सोमवार, 4 जुलाई 2022

जानकारी काल जुलाई - 2022

 हिंदी मासिक 

जानकारी काल 

वर्ष-23,       अंक-02 ,  sumansangam.com         जुलाई - 2022,    पृष्ठ 40,        मूल्य-2-50

 


पिवन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः, स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः । 

नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः, परोपकाराय सतां विभूतयः ॥ 

भावार्थ - नदियाँ अपना पानी स्वयं  नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते, बादल अपने जल से उगा हुआ अनाज स्वयं नहीं खाते । इसी प्रकार सत्पुरुष भी अपने सत्प्रयासों से प्राप्त लाभ/ उपलब्धि का भोग स्वयं नहीं करते। वास्तव में सत्पुरुषों का जीवन परोपकार के लिए ही होता है

संरक्षक

 श्रीमान कुलवीर शर्मा

महामंत्री समर्थ शिक्षा समिति

डॉ वी  एस नेगी

प्रोफेसर भगत सिंह कॉलेज सांध्य


 प्रधान संपादक व  प्रकाशक

 सतीश शर्मा 


 

 कार्यालय

 ए 214 बुध नगर इंद्रपुरी

 नई दिल्ली 110012


 मोबाइल

  9312002527


 संपादक मंडल

 सौरभ  शर्मा,कपिल शर्मा,

गौरव शर्मा,डॉ अजय प्रताप सिंह, करुणा ऋषि, डॉ मधु वैध, भूप  सिंह यादव, ऋतु सिंह, राजेश शुक्ल  


प्रकाशक व मुद्रक सतीश शर्मा के लिय ग्लैक्सी प्रिंटर-106 F,कृणा नगर नई दिल्ली 110029, A- 214 बुध नगर इं पूरी नई दिल्ली  110012 से प्रकाशित |


सभी लेखों पर संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है पत्रिका में किसी भी लेख में आपत्ति होने पर उसके विरुद्ध कार्रवाई केवल दिल्ली कोर्ट में ही होगी

 

R N I N0-68540/98


         अनुक्रमणिका


सम्पादकीय   - 2 

शिक्षा में संस्कति बोध  - 3  ,

राम काज किन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम  - 6   ,

पंचक क्या है कब लगते है गुण व दोष   - 8   ,

शबरी के राम   - 10 कहानी 

पंडित की प्रेम कहानी   - 13  , कहानी 

मासिक पंचांग,पंचक विचार,भद्रा विचार,जुलाई मास के व्रत,सर्वार्थ सिद्ध योग,मूल विचार - 16 

मुहर   - 20  कहानी 

सकाम और निष्काम भेद    - 22  

नश्वर कविता    - 23  

तनोट माता मंदिर  - 24  ,

स्त्री मुक्ति, राजा राम मोहन राय - 26  

भारत में भारतीय शिक्षा को पुनर्स्थापित करने वाले विवेकानन्द - 29 

विभिन नक्षत्रो में पैदा हुए बालको का स्वभाव   - 31 

जुलाई के महत्वपूर्ण दिन  - 32 

योग कपालभाती  - 34 

गुरु - 36 

बेसन के गट्टे की सब्जी  - 36  

हरयाली तीज  - 37 

कवाँड यात्रा  - 38  

देव शयनी एकादशी  - 39

कामिका एकादशी  - 40  

   



सम्पादकीय  

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंघस्य प्रविश्यन्ति मुखे मृगाः। ।

प्रत्यक्ष करने पर ही किसी कार्य में यश मिलता है , केवल मनोरथ पूरी करने से कार्य सिद्ध नहीं होते। सोए हुए सिंह  ( शेर ) के मुख में अन्य प्राणी जाकर स्वयं ग्रास नहीं बनते। अर्थात सिंह को भी भूख शांति करने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है।

