सकता।स्वामी जी शिक्षा में शिक्षक की भूमिका को अतिमहत्वपूर्ण मानते थे। शिक्षक/गुरु में तीन गुण अवश्य होने चाहिए-पहला वह अपने विषय का विद्वान हो तथा शिष्य के विषय संबंधी सभी शंकाओं का समाधान करने में सक्षम हो, दूसरा वह चरित्रवान होना चाहिए अर्थात् उसका आचरण ऐसा आदर्श होना चाहिए जिसका अनुकरण कर शिष्य अपने जीवन को भी उत्कृष्टता की ओर ले जा सके, तीसरा शिक्षक का प्रत्येक शिष्य के प्रति पितृवत् व्यवहार होना चाहिए। सभी प्रकार की शिक्षा और अभ्यास का उद्देश्य मनुष्य का निर्माण होना चाहिए। समस्त प्रशिक्षणों का अंतिम ध्येय मनुष्य का विकास करना है। हम मनुष्य बनाने वाला धर्म चाहते हैं, हम मनुष्य बनाने वाले सिद्धान्त चाहते हैं, हम सर्वत्र सभी क्षेत्रों में मनुष्य बनाने वाली शिक्षा चाहते हैं।स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा को संस्कारों से जोड़ा तथा जीवन को सुखी बनाये रखने के लिए जीवन के 6 प्रमुख शाश्वत सिद्धान्त निश्चित किये, जिन पर विद्यार्थियों को दृढ़ करना, तदर्थ संस्कार देना, शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया। आत्मा की अमरता, कृतज्ञता एवं विनम्रता का आचरण, माता-पिता एवं गुरु का सदैव ऋणी रहना, प्राणी मात्र में परमात्मा के दर्शन कर सभी के प्रति मैत्री भाव रखना, जीवन के कर्तव्य का कर्म करना एवं परमात्मा की सत्ता पर अटूट आस्था रखना। उनका मानना था कि संस्कार शिक्षा के इन प्रमुख दायित्वों को देश के विद्यालय अवश्य ही निभायेंगे। उन्होंने शिक्षा के उद्देश्य में चरित्र निर्माण के महत्व के बारे में लिखा है कि “यदि आपने उत्तम विचारों को ग्रहण करके उन्हें अपने जीवन एवं चरित्र का आधार बना लिया तो आप उस व्यक्ति से अधिक शिक्षित हैं जिसने संपूर्ण पुस्तकालय को कण्ठस्थ कर लिया है।” इस प्रकार स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों में (1) अन्तःकरण का विकास (2) आध्यात्मिकता का विकास (3) नैतिकता का विकास (4) शारीरिक विकास एवं शुद्धता तथा (5) ज्ञानेद्रियों के प्रशिक्षण को माना था तथा शिक्षण पद्धति में मातृभाषा, शिक्षण में एकाग्रता, प्रेम और सहानुभूति, छात्रों के मनोभावों एवं रुचियों तथा स्वानुभव द्वारा सीखने पर बल दिया।29 जुलाई 2020 को भारतीय संसद द्वारा पारित की गयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020, 21वीं शताब्दी की पहली शिक्षा नीति है जिसका लक्ष्य प्राचीन और सनातन ज्ञान, भारत की परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार को संबल प्रदान करते हुए देश के विकास के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करना है। इसका उद्देश्य ऐसे इंसानों का विकास करना है जो तर्क संगत विचार और कार्य करने में सक्षम हों, जिनके करुणा और सहानुभति, साहस और लचीलापन, वैज्ञानिक चिंतन और रचनात्मक, कल्पना शक्ति एवं नैतिक मूल्य का समावेश हो। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में लेख है कि विद्यार्थियों के विशिष्ट क्षमताओं की पहचान और विकास, शिक्षा के ढांचे को लचीला, सीखने पर जोर, रटने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करना, तार्किक एवं रचनात्मक सोच का विकास होना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति मातृभाषा में ही प्राथमिक शिक्षा पर जोर देती है। इसमें वर्णित है कि जहाँ तक संभव हो, कम से कम ग्रेड 5 तक लेकिन बेहतर यह होगा कि यह ग्रेड 8 और उससे आगे तक  शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति शिक्षा के माध्यम से भाषा, कला और संस्कृति के संवर्धन पर भी जोर देती है। वर्णित है कि व्यक्तियों की प्रसन्नता, कल्याण, संज्ञानात्मक विकास एवं सांस्कृतिक पहचान वह महत्वपूर्ण कारण हैं जिसके लिए सभी प्रकार की भारतीय  कलाएँ, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल को शिक्षा से आरम्भ करते हुए शिक्षा के सभी स्तरों पर विद्यार्थियों को प्रदान की जानी चाहिए। शारीरिक शिक्षा को भी पाठेयत्तर से पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है।राष्ट्रीय शिक्षा नीति में व्यवसायिक शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए कहा गया है कि समस्त शिक्षण संस्थान चरणबद्ध तरीके से व्यवसायिक शिक्षा के कार्यक्रमों को मुख्यधारा की शिक्षा में एकीकृत करें और इसकी शुरुआत आरंभिक वर्षों में व्यवसायिक शिक्षा के अनुभव प्रदान करने से हो, जो सुचारु रूप से प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं से होते हुए उच्चतर शिक्षा तक जाय। स्कूल और उच्चतर शिक्षा के प्रणाली के माध्यम से कम से कम 50 प्रतिशत विद्यार्थियों को वर्ष 2025 तक व्यवसायिक शिक्षा का अनुभव प्रदान किया जायेगा जिसके लिए लक्ष्य और समयसीमा के साथ एक स्पष्ट कार्ययोजना विकसित की जायेगी।राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 शिक्षकों की गुणवत्ता पर विशेष जार देती है। वास्तव में विद्यार्थी कैसे सीखें तथा सीखे हुए को जीवन के व्यवहार में कैसे उतारें, अपने अस्तित्व और जीवन के लक्ष्य का निर्धारण कैसे करें और उससे भी अधिक यह महत्वपूर्ण है कि विद्यार्थियों में सामाजिक सरोकार और संवेदनशीलता कैसे विकसित की जाय। इन सभी पहलुओं को वास्तविक धरातल पर उतारने के लिए शिक्षकों को समर्पण भाव से अपना योगदान देना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रत्येक स्तर पर शिक्षक के पेशे में सबसे होनहार लोगों का चयन करने का उल्लेख है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए शिक्षक के महत्व पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। लेख है कि प्रत्येक विद्यार्थी के विशिष्ट क्षमताओं की पहचान और उसके विकास के लिए शिक्षकों और अभिभावको को विद्यार्थियों की क्षमताओं के प्रति संवेदनशील होना पड़ेगा जिससे छात्रों की अकादमिक और अन्य क्षमताओं का पूर्ण विकास हो सके। अध्यापन की शिक्षा गुणवत्ता, भर्ती, पदस्थापना, सेवा शर्तों और शिक्षकों के सम्मान एवं अधिकारों पर विशेष बल दिया गया है। विद्यार्थियों को भी प्राचीन सनातन संस्कृति के अनुसार शिक्षकों का उच्चतर दर्जा और उनके प्रति आदर एवं सम्मान के भाव को पुनर्जीवित करना होगा तभी राष्ट्र विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सकेगा तथा भारत पुनः विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित हो सकेगा। (लेखक शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.) में भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष ह





ऐतिहासिक नीलामी

आचार्य डा युवराज तेज 

नेताजी सुभाष बोस (आई एन ए) ट्रस्ट,नई दिल्ली

सन् 1944 की 26 जनवरी का दिन रंगून के म्युनिसिपल बिल्डिंग के प्रांगण में नेताजी के सम्मान में एक विशेष जनसभा का आयोजन किया गया था। बर्मा में इस प्रकार की सभा का यह प्रथम आयोजन था। नेताजी के नाम का ऐसा जादू था कि जनसाधारण के अलावा गणमान्य लोग भी सम्मिलित थे उस जनसमुद्र में। 

सभा के आरंभ में बर्मा के निवासियों की तरफ से नेताजी को एक माला पहनायी गई। तत्पश्चात नेताजी लगभग दो घंटे तक बोले। श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो कर सुन रहे थे--समय कैसे बीत गया किसी को पता नहीं चला। 

भाषण के अंत में नेताजी अपनें हाथ से माला को उठा कर आह्वान करते हुए बोले, "यह माला समस्त बर्मा वासियों की शुभकामनाओं का प्रतीक है और इसलिए यह अमूल्य है। समय व्यतीत होने के साथ-साथ यह सूख कर मूल्यहीन हो जायेगी। इसीलिए इस मुहूर्त में इसका यथार्थ मूल्य निर्धारित करने के लिए मैं इसे नीलाम करना चाहता हूँ। जो भी धन इससे प्राप्त होगा उससे रंगून में आज़ाद हिंद संग्रहालय खोला जाएगा।"

 जैसे ही नेताजी की बात ख़त्म हुयी एक सिख युवक हरगोविन्द सिंह चिल्ला कर बोल उठे, "नेताजी, वह माला मैं ख़रीदूंगा--एक लाख डॉलर मूल्य दूंगा।"

तभी स्थानीय विख्यात व्यवसायी बृजलाल बोल पड़े, "मुझे चाहिए यह माला, दो लाख डॉलर मूल्य दूंगा।" एक और ने बोली लगाई, "ढाई 