कुछ लोगो के पास ज्ञान का भंडार तो बहुत होता है फिर भी वह अपने न तो अपने सामाजिक जीवन, न ही व्यवसायिक जीवन और न ही निजी जीवन में या तो सफल ही नहीं हो पाते या उतनी सफलता प्राप्त नहीं कर पाते जिसके वे अधिकारी होते है । ऐसा इसलिए होता है कि वे समस्या को तो अच्छे से पहचान तो लेते हैं परन्तु उसके समाधान पर कार्य नहीं कर पाते। इसलिय समस्या का कारण,समाधान व उसको दूर करने की इच्छा शक्ति होनी चाहिए | समस्या को नजरअंदाज करने से मानसिक तनाव होता है | किसी भी व्यक्ति, समाज,संस्कृति और राष्ट्र की विजय समस्याओं के समाधान से सुनिश्चित होती न कि समस्या को नजरअंदाज  करने से। प्रथम हमें समस्या को अच्छी तरह से समझना चाहिए फिर उसके समाधान पर कार्य करना चाहिए।दो ही प्रकार के व्यक्ति वस्तुतः जीवन में असफल होते है,एक तो वे जो सोचते हैं, पर उसे कार्य का रूप नहीं देते और दूसरे वे जो कार्य-रूप में परिणित तो कर देते हैं पर सोचते कभी नहीं। कुछ ऐसा करो कि समाज की उन्नति हो। समाज स्वस्थ, सदाचारी बनकर उन्नति के मार्ग पर चले जिससे सबका भला हो। वेद यही तो कहते हैं, जब हर प्रकार से आप अपना कल्याण कर लें तब धन के, भोग के पीछे मत भागना। हम समस्या के बारे सब जानते है,कुछ समाधान भी जानते है पर इक्छा शक्ति के आभाव के कारण कुछ नहीं कर पाते | अच्छे कार्य करने से ही व्यक्ति महान बनता है। विचारात्मक प्रवृत्ति रचनात्मक जरूर होनी चाहिए। जिस दिन शुभ विचार सृजन का रूप ले लेता है उस दिन परमात्मा भी प्रसन्न होकर नृत्य करने लगते हैं। मैंने दुनिया से बहुत लिया अब देने की बारी है। अब लेने के लिए नहीं देने के लिए जीना। मत भूलो ये जीवन अस्थायी है। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षण का सम्मान करो। मृत्यु आ जाएगी तो कुछ भी ना रहेगा। ना यह शरीर, ना इच्छाएं, ना कल्पनाएँ , ना धन। हर चीज तुम्हारे साथ यही समाप्त हो जाएगी । इसलिए केवल स्वयं के लिए नहीं अपितु समष्टि के लिए जीना है । 

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ।

नहीं रुकना, नहीं थकना, सतत चलना सतत चलना ।

यही तो मंत्र है अपना, शुभंकर मंत्र है अपना 



          

शिक्षा में संस्कृति बोध

 सुरेश सोनी  

प्रत्येक समाज में एक लम्बे अनुभव से निकलते-निकलते कुछ विशेषताएं बन जाती हैं उनकों हम संस्कृति की विशेषता कहते हैं। हमारे यहां पर कहा गया कि यह समाज में संस्कारयुक्त व्यवहार से संस्कृति की विशेषता उत्पन्न होती है तो यह संस्कार क्या है? अब कोई न कोई क्रिया होगी जब उसका कोई न कोई अवशेष रह जाएगा तो वह संस्कार है। हथोड़ा मारा हमने तो एक निशान छूट गया, जो निशान छूट गया वह संस्कार है। संस्कार के संदर्भ में भी हमारे पूर्वजों ने सोचा और उन्होंने उसकी एक व्याख्या की। इसकी मीमांसा में हमारे ऋषि कहते हैं कि विशेष गुणवृद्धि होना ही संस्कार है और शंकराचार्य ने अपने ब्रह्मसूत्र के भाष्य के अंदर उसको और विस्तृत रूप से व्याख्यायित किया। उन्होंने ‘’दोषापनयेन गुणाधान संस्कार:’’ के रूप में संस्कार शब्द की परिभाषा की। हमारे जीवन में जो दोष हैं, कमियाँ हैं, उनको निकाले और जो सद्गुण हैं उनको ग्रहण करें, यह जो निकालने और ग्रहण करने की प्रक्रिया है, यही संस्कार है। इसी संस्कार के माध्यम से धीरे-धीरे जीवन के व्यवहार की विशेषताएं प्रकट होंगी और इसलिए जब हम भारतीय संस्कृति की विशेषताओं के सम्बन्ध में जो भी विचार प्रस्तुत करते हैं वे विशेषताएं एक दिन में पैदा नहीं हुई हैं।