लाख डॉलर।" बृजलाल बोले, "तीन लाख।" हरगोविन्द ने हार नहीं मानी, बोले, "चार लाख डॉलर।" सभा में बैठी जनता हरगोविन्द का समर्थन करने लगी। बृजलाल के व्यवसायी अहंकार को पराजय स्वीकार नहीं था। उन्होंने बोली लगाई "पाँच लाख दस हजार। "

हरगोविन्द समझ गये कि उनकी आशा पूरी नहीं हो पायेगी, वह चुप हो गये। बोलियाँ चलती रही दो धन कुबेरों के बीच और अंततः  कीमत सात लाख डॉलर तक पहुँच गयी।

बृजलाल आगे बढ़़ चले अपनी सात लाख डॉलर मूल्य की सम्पत्ति को प्राप्त करने। नेताजी भी आगे बढ़़ रहे थे। 

तभी हरगोविन्द ने मानो एक अंतिम प्रयत्न करने के लिए चीत्कार की, "नेताजी!!!" पास खड़ा एक व्यक्ति बोला, "अब नेताजी को पुकार कर क्या होगा? क्षमता है तो कीमत बढ़ाओ।" हरगोविन्द बोले, "मुझे जो कुछ कहना है नेताजी से कहूंगा।"

 नेताजी बोले, "बताओ क्या कहना चाहते हो।" 

हरगोविन्द की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। मानों भीख मांग रहा हो इस तरह से वह सिख युवक बोला, "नेताजी, सिंगापुर में मेरे कुछ घर हैं, गैरेज में आठ ट्रक हैं, तीन चार लाख डॉलर जमा पूंजी है। सब मिलाकर सात लाख डॉलर से अधिक हो पायेगा या नहीं कह नहीं सकता। फिर भी इस नीलामी में यह मेरी आखरी बोली है। मेरे पास जहाँ भी, जो कुछ भी है, मैं आज़ाद हिंद फौज के नाम लिख देता हूँ। बदले में मुझे वह माला चाहिए।"

हरगोविन्द की आँखों से आँसूओं की वर्षा हो रही थी, शरीर काँप रहा था। नेताजी मंच से नीचे उतर  कर आये और हरगोविन्द को ह्रदय से लगा लिया। जब वे हरगोविन्द को माला पहनाने लगे तो हरगोविन्द बोले, "आपके गले की माला मैं कैसे पहन सकता हूँ? इसे मेरे सिर पर रखिये।" 

बृजलाल अपना हक नहीं छोड़ना चाह रहे थे।

नेताजी ने उन्हें शांत किया और बोले, "यह युवक तो नंगा फ़कीर बन चुका है, अब इससे क्या लड़ोगे तुम?"

अब हरगोविन्द ने एक और अर्जी पेश कर दी। 

"नेताजी, एक और भीख चाहिए।"

"बोलो हरगोविन्द। " नेताजी ने आश्वस्त किया। 

हरगोविन्द बोले, "अब मेरे पास रहने का कोई ठिकाना नहीं रहा है। ज़िन्दा रहने के लिए दो रोटियों  की भी ज़रुरत होगी। अब आप ही मुझे आश्रय दीजिये। अपने आज़ाद हिंद फौज में भर्ती कर  लीजिये।"

अभिभूत हो कर नेताजी ने सीने से लगा लिया उस सर्वत्यागी युवक को।

मतवाले झूले थे फांसी पर लाखो ने गोली खाई थी, 

क्यूँ झूठ बोलते हो कि चरखे से आजादी पाई थी?




ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को भीमसेनी या निर्जला एकादशी भी कहते है। पांडव पुत्र भीम की भूख इतनी प्रबल थी की कोई व्रत नहीं रह पाते थे जबकि उन्हें व्रत रहने की महती इच्छा थी,उन्होंने वेद व्यास जी से कुछ उपाय बताने को कहा। वेद व्यास जी ने भीम को ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला रहने को कहा, इस व्रत में एकादशी तिथि के दिन जल और भोजन का त्याग किया जाता है | दान, पुण्य आदि कर इस व्रत को पूरा किया जाता है  | इस दिन घडा ,पंखा व फ्रिज ,वाटर कूलर भी दान देते है | इस व्रत का फल लंबी उम्र, स्वास्थ्य देने के साथ-साथ सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है |





हवन में नवग्रह की समिधा का महत्व 

तपन कुमार संगठन मंत्री विद्या भारती मेरठ प्रान्त



सनातन धर्म में हवन/यज्ञ सिर्फ धर्मिक कर्मकांड भर नहीं है बल्कि शारीरिक, मानसिक व पर्यावरण में शुद्धता लाने वाली अद्भुतचिकित्सीय प्रणाली है।

देखा जाए तो हवन के विस्तृत वैज्ञानिक पक्ष को कुछ शब्दों में लिख पाना संभव नही है। हवन में कई प्रकार की समिधा(लकड़ी)काप्रयोग होता है पर आम की लकड़ी के प्रयोग को सभी जानते हैं इस लकड़ी के घी के साथ जलने पर Formic aldehyde नाम कागैसीय तत्व बनाती है। जो खतरनाक जीवाणुओं और बैक्टीरिया के लिए एक प्राकृतिक disinfectant होकर पर्यावरण को शुद्ध करनेका काम करती है।

 आपने अक्सर घर में हवन के समय नवग्रह की समिधा के बारे में सुना होगा, नौ प्रकार की लकड़ियों का एक पैकेट आता है जिसे घी मेंडुबो कर होम किया जाता है। या और क्यों है ये नव ग्रह की समिधा आज इस पर विचार करते हैं

अर्कः पलाशः खदिरः स्त्वपामाँर्गोथ पिप्पलः।

उदुम्बरः शमी दूर्वा कुशाश्च समिधासत्विमाः।। 

1-:आक/मदार/मंदार

इसे सूर्य ग्रह की समिधा कहा गया है मंदार एक एन्टी-रूमेटिक, एन्टी-फंगल, डायफोरेटिक गुण वाला पौधा है व त्वचा रोगों के लिएउपयोगी है। कांटा लगने या फ़ांस लगने पर इसके दूध को लगा के कुछ देर रखने पर वह स्वतः बाहर आ जाता है।ये ब्रोन्कियल अस्थमामें भी लाभ देता है। 

2-पलाश/ढाक/टेसू 

का संबंध चन्द्र ग्रह से है इस के फूलों को रात भर भिगो कर इसका पानी पीने से नकसीर(नाक से खून) लगभग 3 साल तक नही आता। शिशु जन्म के बाद देने वाले पौष्टिक भोजन(हरीरा) में कमरकस तत्व पलाश का गौंद होता है।ये diabetes/ सूजन/त्वचारोग/मूत्ररोग/ट्यूमर आदि में उपयोगी है।

3-खैर

ये रक्तशोधन, हृदयरोग,दांत व मुँह के रोग आदि में इसका प्रयोग होता है पान के साथ खाएं जाने वाला कत्था इसी से बनाया जाता है।मंगल का सम्बंध ज्योतिष में रक्त/तांबा/लाल रंग/रक्त चंदन/लाल मूँगा आदि सब जोड़ा जाता है हम अंदाज लगा सकते हैं कि क्यों खैरही मंगल की समिधा बना।

4-अपामार्ग/चिडचिडा/लटजीरा/वज्रदन्ति

इस पौधे का संबंध बुध ग्रह से है।इसकी जड़ का प्रयोग दांतों को चमक और मजबूती देता है इसलिए इसे वज्रदन्ति भी कहा जाता है।बुध ग्रह के समान ही इसके परिणाम भी तुरंत ही दिखते हैं। आदिवासी/ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसव के समयकाल(normal delivery) केलिए होता रहा है। अगर कभी खेतों की पगडंडियों में चलने का मौका मिला हो तो जो जीरे जैसा कपड़ो में चिपक जाता है वही छोटा साझाड़ बहुत चमत्कारी है। ज्योतिष उपाय में भी इसके अनेकों प्रयोगों को यहां वर्णन करना संभव नही।

5-पीपल

ये गुरु ग्रह से संबंध रखता है इस पेड़ का शुद्ध पर्यावरण के लिए बहुत उपयोग है सनातन विज्ञान उस समय भी इस बात को जानता थाकि शुष्क स्थान पर पनपने वाला ये पेड़ दिन के समय अन्य पेड़ो कब समान प्रकाश संश्लेषण न करके, रात में विशेष क्रिया से मैलेट नामका रसायन बनाते हैं और सामान्य पेड़ से लगभग 30%ज्यादा ऑक्सीजन देते हैं और रात में भी कार्बन डाई ऑक्साइड का अवशोषणकरते हैं। ये हृदय रोग,दमा,दाह आदि रोगों में लाभ देता है। 

6- औदुम्बर/गूलर/जंगली अंजीर

शुक्र ग्रह से सम्बन्ध होने के कारण ये शरीर के शुक्रतत्व से संबंधित समस्याओं के निदान में बहुत उपयोगी है ये बलवर्धक/पुष्टिकारक वदाह नाशक है।गूलर का उपयोग मांसपेशीय दर्द, मुंह के स्वस्थ्य में, फोड़े ठीक करने में , घाव को भरने के इलाज आदि में किया जाताहै।गूलर एंटी-डायबिटिक, एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-अस्थमैटिक, एंटी-अल्सर, एंटी-डायरियल और एंटी-पायरेरिक गुण होते हैं।

7-शमी/खेजड़ी

ये शनि ग्रह से संबंधित उच्च रक्तचाप, वात व पित्त दोष,गठिया,नसों में दर्द और खिंचाव आदि में लाभ देता है। इसके पत्तियों का काढ़ाकृमि नाशक है। 

8-दूर्वा/दूब

ये राहु की समिधा है इसका उपयोग रक्तशोधन, अनिद्रा, एनीमिया, मासिक धर्म में अत्यधिक रक्त श्राव आदि में होता है इसे हरा खून भीकहते हैं।इसका रस पीने से एनीमिया सही हो जाता है शीशम के पत्तों के साथ इसका रस शरीर मे बन ने वाली  गठानों/गांठो/सिस्ट कोबनने से रोकता है। 

9- कुशा

ये केतु ग्रह की समिधा है इसका प्रयोग किडनी स्टोन, मूत्र संबंधी रोगों में होता है।

इन सब औषधीय गुणों से भरपूर समिधाओं को उनके तत्व/ गुण के कारण विभिन्न ग्रहों से जोड़ा गया।यज्ञ इत्यादि में इन समिधाओं कोघी के साथ अन्य जड़ीबूटियाँ जोकि हवन सामग्री के रूप में प्रयोग होती है से वातावरण को चिकित्सीय प्रभाव से भरपूर रखता है। हवनमें प्रयुक्त इन सामग्री का धुआँ साँस के माध्यम से शरीर मे प्रवेश कर कई रोगों से आपकी रक्षा करता है।  


शीतल पेय से दूर रहो, स्वस्थ रहो

 – दिलीप वसंत बेतकेकर

सर्दी का मौसम समाप्त होकर जब गर्मी का मौसम शुरू हो रहा होता है, शीतल पेय दिखते ही मन ललचाता है और साथ ही विज्ञापन की भरमार! इसी कारण शीतल पेयों की बिक्री में बाढ़ सी आती है।

ये शीतल पेय स्वास्थ्य के लिये कितने लाभदायी अथवा हानिकारक हैं, इसका विचार करने के लिये किसी को कहां फुरसत है? दिखी ठंडी बोतल और लगाई मुंह से! इस लेख में इन शीतल पेयों के बारे में कुछ जानें।

1772 ई॰ में जोसेपफ प्रिस्टेल ने कार्बन डाईऑक्साइड को पानी में मिलाकर बुलबुलेयुक्त पानी की निर्मिति की। ऊर्जा और मिठास लाने हेतु मीठे फलों के रस में यह पानी मिलाने लगे। बोतल में भरा ऐसा पेय शुद्ध और साफ पद्धति से न भरा होने से जल्दी ही खराब हो जाता था। सन् 1889 में हल निकाला गया। आज इसी का संशोधित रूप एरिएटेड वॉटर के रूप में प्रचलित हुआ। एरिएटेड वॉटर इंडस्ट्रीज आज तीव्र गति से विकसित हो रही है।

अमेरिका में पानी की अपेक्षा शीतल पेयों का उपयोग अधिक करते हैं। अपने देश में भी अब इसका प्रचलन बढ़ रहा है। भारत की जनसंख्या वृद्धि के कारण दुनिया के विविध उत्पादन कर्ताओं की व्यापारिक दृष्टि से नज़र भारत पर अधिक है। पैसा प्राप्त करने हेतु किसी भी उत्पाद का आकर्षक विज्ञापन बनाकर तथा अभिनेताओं द्वारा प्रदर्शित होने के कारण अपने देश के लोगों के गले आसानी से उतर जाती है।

शीतल पेयों के उत्पादन खर्च और बिक्री कीमत में बहुत अधिक अंतर है। परन्तु ये रंगीन मीठा जल लोग अत्यंत गर्व से अत्यधिक पैसे खर्च कर गले में उतार देते हैं। “बच्चों को एक कप दूध पिलाओ” कहने पर “दूध के लिए इतना पैसा नहीं है” कहने वाले लोग भी शीतल पेय सहजता से खरीद लेते हैं। यात्रा के दौरान साथ में पानी ले जाना भी आजकल लोगों को रास नहीं आता। इसकी अपेक्षा वे अपने साथ पेप्सी, कोका कोला, स्पाइस आदि शीतल पेयों की बोतलें अथवा कैन्स रखना पसंद करते हैं। प्रतिष्ठा, स्टेटस की झूठी कल्पनाओं के कारण ही वे ये सब करते हैं। इस हेतु कितना पैसा नष्ट होता है अथवा उससे भी मूल्यवान स्वास्थ्य नष्ट होता है, यह सोचने के लिये उनके पास समय ही कहाँ है?

शीतल पेयों में 120 से 180 किलो कैलोरीज़ शुगर (शर्करा) के कारण होती है। पोषक द्रव्यों का अभाव रहता है। इसलिये उन्हें रिक्त कैलोरीज़ कहते हैं। शीतपेयों को अधिक ग्रहण करने से शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। शकर की कैलोरीज़ रक्त प्रवाह में जाकर शकर के परिमाण में वृद्धि हो जाती है।

तज्ञ लोगों के मतानुसार स्वास्थ्य के लिए हानिकारक घटकों में शीतपेयों का स्थान विशेष ही है। शीतपेयों का प्रचलन अधिक होने के कारण लोगों में मधुमेह, मोटापा आदि में वृद्धि देखने में आ रही है। इसके लिये शीतल पेयों का उपयोग एक महत्वपूर्ण कारण है, ऐसा “अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रिव्हेंटिव्ह मेडीसिन” ने लिखा है।

कॉफी की अपेक्षा शीतल पेयों का अधिक उपयोग करने की आदत के कारण महिलाओं में उच्च रक्तचाप बढ़ सकता है, ऐसा बोस्टन के कुछ शोधकर्ताओं द्वारा कहा गया है। शीत पेय और रक्तचाप वृद्धि का सम्बन्ध आज तक कभी समक्ष नहीं आया था इसलिए ऐसे निष्कर्ष पर आश्चर्य हुआ।

शोधकर्ताओं द्वारा नर्सिंग पाठ्यक्रम में अध्ययनरत 1,55,494 महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच की गई। 1990 से 12 वर्ष तक चले इस शोधकार्य की अवधि में 33077 महिलाएं उच्च रक्तदाब पीड़ित पाई गईं। इन महिलाओं में कॉफी पीने की आदत नहीं थी। इसलिये उनके आहार विषयक आदतों का विश्लेषण किया गया। इस परीक्षण में पाया गया कि उनमें कोला वर्ग के पेय अधिक परिमाण में पीये जाते थे।

इस शोध से कॉफी प्रेमी वर्ग को राहत मिली, किन्तु शीतल पेय और उच्च रक्तदाब के सम्बन्ध में अधिक स्पष्टता लाने हेतु अधिक शोध करना आवश्यक माना गया।

हृदय विकार का खतरा बढ़ाने वाली आधुनिक जीवन शैली के कारण निर्मित होने वाले विविध लक्षणों के समुच्चय को ‘मेटॉबोलिक सिंड्रोम’ कहते हैं। शीतल पेय और मेटॉबोलिक सिंड्रोम में आपसी सम्बन्ध शीतपेयों में शर्करा के अतिरिक्त परिमाण के कारण होता है, ऐसा निष्कर्ष शोध में सहभाग करने वाले पचास वर्ष आयु के स्त्री-पुरुषों के स्वास्थ्य के परीक्षण द्वारा किया। इस शोधकार्य द्वारा ऐसा विदित हुआ कि प्रतिदिन एक अथवा अधिक शीतपेयों का सेवन करने वालों में मेटॉबोलिक सिंड्रोम परिमाण अन्य की अपेक्षा 44 से 48 प्रतिशत अधिक था। इसी प्रकार मेटॉबोलिक सिंड्रोम के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक स्वतंत्र लक्षण के परिमाण भी शीतपेयों के कारण वृद्धिगत होते दिखाई दिये अर्थात् इसका कारण शीतपेयों के सेवन तथा आहार विषयक आदतों से सम्बद्ध होगा, ऐसा वैज्ञानिकों का मत था। किन्तु इससे पूर्व के परीक्षणों का पुनः परीक्षण करने के उपरान्त इस विषय को अंततः पूर्णत्व दिया गया।

शर्करायुक्त शीतपेयों के कारण शरीर का पोषण बाधित होता है। इसके विपरीत शरीर के मोटापे में वृद्धि होती है और साथ ही मधुमेह के खतरे में भी, ऐसा अमेरिका के ‘येल विद्यापीठ’ के वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित किया गया। बच्चों में बढ़ते हुए मधुमेह की समस्या को दृष्टिगत रखते हुए यह निष्कर्ष अधिक महत्वपूर्ण माने गये हैं। सोडा युक्त अर्थात् कार्बोनेटेड शीतपेयों को शर्करा पर्यायी अन्नपदार्थों के कारण शरीर में चरबी युक्त भोजन की मांग बढ़ती है। शीतपेयों के बढ़ते सेवन, दूध, फल, तंतुयुक्त (फाइबर) सब्जियां, कैलशियम और अन्य पोषक द्रव्यों के सेवन से विपरीत अनुपात में होते हैं। इस कारण शाला-कॉलेज में भी शीतपेयों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है, इस प्रकार का प्रतिपादन इन वैज्ञानिकों द्वारा ‘अमेरिकन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ की शोध पत्रिका में किया गया है।

स्वास्थ्य के लिये हानिकारक शीतपेयों का उपयोग अत्यंत तीव्र गति से बढ़ रहा है। परिमाण इतना बढ़ गया है कि मोटापा और मधुमेह के लिये ये एक महत्वपूर्ण कारण बन गया है। ऐसा विचार ‘अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रिव्हेंटिव्ह मेडीसिन’ द्वारा व्यक्त किया गया है।