भारतीय जीवन में संस्कार की बहुत सी बातें हैं जैसे ‘मातृवत् परदारेषु’, अर्थात् पराई स्त्री को माँ के समान समझो। एक संस्कार है ‘परद्रव्याणि लोष्ठवत्’ अर्थात् दूसरे के धन को मिट्टी के समान समझो। एक अन्य संस्कार है ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ सभी को अपने जैसा या अपनी आत्मा से जुड़ा समझो। हम देखते हैं कि हमारी इन विशेषताओं ने भारतीय समाज-जीवन को एक ऊँचाई प्रदान की। आजकल का जीवन भले ही कुछ अलग हो गया है परन्तु लगभग 1000 साल पहले की हमारी संस्कृति का भारत में आनेवाले ज्यादातर विदेशी समाज के लेखकों ने जो वर्णन किया है, अगर आज आप पढे़गे तो पाएंगे कि यह सारी विशेषताएं उन्होंने जीती-जागते रूप में हमारे समाज में उन्होंने देखीं। हमारे समाज में विद्यमान संस्कारों- यथा अतिथि-सत्कार, दया , करूणा, न्याय, नैतिकता आदि का रूप जैसा उन्होंने देखा, वैसा वर्णन किया। अतः यदि हम पुनः वैसा ही समाज जीवन बनाना चाहते हैं तो समाज में संस्कृति बोध आवश्यक है।

यह जो संस्कृति बोध है समाज के अंदर उसे पीढी दर पीढी स्थानांतरित अथवा हस्तांतरित करने का माध्यम अनेक प्रकार की कलाएं है। जिस प्रकार सामान्यतः अक्षरज्ञान की जो शिक्षा होती है, उसका सम्बंध बुद्धि से होता है, कला का संबंध हृदय से होता है। इस प्रकार बुद्धि और हृदय का परिष्कार करने के लिए हमारे यहां पर साहित्य है, संगीत है, कला है इनको जीवन में बहुत महत्व दिया गया है। संस्कृत में एक सुभाषित है- ‘‘साहित्य, संगीत, कला विहिनः साक्षात पशु पुच्छ विषाणहीनः’’ अर्थात् जिस मनुष्य के जीवन में न तो साहित्य है न कला है न संगीत है न उसकी रूचि है वह मनुष्य तो है परन्तु कैसा है वह बिना पूंछ के पशु जैसा है। जब साहित्य कहेंगे तो उसमें कथा है, कहानी है, कविता है, उपन्यास है, अर्थात् कई तरह से विभिन्न रूपों में विचार और भावना की अभिव्यक्ति हुई है। जब हम संगीत कहेंगे तो स्वरों की दुनिया है वह मुंह से गाए हुए रागों की भी एक दुनिया है और यन्त्रों के माध्यम से स्वरों के जो स्पन्दन निकलते हैं उसकी भी एक दुनिया है उनके अपने-अपने अन्तर हैं।

आजकल इस पर बहुत विश्लेषण किया ज़ा रहा है कि यह जो भारतीय शास्त्रीय संगीत है वह सुकून देता है, मनुष्य तन्मय हो जाता है, तनाव निकल जाता है, क्यों है ऐसा? यह जो भारतीय संगीत है, राग है उसके स्पन्दन ऐसे हैं कि वह दिमाग में तनाव लाने वाली जो बातें है उन सबको हटा देता है। धीरे-धीरे आदमी तन्मय हो जाता है। 1935 में इटली में संगीत प्रेस वार्ता हुई थी मुसोलिनी उस समय तानाशाह था, भारतीय संगीतज्ञ पंडित ओंकारनाथ ठाकुर उससे मिले। उस समय मुसोलिनी को बताया गया भारतीय संगीत में सुबह का राग है, शाम का राग है, दुःख का राग है, सुख का राग है, तो मुसोलिनी ने कहा मुझे पता नहीं है, पर मुझे कुछ दिन से नींद नहीं आ रही है। क्या आपके पास कोई ऐसा राग है जिसे सुनकर मुझे नींद आ जाए। कोशिश करता हूँ यह कहकर ठाकुर जी ने बजाना चालू किया और 15-20 मिनट के अंदर मुसोलिनी गहरी नींद में सो गया। दो दिन तक सोता रहा। तो संगीत की भी एक दुनिया है – दो पेड़ लगा करके अरविन्द आश्रम में प्रयोग किया गया कि एक के सामने माइकल जैक्सन और मैडोना वगैरह का पॉप संगीत बजाया गया और दूसरी तरफ भारतीय संगीत। प्रभाव देखिये कि जिसके सामने भारतीय संगीत बजा उस पेड़ के पत्ते बड़े अच्छे थे और जहाँ पॉप म्यूजिक बज रहा था उसके पत्ते बहुत कटे-फटे और खंडित। लम्बे समय में पॉप संगीत मनुष्य के व्यक्तित्व को आंतरिक रूप से खण्डित कर देता है। इसलिए पॉप म्यूजिक के जितने पॉप स्टार वर्ल्ड में हुए वे तनावग्रस्त हुए, जेलों में गए या आत्महत्याएं की।