अमेरिका के येल विद्यापीठ के वैज्ञानिकों ने शीतल पेयों द्वारा स्वास्थ्य पर होने वाले परिणाम के संदर्भ में कुल 88 परीक्षणों में 91000 महिलाओं के स्वास्थ्य के संदर्भ में आठ वर्ष में एकत्र की गई जानकारी के विश्लेषण किये। निष्कर्ष के अनुसार प्रतिदिन एक अथवा अधिक शीतलपेय के बोतल सेवन करने वाली महिलाओं में मधुमेह का खतरा अधिक रहता है। ‘कैलोरी फ्री’ जैसा विज्ञापन किये जाने वाले कार्बोनेटेड शीतपेयों से भी मध्यवयीन नागरिकों में मेटॉबोलिक सिंड्रोम निर्मित होने सम्बन्धी मत बोस्टन विद्यापीठ द्वारा व्यक्त किया गया है।कोला जैसे शीतपेयों के कारण हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं ये बात ध्यान में आयी है। शोधकर्ताओं द्वारा सिद्ध किया गया है कि जो बच्चे मीठा शीतपेय पीते हैं उनके दाँतों में रिक्तता (कैविटी) होने की संभावना शीतपेय न पीने वाले बच्चों की अपेक्षा अधिक होती है। इस संदर्भ में सौ॰ सीमा, जो विद्या भारती की एक प्रयोगशील शिक्षिका हैं, के प्रयोग और अनुभव मार्गदर्शक हैं। सीमा जी फोंडा तालुका के उंडीर गांव में शिक्षिका का कार्य करती थी। एक दिन शाला में एक बालक ‘मेरा दांत गिर गया है’ ये कहने शिक्षिका के पास आया। सीमा दीदी ने इस घटना का सहारा लेकर बच्चों को एक सीख देने का विचार किया। उन्होंने उस दांत को बाहर फेंका नहीं। बाजार से एक ‘पेप्सी’ की बोतल मंगवाई और एक ग्लास में ‘पेप्सी’ को उंडेलकर उस दांत को उस ग्लास में डाला। अब उस दांत का निरीक्षण करने के लिए बच्चों को कहा। दूसरे दिन बच्चों ने उस ग्लास में देखा तो वह दांत थोड़ा छोटा हुआ दिखाई दिया। तीसरे दिन और अधिक छोटा हुआ। इस प्रयोग से सिद्ध हुआ की शीतपेय दांतों के लिए अत्यंत घातक होते हैं। बच्चों को भी ये बात अच्छी तरह से समझ में आ गई!

जिन महिलाओं को अपनी हड्डियां मजबूत रखनी हों, वे कोला पेयों से दूर ही रहें, ऐसा मत अमेरिकी के विद्यापीठ के वैज्ञानिकों द्वारा 2500 प्रौढ़ों के स्वास्थ्य परीक्षण करने पर व्यक्त किया गया। जो महिलाएं प्रतिदिन कोला पेय पीती हैं उनके हड्डियों की क्षार घनता बोन मिनरल डेन्सिटी – ‘बी॰एम॰डी॰’ अर्थात् हड्डियों के क्षार का प्रमाण (कैलशियम आदि) महीने में एक आध बार ही पीने वाली महिलाओं की अपेक्षा कम होती है। अर्थात् उनकी हड्डियां जरा सी चोट से भुरभुरी बन जाने वाली होती हैं। इसका सम्बन्ध सीधा अस्थिभंग होने के खतरे से है। कोला पेय लोकप्रिय होने से ये जानकारी जन स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।प्रौढ़ावस्था प्रारंभ होने वाली महिलाओं में अस्थिभंग और बी॰एम॰डी॰ की कमी इस आयुवर्ग की महिलाओं में कोला की लोकप्रियता के कारण बताई जाती है। किन्तु यह परिणाम आहार में दूध के घटता परिमाण के कारण है अथवा पेय के हानिकारक प्रभाव के कारण, इसका उत्तर उन वैज्ञानिकों के पास नहीं था। इसलिये उन प्रौढ़ों में ऐसे परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं अथवा नहीं, इसके लिए गहन परीक्षण किये। इस हेतु उन्होंने 1413 महिलाओं और 1125 पुरुषों को प्रयोगार्थ चयन किया। उनके बी॰एम॰डी॰ का मापन किया। उनमें जिन महिलाओं का कोला का सेवन अधिक था, उनका बी॰एम॰डी॰ मापन किया। परीक्षण में पाया गया कि अधिक कोला पेय सेवन करने वाली महिलाओं का बी॰एम॰डी॰ विशेष रूप से कम था। (लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)



जून मास के महत्वपूर्ण दिवस 

1 जून- दुग्ध दिवस व माता-पिता वैश्विक दिवस-1 जून:- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दूध के महत्व को समझाने और डेयरी क्षेत्र को आगे बढाने के लिए प्रत्येक वर्ष 1 जून को विश्व दुग्ध दिवस मनाया जाता है इसका उद्देश्य है कि लोगो को दूध से मिलने वाले पोषण और प्राप्त होने वाली आजीविका से अवगत कराया जाये।1 जून:- विश्व दुग्ध दिवस के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर माता-पिता का वैश्विक दिवस मनाया जाता है वर्ष 2012 में संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को मनाने की घोषणा की थी इस दिन के जरिये प्रत्येक व्यक्ति अपने माता-पिता को उनके लिए किये कार्यो के लिए धन्यवाद देते है।2 जून- तेलंगाना दिवस:- भारत के आंध्रप्रदेश राज्य से तेलंगाना को 2 जून 2014 में अलग कर दिया गया था इसलिए इस दिन को प्रत्येक वर्ष तेलंगाना दिवस के रूप में मनाते है। विश्व साइकिल दिवस-3 जून:- संयुक्त राष्ट्र के द्वारा वर्ष 2018 में इस दिन विश्व साइकिल दिवस मनाने की शुरुआत की गयी थी इसका उद्देश्य है कि पर्यावरण को प्रदूषण से बचाया जा सके।4 जून- अंतर्राष्ट्रीय दिवस-:- बच्चे प्रत्येक देश का भविष्य होते है 

लेकिन कई बार मासूम बच्चे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण का शिकार होते है इसलिए विश्वभर में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक वर्ष आक्रामकता का शिकार हुए बच्चो के लिए इस दिन अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है ताकि उन्हें इस तरह के शोषण से बचाया जा सके।5 जून- विश्व पर्यावरण दिवस-5 जून:- आज के समय में पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुच रहा है इसलिए ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है।7 जून- विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस-7 जून:- विश्व भर में विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस 7 जून को मनाया जाता है इसे आयोजित करने के पीछे का कारण है कि खद्यो को होने वाली हानि से बचाया जा सके।8 जून- मस्तिष्क टयूमर व महासागरीय दिवस 8 जून:- प्रत्येक वर्ष अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व मस्तिष्क टयूमर दिवस के रूप में मानते है ताकि लोगो को ब्रेन टयूमर के बारे में जानकारी दी जा सके और इस बीमारी से लड़ने के लिए तयार किया जाये। 8 जून:- विश्वभर में प्रत्येक वर्ष 8 जून को विश्व महासागरीय दिवस मनाया जाता है इसका उद्देश्य है कि महासागर के महत्व के बारे में लोगो को अवगत कराया जा सके।12 जून- बाल श्रम के खिलाफ विश्व दिवस-12 जून:- दुनिया में ऐसे कई मासूम है जिनको गरीबी के कारण बाल मजदूरी करनी पड़ती है ऐसे ही बच्चो को बाल मजदूरी से मुक्त करवाने के लिए बाल श्रम के खिलाफ विश्व दिवस मनाया जाता है। 13 जून- अंतर्राष्ट्रीय रंगहीनता दिवस-13 जून:- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक वर्ष 13 जून को अंतर्राष्ट्रीय रंगहीनता (एल्बिनिस्म) जागरूकता दिवस मनाया जाता है इसका उद्देश्य रंगहीनता के प्रति जागरूक करना है ताकि किसी के भी साथ रंग भेदभाव न हो। 14 जून- विश्व रक्त दाता दिवस:- हर साल 14 जून को विश्व रक्त दाता दिवस आयोजित किया जाता है इसका उद्देश्य है कि रक्तदान की कमी को पूरा किया जा सके। 15 जून- विश्व पवन व बुजुर्ग दुर्व्यवहार दिवस:- बिना हवा के किसी भी मनुष्य का जीवन संभव नहीं है इसलिए प्रत्येक वर्ष 15 जून को विश्व पवन दिवस मनाया जाता है ताकि पवन ऊर्जा के महत्व को समझाया जा सके।   विश्व पवन दिवस के साथ प्रत्येक वर्ष विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस को भी मनाया जाता है ताकि बुजुर्गो के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के प्रति आवाज़ उठाई जाये और उन्हें सुरक्षित रखा जा सके। 16 जून- धर्म गुरु अर्जुन देव:- सिखों के धर्म गुरु अर्जुन देव जी को 16 जून को शाहदत मिली थी इसलिए इस दिन उन्हें सम्मान देने के लिए यह दिन मनाया जाता है। 17 जून- मरुस्थलीकरण और सूखे के लिए विश्व दिवस:- प्रत्येक वर्ष मरुस्थलीकरण और सूखे के लिए विश्व दिवस अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 17 जून को मनाया जाता है इसका उद्देश्य है भूमि के अपरदन को रोका जा सके जिससे वह बंजर न हो। 18 जून- ऑटीस्टिक प्राइड डे:- विश्व में 18 जून को ऑटीस्टिक प्राइड डे आयोजित किया जाता है इसका उद्देश्य है आटिज्म से पीड़ित बच्चो को समाज का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया जाये। 19 जून- विश्व सिकल सेल जागरूकता दिवस:- विश्व में प्रत्येक वर्ष 19 जून को विश्व सिकल सेल जागरूकता दिवस मनाया जाता है इसका उद्देश्य स्किल सेल रोग के बारे में लोगो को जागरूक करना है ताकि वह इस बीमारी से बच सके। 20 जून- विश्व सौहार्द दिवस :- संयुक्तराष्ट्र ने वर्ष 2000 में विश्व सौहार्द दिवस मनाने की घोषणा की थी इस दिन को सभी शरणार्थियो को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। 21 जून- विश्व संगीत व अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस:- फ्रांस में वर्ष 1982 में विश्व संगीत दिवस को मनाने की शुरुआत की गयी थी इसे मनाने का उद्देश्य है कि संगीत के महत्व को समझाया जा सके और नए कलाकार उभर कर सामने लाये जाये। :- विश्वभर में प्रत्येक वर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आयोजित मनाया जाता है जिसके द्वारा योग के महत्व से सभी नागरिको को अवगत कराया जा सके। 21 जून:- विश्व संगीत दिवस और अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के साथ इस दिन विश्वभर में विश्व हाइड्रोग्राफी दिवस भी आयोजित किया जाता है इसके जरिये पृथ्वी पर पानी और जल भंडार की जानकारी दी जाती है। 23 जून- अंतर्राष्ट्रीय ओलिंपिक व राष्ट्र लोक सेवा दिवस:- प्रत्येक वर्ष 23 जून को अंतर्राष्ट्रीय ओलिंपिक दिवस के रूप में मनाया जाता है इसका उद्देश्य प्रत्येक देश के नागरिको को खेल और स्वास्थ्य के महत्व को समझाना है। 23 जून:- अंतर्राष्ट्रीय ओलिंपिक दिवस के साथ ही संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा दिवस इस दिन मनाया जाता है इसका उद्देश्य है कि लोक सेवा में कार्यरत लोगो को सम्मान प्रदान करना। 23 जून:- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक वर्ष विश्व विधवा दिवस मनाया जाता है इसका उद्देश्य है कि विधवाओं की ओर सभी का ध्यान खीचा जा सके और उनकी परेशानियों से अवगत कराया जाये ताकि उन्हें मदद मिल सके। 26 जून- अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस:- नशीली दवाओ के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जाता है ताकि लोगो को इन दवाओ से होने वाले नुकसान के बारे मे बताया जाये और उन्हें जागरूक किया जा सके। :- प्रत्येक वर्ष 26 जून को अत्याचार के पीडितो के समर्थन में अंतर्राष्ट्रीय दिवस आयोजित किया जाता है इसका उद्देश्य है कि अत्याचार से पीड़ित लोगो को समर्थन और सम्मान प्रदान किया जा सके। 30 जून- विश्व क्षुद्र ग्रह दिवस :- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व क्षुद्र ग्रह दिवस 30 जून को मनाया जाता है ताकि क्षुद्र ग्रह के द्वारा होने वाले खतरे और प्रभाव के बारे में लोगो को जागरूक किया जा सके|


मानस पूजा 

मानस पूजा का प्रचलन उतना ही प्राचीन है जितने कि *"भगवान और भक्त"*।इसमें मनुष्य स्वर्गलोक की मन्दाकिनी के जल से अपने आराध्य को स्नान करा सकता है,कामधेनु के दुग्ध से पंचामृत का निर्माण कर सकता है। ऐसी मानस पूजासे भक्त और भगवानको कितना संतोष मिलता होगा,यह शब्दों में बयान नहीं किया जासकता।आजके भाग-दौड़ भरे जीवन,मे हर किसी केलिए भगवान की विधिवत् पूजा के लिए न ही शक्ति और न ही साधन। साथ ही संसार में ऐसे दिव्य पदार्थ उपलब्ध नहीं हैं, जिनसे परमात्मा की पूजा की जा सके।हिन्दू धर्मशाल्त्र समुद्र की तरह अगाध हैं।पूजा में असमर्थ होने पर शास्त्रों में एक अत्यंत सरल व सबके लिए सुगम साधन बताया गया है और वह है;-भगवान की मानस-पूजा। मानस या मानसी-पूजा को पूर्वकाल में ऋषि-मुनि घोर जंगलों व अरण्यों में रह कर तपस्या के समय किया करते थे।उनके पास पूजा के भौतिक साधन उपलब्ध नहीं रहते थे।अत: वे ध्यान में ही भगवान की मानस पूजा किया करते थे। मानस-पूजा में मन के घोड़े दौड़ाने और कल्पनाओं की उड़ान भरने की पूरी छूट होती है। सोने,चांदी,हीरे-जवाहरात से बने वस्त्राभूषण धारण करा सकता है,कुबेर की पुष्पवाटिका के स्वर्ण-कमल व पारिजात पुष्पों की माला पहना सकता है, कस्तूरी चंदन का लेप लगा कर, गुग्गुल और शुद्ध घी की बनी धूप दिखा कर और मन सेही छप्पन-भोग लगा कर भगवान को हजार गुना अधिक संतोष दे सकता है।ऐसी मानस पूजासे भक्त और भगवान को कितना संतोष मिलता होगा,यह शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। इसमें भक्त और भगवान के बीच बना सम्पर्क गाढ़-से-गाढ़ होता जाता है। भगवान को दिव्य पदार्थ अर्पण करते समय जब उनकी सुगन्ध साधक की सांसों से टकराती है तो उसकी नस-नस में भगवत्प्रेम की मादकता भर जाती है।      -कृष्ण दत्त शर्मा  



                                                                          

जून का महीना

     जून का महीना क्या आया.....

 महान विभूतियों के  जन्म /बलिदानों के रंगों की छटा संग लाया। 

   क्यों न मानो….. इस माह को    पावन

 जब हुआ जन्म इस माह में 

 वीर महाराणा प्रताप सिंह का और गुरु हरगोविंद सिंह जी ने भी जन्म  

  इसी माह में था पाया।

       जन्मे थे बंकिमचन्द्र चटर्जी जी भी इसी माह में जिनकी कलम ने

 दिल हज़ारों का था धड़काया।     

     भारत भूमि के कई शूरवीरों को हमने इसी माह में था गँवाया।

 आज भी सूरज की गर्मी में उनके रक्त का उबाल शामिल है ,

उनके बलिदानों का रंग ,सूर्य की आभा बन कर है छाया।

    मातृभूमि की खुशियों की ख़ातिर जिन्होंने लुटाए अपने प्राण उन्हें करते हम बार-बार प्रणाम।

 बिरसा मुंडा,महारानी लक्ष्मी बाई ,महाराज रंजीत सिंह

डा० केशवराव बलिराम हेडगेवार,डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी 

 अपने प्राण लुटा, संकट में  खुद को डाल।

  आपने किया समाज का जीर्णोद्धार।

समाज के पुनर्निर्माण के इस पावन कार्य में  

अमर रहेगा आपका  सराहनीय योगदान।

भूल न पाएँगे हम आपको जीवन भर किए आपने ऐसे काम।

सभी भारतवासियों का आपको शत-शत प्रणाम।।   -सरिता शर्मा 'विनी'



गुरु कौन



बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे। उन के पास शिक्षा लेने हेतु दूर दूर से शिष्य आते थे।

एक दिन एक शिष्य ने महंत से सवाल किया, स्वामीजी आपके गुरु कौन है? आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है? महंत शिष्य का सवाल सुन मुस्कुराए और बोले, मेरे हजारो गुरु हैं! यदि मै उनके नाम गिनाने बैठ जाऊ तो शायद महीनो लग जाए। लेकिन फिर भी मै अपने तीन गुरुओ के बारे मे तुम्हे जरुर बताऊंगा। 

मेरा पहला गुरु था एक चोर।

एक बार में रास्ता भटक गया था और जब दूर किसी गाव में पंहुचा तो बहुत देर हो गयी थी। सब दुकाने और घर बंद हो चुके थे। लेकिन आख़िरकार मुझे एक आदमी मिला जो एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। मैने उससे पूछा कि मै कहा ठहर सकता हूं, तो वह बोला कि आधी रात गए इस समय आपको कहीं कोई भी आसरा मिलना बहुत मुश्किल होंगा, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ आज की रात ठहर सकते हो। मै एक चोर हूं और अगर एक चोर के साथ रहने में आपको कोई परेशानी नहीं तो आप मेरे साथ रह सकते है। वह इतना प्यारा आदमी था कि मै उसके साथ एक रात की जगह एक महीने तक का समय व्यतीत किया |

वह हर रात मुझे कहता कि मै अपने काम पर जा रहा हूं, आप आराम करो और प्रार्थना करो। जब वह काम से आता तो मै उससे पूछता कि कुछ मिला तुम्हे? तो वह कहता कि आज तो कुछ नहीं मिला पर अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही जरुर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था और हमेशा मस्त रहता था।कुछ दिन बाद मैं उसको धन्यवाद करके वापस अपने घर आ गया. जब मुझे ध्यान करते हुए सालों-साल बीत गए थे और कुछ भी प्राप्त नहीं हो रहा था तो कई बार ऐसे क्षण आते थे कि मैं बिलकुल हताश और निराश होकर साधना छोड़ने की ठान लेता था और तब अचानक मुझे उस चोर की याद आती जो रोज कहता था कि भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा. इस तरह मैं हमेशा अपना ध्यान लगाता और साधना में लीन रहता |

मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था।

एक बार बहुत गर्मी वाले दिन मै कही जा रहा था और मैं बहुत प्यासा था और पानी के तलाश में घूम रहा था कि सामने से एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया। वह भी बहुत प्यासा था। पास ही एक नदी थी। उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो कि उसकी अपनी ही परछाई थी। कुत्ता उसे देख बहुत डर गया। वह परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी के पास लौट आता।अंततः अपने डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई। उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सीख मिल गई। अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का हिम्मत से, साहस से मुकाबला करता है।मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है।मै एक गांव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा एक जलती हुई मोमबत्ती ले जा रहा था। वह पास के किसी मंदिर में मोमबत्ती रखने जा रहा था।मजाक में ही मैंने 




उससे पूछा की क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई है? वह बोला, जी मैंने ही जलाई है। तो मैंने उससे कहा कि एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया जब यह मोमबत्ती जल गई। क्या तुम मुझे वह स्त्रोत दिखा सकते हो जहा से वह ज्योति आई? वह बच्चा हँसा और मोमबत्ती को फूंख मारकर बुझाते हुए बोला, अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहा गई वह? आप ही मुझे बताइए। मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए। शिष्य होने का अर्थ क्या है? शिष्य होने का अर्थ है पूरे अस्तित्व के प्रति खुले होना। हर समय हर ओर से सीखने को तैयार रहना। कभी किसी की बात का बुरा नही मानना चाहिए, किसी भी इंसान की कही हुइ बात को ठंडे दिमाग से एकांत में बैठकर सोचना चाहिए कि उसने क्या-क्या कहा और क्यों कहा? तब उसकी कही बातों से अपनी की हुई गलतियों को समझे और अपनी कमियों को दूर करें | जीवन का हर क्षण, हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है। हमें जीवन में हमेशा एक शिष्य बनकर अच्छी बातो को सीखते रहना चाहिए। यह जीवन हमें आये दिन किसी न किसी रूप में किसी गुरु से मिलाता रहता है. यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उस महंत की तरह एक शिष्य बनकर उस गुरु से मिलने वाली शिक्षा को ग्रहण कर पा रहे हैं कि नहीं!




भगवती

स्वतंत्रता-पूर्व की बात है वाराणसी के एक साधक थे 'सुदर्शन जी;माता दुर्गा के परम भक्त 

 ब्रह्ममुहूर्त का समय था । वे गंगा जी में कमर तक डूबे जप कर रहे थे। तभी उधर से एक बाहुबली का बजरा निकला । उस बाहुबली ने विनोद में इनसे पूछा  -" महाराज,आप कब से गंगा जी की तली को देखे जा रहे हैं ; बताइए तो , गंगा जी की तली में क्या होगा ?"

महाराज ने बस कह ही दिया, " गंगा जी की तली में ?गंगा जी की तली में खरगोश होगा और क्या !"वह बाहुबली तो श्रद्धावश महाराज जी को कुछ दक्षिणा देने की सोच रहा था , उल्टी बात सुनकर वह पिनक गया । 

" महाजाल डालो " ; वह गरजा" तीन बार   ...   अगर खरगोश निकले तो महाराज का घर भर दो ; न निकले तो इस ऐंठ का इनको फल चुकाना होगा ।"एक-दो लोगों ने सुदर्शन जी को संकेत किया कि वे विवाद में न पड़ें और क्षमा माँग लें । सुदर्शन जी अपने वक्तव्य से न हटे  -  " अब कह दिया , तो कह दिया ।"जाल डाला गया , कुछ न निकला । दूसरी बार जाल डाला गया , फिर कुछ नहीं निकला । बाहुबली ने क्रोधित दृष्टि से सुदर्शन जी को देखा , सुदर्शन जी के माथे पर शिकन तक न थी  - " अभी तीसरी बार बाकी है , भाई " , वे मुस्कुरा रहे थे । क्रोध में जल रहे बाहुबली ने आदेश दिया " डालो जाल डालो,एक आखिरी बार और ।"

जाल डाला गया । जाल बाहर निकला  तो सबों ने हैरत से देखा जाल में दो जीवित खरगोश थे ।भय से काँपता बाहुबली सुदर्शन जी के चरणों में गिर गया  -  " आप सिद्ध पुरुष हैं । मुझ मूर्ख को माफ कर दो , महाराज ।" वह अपने लोगों की तरफ घूमा  -  " गुरु जी के साथ जाओ । जो भी आदेश करें , वह व्यवस्था करके ही लौटना ।"सुदर्शन जी मुस्कुराते हुए बोले  -  " तू हमारी व्यवस्था क्या करेगा ! हमारी व्यवस्था करने के लिये माँ हैं । तू अपनी राह जा , हम अपनी राह चले ।"काशी की सँकरी गलियों में सुदर्शन जी अपने घर की ओर जा रहे थे कि उन्हें एक थप्पड़ लगा । वे अकचकाकर खड़े हो गये ।

 सामने एक अनिंद्य सुन्दरी किशोरी खड़ी थी  -  " तू जनम भर पागल ही रहेगा क्या रे ! "   ...   वह हँसी और सुदर्शन जी मंत्रमुग्ध उसे देखते रह गये ;  " कुछ और न सूझा तुझे कहने को ?  खरगोश ही सूझा !देख तो,चुनार के जंगल की कँटीली झाड़ियों में खरगोश ढूँढ़ते , पकड़ते मेरी चुन्नी तो फटी ही, हथेलियों से खून निकल आया ।" किशोरी ने अपनी दोनों रक्तस्नात हथेलियाँ उनके आगे कर दी ।सुदर्शन जी की आँखों से आँसुओं की धार बह निकली" क्षमा कर दो,माँ । अपने इस मूर्ख , नालायक और उजड्ड पुत्र को क्षमा कर दो ।"और वे भगवती के चरणों पर गिर पड़े ।–ऋषि राज मिश्रा




मासिक पंचांग- जून  -2022  

भारतीय व्रत,उत्सव जून - 2022 

दिनांक - दिनांक - 2 महाराणा प्रताप जयंती,दिनांक - 3 विनायक चतुर्थी व्रत,श्री गुरु अर्जुन देव बलिदान दिवस,दिनांक - 5 स्कन्द षष्टी.विन्ध्वासिनी पूजा,दिनांक 8 श्री दुर्गा अष्टमी,धूमावती जयंती,मेला छीर भवानी , दिनांक 9 गंगा दशहरा,दिनांक 10 निर्जला एकादशी व्रत, श्री बटुक भैरव जयंती,दिनांक - निर्जला एकादशी व्रत,दिनांक 12 प्रदोष व्रत,दिनांक -13 सत्य व्रत,दिनांक - 14 कबीर जयंती,वट सावित्री व्रत दिनांक - 15  संकर्न्ति पुन्य, गुरु हरगोविन्द सिंह जयंती,दिनांक 17 श्री गणेश चतुर्थी व्रत,दिनांक- 21 कालाष्टमी,दिनांक -24 योगिनी एकादशी व्रत,दिनांक 26 प्रदोष व्रत दिनांक 27 मास शिवरात्रि,दिनांक - 28 अमावस्या,दिनांक - 30 गुप्त नवरात्र प्रारम्भ |

पंचक विचार जून- 2022  


पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा  पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है पंचक विचार- दिनांक 18 को 18 - 42 से दिनांक 23 से 06 - 14 बजे तक पंचक हैं |

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

भद्रा विचार जून- 2022 

भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार - भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना, स्नान करना, अस्त्र शस्त्र का प्रयोग, ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना, अग्नि लगाना, किसी वस्तु को काटना,घोड़ा ऊंट संबंधी कार्य, प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि  शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अति आवश्यक कार्य  में व 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

दिनांक 

शुरू 

दिनांक 

समाप्त 

04

13-30

04

02-42

07

07-55

07

20-12

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18-35

11

05-45

13

21-03

14

07-13

16

19-58

17

06-11

19

22-18

20

09-39

23

09-08

23

21-41

27

03-26

27

16-38



मूल नक्षत्र विचार जून - 2022 





दिनांक

शुरू 

दिनांक

समाप्त 

04 

21-54 

07 

02-25

13

21-24

15

15-32

22

05-02

24

08-03


अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

ग्रह स्थिति जून - 2022


ग्रह स्थिति - दिनांक 02 बुद्ध पूर्व उदय ,दिनांक 03  बुध मार्गी,दिनांक 04 शनि वक्री,दिनांक 15 सूर्य मिथुन में, दिनांक - 18 शुक्र वर्षभ में,दिनांक - 27 मंगल मेष में |

सर्वार्थ सिद्धि योग जून -2022

दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी  शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु  को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक  है| अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

दिनांक

प्रारंभ

दिनांक

समाप्त

01

05-28

01

13-00

02

16-03

03

19-04

09

04-30

09

05-27

11

05-27

12

02-05

13

05-27

13

21-24

17

09-55

18

07-38

21

05-27

22

05-02

23

05-28

24

08-03

27

05-30

28

05-30

30

05-31

01

05-31


सुर्य उदय- सुर्य अस्त जून -2022 


दिनांक

उदय 

दिनांक

अस्त 

05-25

1

19-13

5

05-24

5

19-15

10

05-24

10

19-17

15

05-24

15

19-19

20

05-25

20

19-20

25

05-26

25

19-21

30

05-27

30

19-23


चौघड़िया मुहूर्त 

चौघड़िया मुहूर्त देखकर कार्य या यात्रा करना उत्तम होता है। एक तिथि के लिये दिवस और रात्रि के आठ-आठ भाग का एक चौघड़िया निश्चित है। इस प्रकार से 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात मानें तो प्रत्येक में 90 मिनट यानि 1.30 घण्टे का एक चौघड़िया होता है जो सूर्योदय से प्रारंभ होता है|