इसी प्रकार रंगो और रेखाओं की भी एक दुनिया है – चित्रकला है, मूर्तिकला है, कार्टून बनते हैं, आजकल चित्ररेखाएं है और चित्र बहुत कुछ कह देता है। अगर हम मूर्तियों का निरीक्षण करेंगे तो हमें जीवन के सभी रंग वहां दिखाई देंगे। जैसे रंगों और रेखाओं की एक दुनिया है, वैसे ही भाव और भंगिमाओं की भी एक दुनिया है। दृष्टि इधर की उधर होने से अर्थ बदल जाता है। दृष्टि या नजर अर्थात् देखना। आंख से देखते हैं। तो आंख इधर-उधर घुमाते हैं, लेकिन आंख घुमाने के पीछे भी मनोविज्ञान है। कोण बदलने के साथ भाव और अर्थ बदल जाता है। एक उर्दू की पंक्ति थी, ‘‘नजर ऊंची की तो दुआ बन गई, नजर नीची की तो हया बन गई।’’ कुछ लज्जास्पद काम कर दिया तो नजर नीची हो जाती है। ‘‘ नजर तिरछी की तो अदा बन गई, नजर फेर ली तो कजा बन गई।’’ एक ही दृष्टि है, कोण बदल गया तो अर्थ बदल गया, भाव बदल गया। इसीलिए कहते हैं कि भाव भंगिमाओं की भी एक दुनिया है। भरतमुनि का नाट्य शास्त्र पूरा का पूरा इसी विषय पर केन्द्रित है। यह संसार भी एक नाटक है, हमारे यहाँ सारे ब्रह्मांड के अंदर शिव का तांडव नृत्य उसका प्रतीक है। नटराज का चित्र सारे ब्रह्माण्ड के सृजन और विध्वंस की कहानी है, उसके अंदर ही ध्वंस भी है और संतुलन भी। कला इसकी वाहक होती है और इन सबका अधिष्ठान अध्यात्म है। उसकी बहुत व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है।

हमारे पूर्वजों ने कही कि मूलतः एक ही तत्व है उसे सर्व खलिव्दम् ब्रह्म कहा होगा ईशावास्यमिदं सर्वं कहा होगा और उस एक ही मूल तत्व से विविध तत्व बने और इसलिए विविधता में एकता है, इन विविध तत्वों के आपस में सम्बन्ध हैं और इस आधार पर आपसी सम्बन्धों की परिवार संकल्पना के रूप में परिभाषित किया। इस नाते मनुष्य का शरीर भी इन्द्रियां, मन, बुद्धि यह भी एक परिवार है। फिर अपना घर भी परिवार है। कुल भी परिवार है बाकि सब परिवार है। परिवार की संकल्पना से जुड़ना और तब फिर परस्पर सहयोग और परस्पर आश्रितता की भावना स्वभाविक रूप से उसमें से निकलकर आती है। करूणा और संवेदना के बिना यह जुड़ाव संभव नहीं हो पाता है और इसलिए कहा गया है कि हमारी शिक्षाओं का, हमारी कलाओं का उद्देश्य मानव-हृदय को उदात्त बनाना और उसमे करुणा का सृजन करना है। उसकी संवेदना, उसकी जो संवेदनशीलता है, उसकी व्याप्ति बढ़ती चली जाए और इस नाते से यह जो हमारा एक आधारभूत अधिष्ठान है, जो अधिष्ठान संपूर्ण विश्व को एक परस्पर सहयोगी रूप प्रदान करने के अंदर एक आधार देता है, उसका बोध होना। उस बोध के प्रकाश में दीर्घकाल के प्रवाह में बनी हुई संस्कृति की विशेषताओं को शिक्षा और कला के विविध कार्यक्रमों के माध्यम से आने वाली पीढियों के अंदर संक्रमित करते हुए उन सबके मन के अंदर संस्कृति बोध को जाग्रत करना, यह हम सबका उद्देश्य होना चाहिए।




राम काज किन्हें बिनु,मोहि कहां विश्राम



किसी छोटे कस्बे के रेलवे प्लेटफार्म पर पड़े अख़बारों की जो दशा वहां से राजधानी के गुजरते ही होती है, वैसा ही कुछ हनुमान जी की छलांग लगाने पर पेड़ों का होता है! जैसे तेज गति से गुजरती ट्रेन के साथ ही कागज के टुकड़े और दूसरी हल्की-फुल्की चीज़ें उड़ चलती हैं, कुछ वैसे ही महेंद्रगिरी पर्वत से जब हनुमान छलांग लगते हैं, तो उनके वेग से भी कई पेड़ उखड़ जाते हैं। उनके साथ उड़ चले ये पेड़ तो कुछ वहीँ आस पास और कुछ समुद्र में गिर गए, मगर हनुमान आगे लंका की ओर बढ़ते रहते हैं। यहीं उन्हें पहली बार विश्राम का अवसर मिलता है। मैनाक पर्वत उनके सामने निकलकर आता है। अचानक जिसे अपनी उड़ने की शक्ति याद आ गयी हो उसे क्या करना चाहिए?