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राहू काल 

 

राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |

 श्री राम और नाम 

महादेव जी को एक बार बिना कारण के किसी को प्रणाम करते देखकर पार्वती जी ने पूछा कि हे देव! आप किसको प्रणाम करते रहते हैं?शिवजी पार्वती जी से कहते हैं कि हे देवी ! जो व्यक्ति एक बार राम कहता है उसे मैं तीन बार प्रणाम करता हूँ । पार्वती जी ने पुन: एक बार फिर शिवजी से पूछा आप श्मशान में क्यूँ जाते हैं और ये चिता की भस्म शरीर पर क्यूँ लगाते हैं?उसी समय शिवजी पार्वती जी को श्मशान ले गए। वहाँ एक शव अंतिम संस्कार के लिए लाया गया। सभी लोग राम नाम सत्य है कहते हुए शव को ला रहे थे। शिवजी ने कहा कि देखो पार्वती ! इस श्मशान की ओर जब लोग आते हैं तो राम नाम का स्मरण करते हुए आते हैं और इस शव के निमित्त से कई लोगों के मुख से मेरा अतिप्रिय दिव्य राम नाम निकलता है उसी को सुनने मैं श्मशान में आता हूँ और इतने लोगों के मुख से राम नाम का जप करवाने में निमित्त बनने वाले इस शव का मैं सम्मान करता हूँ, प्रणाम करता हूँ और अग्नि में जलने के बाद उसकी भस्म को अपने शरीर पर लगा लेता हूँ।राम नाम बुलवाने वाले के प्रति मुझे अगाध प्रेम रहता है। एक बार शिवजी कैलाश पर पहुंचे और पार्वती जी से भोजन माँगा। पार्वती जी विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहीं थीं। पार्वती जी ने कहा अभी पाठ पूरा नही हुआ, कृपया थोड़ी देर प्रतीक्षा कीजिए।शिव जी ने कहा कि इसमें तो समय और श्रम दोनों लगेंगे। संत लोग जिस तरह से सहस्र नाम को छोटा कर लेते हैं और नित्य जपते हैं वैसा उपाय कर लो। पार्वती जी ने पूछा वो उपाय कैसे करते हैं? मैं सुनना चाहती हूँ। शिव जी ने बताया, केवल एक बार राम कह लो तुम्हें सहस्र नाम भगवान के एक हजार नाम लेने का फल मिल जाएगा।  एक राम नाम हज़ार दिव्य नामों के समान है। पार्वती जी ने वैसा ही किया। 

 

 

 


विमोचन



नारद जयंती के शुभ अवसर पर आदरणीय श्री तपन जी  संगठन मंत्री विद्या भारती मेरठ प्रांत के मार्गदर्शन में डॉ प्रदीप कुमार एवं सतीश शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक  "अनकही  कथा स्वतंत्रता संग्राम में पश्चिम उत्तर प्रदेश का योगदान" विषय पर दिनांक 15/05/ 2022 को भाउराव देवरस सरस्वती विद्या मंदिर सेक्टर 12 नोएडा के सभागार में प्रोफेसर रघुवेंद्र तंवर चेयरमैन आईसीएचआर एवं श्री सुरेंद्र सिंह कमिश्नर मेरठ व्यापारी नवीन जी (शगुन साड़ी) एवं डॉ ए के अग्रवाल सीएमडी रिवर इंडस्ट्री नोएडा के कर कमलों द्वारा विमोचन किया गया।

इस अवसर पर डॉ विशेष गुप्ता पूर्व चेयरमैन बाल आयोग,श्री आशुतोष भटनागर जी निदेशक जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर श्री रवि श्रीवास्तव जी प्रेरणा,श्री रमन चावला जी एवं अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

कर्मफल



एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और परमेश्वर का भक्त था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था।

उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया।

राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है।

जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं, परंतु सभा में मैं सत्य न कहूँगी क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर को कलंक लगेगा तथा इस बात पर कोई विश्वास भी न करेगा।'

प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः "मेरे पति को कोई मार गया।" लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः "किसने मारा है?"

वह कहने लगीः "मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था" राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा। उन्होंने उसको पकड़ लिया और पूछाः "तूने राजकुमार को क्यों मारा?"

ब्राह्मण ने कहाः "मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।"

ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ.... राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा ने ब्राह्मण से कहाः

"मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं देता लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।"

ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया। इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर विदेश में चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ।

किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः "माताजी ! आपके पति ज्योतिषी जी महाराज कहाँ गये हैं?"

तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि "मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।" इतने में ज्योतिषी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषी जी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता ! कैसे आना हुआ?"

"आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका कारण है?"

"यह मेरी स्त्री नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी - जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है। यह स्त्री नहीं, मेरा किया हुआ कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं।

*अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।*

*नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतेरपि॥*

'अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।' इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े।"

"महाराज ! आपने क्या कर्म किया था?" 

"सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी स्त्री गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी थी और कमजोर भी हो गयी थी। मेरा स्वभाव बड़ा दुष्ट था, इसलिए मैं इसके फोड़े में चोंच मारकर इसे ज्यादा दुःखी करता था। जब दर्द के कारण यह कूदती थी तो इसकी फजीहत देखकर मैं खुश होता था। मेरे डर के कारण यह सहसा बाहर नहीं निकलती थी किंतु मैं इसको ढूँढता फिरता था। यह जहाँ मिले वहीं इसे दुःखी करता था। आखिर मेरे द्वारा बहुत सताये जाने पर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ गंगा जी के किनारे सघन वन में हरा-हरा घास खाकर और मेरी चोटों से बचकर सुखपूर्वक रहने लगी। लेकिन मैं इसके बिना नहीं रह सकता था। इसको ढूँढते-ढूँढते मैं उसी वन में जा पहुँचा और वहाँ इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर-से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी। मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। 'पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ेगा।' ऐसा सोचकर यह गंगाजी में प्रवेश कर गयी परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी स्त्री हुई। जो मेरे मरणपर्यन्त अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा, इसका दोष नहीं मानूँगा क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ। अब अपना प्रश्न पूछो।"

ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः "अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया?"

ज्योतिषीः "राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है।"

"किस प्रकार?"

"पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गया है?"

आपने प्रण कर रखा था कि 'झूठ नहीं बोलूँगा।' अतः जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ आपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। गंगा के किनारे वह उसकी चमड़ी निकाल रहा था, इतने में ही उस जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खाकर गंगाजी के किनारे ही उनकी हड्डियाँ उसमें बह गयीं। गंगाजी के प्रताप से कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को हंसिये से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो।"

कितना सहज है ज्ञानसंयुक्त जीवन ! यदि हम इस कर्मसिद्धान्त को मान लें और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे। भगवान श्रीकृष्ण इस समत्व के अभ्यास को ही 'समत्व योग' संबोधित करते हैं, जिसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त होने पर मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है।




मुंग के दाल के लडू (राम लडू )

आमिर गरीब,छोटा बड़ा सब मुंग के दाल के लडू बहुत शोक से खाते है,आओ आज बनाते है मुंग की दाल के लडू जिसको आम भाषा में राम लडू भी कहते है |

मुंग की दाल के लडू व हरी चटनी बनाने की सामग्री |

दो कप मुंग की धुली दाल , 1 /2 कप चने की दाल , नमक , जीरा ,खाने का सोडा तेल पुधिना 

हरा धनिया हरी मिर्च अदरक काला नमक चाट मसाला अमचूर,निम्बू मुली |

मुंग की दाल के लडू /राम लडू बनाने की विधि 

मुंग की दाल व चने की दाल को अलग अलग भिगो दे कम से कम 5 घन्टे तक |

दाल भीग जाने के बाद बारीक़ पीस ले ,अब दोनों को एक बर्तन में मिला कर पीस ले इस में नमक व जीरा मिला दे | कड़ाई में तेल गर्म करे ,हाथ या चमक से छोटे गोल लडू बना कर हलकी आच पर तले,सुह्नेहरे होने पर छलनी में निकाले ,

 हरा धनिया ,पुधिना ,हरी मिर्च ,अदरक ,अमचूर काला नमक ,नमक ,निम्बू का रस मिला कर पीस ले चटनी तयार |

मुली को कस ले 

एक प्लेट में मुंग की दाल के लडू रखे कसी मुली व चाट मसाला बुर्के हरी चटनी के साथ खाए व खिलाये मजेदार लाजबाब मुंग की दाल के लडू |                                       मिथलेश शर्मा    

 




विभिन्न वारो में पैदा हुए बच्चो का स्वभाव



हम सब में  एक जिज्ञासा होती है कि हम जिस वार में पैदा हुए हैं  उस वार में पैदा होने का क्या फल होता है | तो आज हम चर्चा करते हैं अलग-अलग वारो में पैदा हुए बच्चों का स्वभाव कैसा होता है |

रविवार - रविवार को पैदा हुए बच्चे भाग्यवान,कम बोलने वाले,विद्या कला एवं आच्छे व्यक्तित्व के स्वामी होते है | दीर्घायु, अच्छे कपड़े पहनने की आदत होती है, भाई बंधुओं मित्रों को खुश रखने का प्रयास करते हैं और खुद भी खुश रहते हैं | अगर सूर्य  कमजोर हो तो कामचोर व मतलबी होते हैं हर काम में  जल्दबाजी करते हैं | 22 साल की उम्र में थोड़ा कष्ट भी पाते हैं | 

सोमवार सोमवार को पैदा होने वाले तबीयत से,हंसमुख मीठा बोलने वाले,शीतल स्वभाव सुख दुख में सम रहते हैं विद्वान होते हैं कला कुशल होते हैं बहादुर हैं होते हैं मानवता के उपासक होते हैं बात प्रवृत्ति एवं कमजोर दिल के स्वामी होते हैं | 9 वर्ष 12 वर्ष 17 वर्ष की उम्र में कष्ट पाते हैं | 84 वर्ष की आयु तक जीवन जीते हैं |

मंगलवार - मंगलवार को पैदा हुए बालक धनी होते हैं लेकिन उग्र स्वभाव के होते हैं साधारण लोगों को नाराज कर देते क्योंकि उग्र स्वभाव के होते हैं किसी पर विश्वास नहीं करते | धर्म-कर्म में रुचि ना के बराबर होती है लड़ाई झगड़ों में बहादुर होते हैं अगर वह पुलिस या सेना में चले जाएं तो ज्यादा कामयाब होते हैं स्त्री को प्यार करते हैं माता-पिता से सदैव लड़ते रहते हैं | चर्म व खून के रोगी होते हैं दूसरे और तीसरे साल पैदा में बड़े कष्ट होते हैं | 

बुधवार - बुधवार को पैदा हुए व्यक्ति बुद्धिमान मधुर भाषी सुंदर विद्वान धार्मिक विचार वाले माता-पिता का सम्मान करने वाले दर्शन अध्यात्म में रूचि करने वाले चित्रकार धर्मकर्म में दृढ़ रहते हैं जो बात कह दी उस पर अटल रहते हैं 8 साल 22 साल में अरिष्ट होता है अगर बुध कमजोर हो तो आलसी और नशेड़ी भी हो जाते हैं 

गुरुवार - गुरुवार को जन्मे बालक  धनवान विद्वान बुद्धिमान पराक्रमी ज्यादा संतान वाले अगर उत्तम से पुरुषों की संगति करते हैं तो उत्तम होते हैं और बुरे लोगों की संगति करते हैं तो बुरे निकल जाते हैं बड़े रूडीवादी  होते हैं जो कह देते हैं या जो सुन लेते हैं उसका पालन करते हैं शास्त्रों के ज्ञाता होते हैं धर्म-कर्म में रुचि रखते हैं विद्वान होते हैं धार्मिक होते हैं परिवार की उन्नति के लिए सब कुछ करने को तैयार रहते हैं मित्रों को भी प्रसन्न रखने की कोशिश करते हैं इस कारण से कई बार खुद ज्यादा तरक्की नहीं कर पाते ऐसे लोगों में मान सम्मान पाने की बड़ी इच्छा रहती है इनके अंदर | 7 12 13 16 30 वर्ष में बीमारी से कष्ट होताहै अगर गरु कमजोर होतो ज्यादा तार्किक 


हो जाते है इससे जीवन में नुकसान उठा सकते है|

शुक्रवार - शुक्रवार को पैदा हुए व्यक्ति मधुर भाषी होते हैं सहनशील बहुत होते हैं इनके अंदर एश्वर्या पूर्ण जीवन जीने की ललक होती है मनपसंद काम करते हैं हर एक को विचारों में उल्च्ये व खुद भी विचारों में उलझे रहते हैं भाग्यवान होते हैं प्रतिभा के धनी होते हैं कला में बहुत जरूरी होती है अच्छा खानपान और कपड़े पहनना इनकी आदत होती है शरीर से मजबूत दिखते हैं लेकिन धर्म-कर्म थोड़े कम होते  है 

शनिवार - शनिवार को पैदा होने वाले जातक साधारण वा लालची आलसी कृषि व्यापार में विशेष रूचि रखते हैं दूसरों से काम कराने में माहिर होते हैं छोटी आयु में ज्यादा कष्ट होता है दूसरों की भलाई में कोई रूचि  नहीं होती परिवार के शत्रु होते हैं  मित्र रखने में अपनी शान समझते हैं अपने से नीचे वाले को दवा कर रखने की आदत  होती है दीर्घायु होते है




राहू ग्रह के गोचर का हमारे जीवन पर प्रभाव  

राहू और केतु छाया ग्रह मानते है | राहू वक्री चलते है यानि की उल्टा ,अप्रैल में राहू शुक्र की राशी वृषभ से मंगल की राशि मेष में गोचर कर रहे है। यह राशि में गोचर अक्टूबर 2023 तक रहेगा। इसके बाद मीन राशि में गोचर करेंगे। राहू के राशी परिवतर्न से कुछ राशी को लाभ होगा कुछ को हानि | वर्षभ ,मिथुन व कर्क को लाभ व मेष ,शिंह व मीन राशी को नुकशान होने वाला है |

वृषभ राशि - वृषभ राशि वालों के लिए भी उन्नति के अनेको अवसर लेकर आ रहा है। इस दौरान आपको धन लाभ की सम्भावना है। लंबी दूरी की यात्रा व विदेश यात्रा पर जाने का योग बन रहा है। नौकरी करने वालो को तरकी व काम में सफलता मिलेगी अपने उच्च अधिकारियो से आपकी प्रशंसा मिलेगी। राजनीति से जुड़े हैं या राजनीति में जाना चाहने वाला का समय बहुत आच्छा है वे जो चाहते है व्ही होने की सम्भावना हैं उनके लिए भी यह समय अनुकूल है। अगर वे बहते पानी में आठे की गोली ढालें तो आधिक लाभ होगा ।

मिथुन राशि - इस राशि वालो के  जीवन के में राहु ग्रह सफलता लेकर आए हैं। इस दौरान इनकी  आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और कार्यक्षेत्र में छवि सुधरेगी। धन प्राप्त करने के अनेक मौके मिलने के काफी योग हैं। व्यापारी और छात्रों को भी उन्नति के आनेको अवसर मिलने की संभावना है। राजनीतिज्ञों को राहु ग्रह की कृपा मिलेगी और आपको कोई बड़ा पद मिल सकता है।मिथुन राशी के लोग अगर इस समय गरीब छात्रों की मदद करे तो विशेष लाभ मिलेगा | 

कर्क राशि - नौकरी करने वालो को तरकी  मिल सकती है। नई नौकरी की खोज में लगे जातको को भी शुभ समाचार जल्दी ही प्राप्त होगा। प्रमोशन का इंतजार कर रहे व नौकरी बदलना चाह रहे जातको के लिए भी यह समय बेहद ही उपयोगी है। व्यापार कर रहे लोगो लाभ मिलने की उम्मीद है | यदि आप निवेश करते हैं तो आपको विशेष तौर पर लाभ मिलेगा। यदि आप नया घर, नई गाड़ी, या जेवरात आदि खरीदने की योजना बना रहे हैं तो उसके लिए समय अनुकूल है। आप योजना बना  सकते हैं।

मेष राशि -  मेष राशि वालों को विशेष  परेशानि होगी । धन निवेश न करें। पहले तीन महीनों के दौरान तो विल्कुल भी नही । असुरक्षा की भावना रह सकती  हैं। अपनी भाषा पर नियंत्रण रखे नुकसान उठाना पड़ सकता है | यात्रा में सावधानी बरते | हनुमान चालीसा का पाठ करे उनके आशीर्वाद से मन मजबूत रहेगा |

सिंह राशि: नौकरी में परेशनी व उच्च कर्मचारियों के साथ संबंध  बिगड़ सकते हैं। यात्राओं पर जाने पर सावधानी बरते  पैसा आधिक खर्च हो सकता है सतर्क रहना होगा नुकसान होने की संभावना आधिक है | भाग्य कमजोर रहने की आशंका है। आपको किसी भी काम में सफलता पाने के लिए कड़ी से कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। प्रेम संबंध में कुछ उथल-पुथल का सामना करना पड़ सकता है। नौकरी की तलाश कर रहे जातको को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। रविवार को सूर्य उपासना करे | 

मीन राशि - मीन राशी के जातको पर शत्रु हावी होने की कोशिश कर सकते है । आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। सफलता पाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़गी । छात्रों को भी ये गोचर कई चुनौतियां लेकर आएगा। राहू का परिवर्तन आर्थिक रूप से कई अनिश्चितताएं लेकर आ सकता है। अचानक से कुछ ख़र्चों का सामना करना पड़ सकता है। अपनी  वाणी को नियंत्न में रखे वरना परेशानी आ सकती है। मछली को खाने को दे |



संसार में कोई भी मनुष्य सर्वज्ञ नहीं है, सभी लोग अल्पज्ञ हैं।इसलिए सभी लोगों से कहीं न कहीं, छोटी,बड़ी,जाने अनजाने,कुछ न कुछ गलतियां होती ही रहती हैं। 

 अधिक जानकारी के लिये संपर्क करें - शर्मा जी - 9560518227


हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा

   हरियाणा के हिसार ( वीर बरबरान ) मे एक पीपल का पेड़ है जिसको वीर बर्बरीक ने श्री कृष्ण भगवान के कहने पर अपने वाणों से छेदन किया था !  आज भ...