हनुमान जी के पास यहाँ रुकने सुस्ताने का पूरा मौका था लेकिन वो नम्रतापूर्वक मना करके आगे बढ़ जाते हैं। वहा  रूककर सोने नहीं लगते। यहाँ से थोड़ा ही आगे उनकी मुलाकात सुरसा से होती है। यहाँ हनुमानजी चतुराई से काम लेते हैं पहले आकार बड़ा करके और फिर छोटा करके वो सुरसा के मुख में प्रवेश करके निकल आते हैं। इससे आगे बढ़ते ही उनकी भेंट सिंहिका नाम की राक्षसी से होती है जो परछाई को रोककर जीवों को खा जाती थी। हनुमान जी उसे मारकर आगे बढ़ते हैं। रुकने के जो तीन मौके मिलते हैं, उन तीनों पर उनकी प्रतिक्रियाएं अलग अलग हैं!

तो पहले तो ये सीखने को मिलता है कि अगर आपकी गति तेज हो भी तो रास्ते में रुकना नहीं है। जब तक काम पूरा नहीं होता, तब तक रास्ते में कोई मैनाक जैसा सुन्दर-रमणीय पर्वत आये, या कहिये कि अच्छे प्रलोभन दिखें तो उनके लिए ठहरने के बदले आगे बढ़ा जाना चाहिए। जो बाधाएं रास्ते में आएँगी, जरूरी नहीं कि वो खूबसूरत हों, प्रलोभन हों। हो सकता है वो डराने का प्रयास करने वाले वैसे कॉमरेड हों जिन्हें हर बात में “ना हो पायेगा” सूझता है। कई दूसरे “रोचक” कार्यों में उलझाने की कोशिशें हों, डरा-धमका कर रोका जाए ऐसा हो सकता है। रुकना इन पर भी नहीं है।

तीसरा प्रयास पूरा मार देने का ही होता है। जब बहलाने-फुसलाने और डराने-धमकाने से काम नहीं बना तो सिंहिका रोकने की कोशिश करती है। इस बार हनुमान उसे मारकर आगे बढ़ते हैं। यहाँ बर्ताव पर भी ध्यान दिया जा सकता है। तीनों मोटे तौर पर एक सी हरकत कर रहे होते हैं – रोकने की कोशिश। तीनों बार हनुमान जी की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग होती हैं। यानी आज के (कुछ असंवैधानिक कानूनों को छोड़कर) अधिकतर कानूनों में जैसा कहा जाता है, बिलकुल वैसा ही प्रेरणा क्या थी, क्यों की ये हरकत, उसके आधार पर सजा तय होती है। क्या हरकत की उसके हिसाब से कुछ नहीं किया जा रहा है। जब मैनाक को “ना” कहा जा रहा है तो पूरी विनम्रता से कहा जा रहा है। जरूरी नहीं कि इनकार करते वक्त सम्बन्ध बिगड़ ही जाएँ या बिगाड़े जाये । हनुमान जी “एस्सेर्टीव” होते हैं “एग्ग्रेसिव” नहीं होते। दूसरी बार में वो देखते हैं कि ये सिर्फ शक्ति-सामर्थ्य की जांच है, वहां वो दिखाते हैं कि एक दूत की तरह चतुराई,व्यवहार-कुशलता का इस्तेमाल करते हैं। “पॉवर” के बदले “टैक्ट” का प्रयोग करते हैं। तीसरी बार में वो ऐसा कुछ नहीं करते। जो सामने थी वो स्वरभानु, जिसका सर-धड़ अलग होने से राहू केतु बने थे, की माँ थी। पहले भी उससे हनुमान का सामना हो चुका था। यहाँ लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जब एक दूत के रूप में हनुमान जी को दर्शाने के लिए सुन्दरकाण्ड की रचना की गयी तो उस पर समय और लेखक का भी प्रभाव रहा होगा। वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी रौद्र रूप में हैं, तो तुलसीदास जी के में भक्ति वाले रूप में ही दिखते हैं। इन सबसे ऊपर होता है उसे पढ़ने वाला पाठक। भक्ति और आध्यात्म जैसी चीज़ें छोड़कर “मैनेजमेंट लेसन” भी ढूंढें जा सकते हैं। समुद्र के किनारे से सीप चुनकर घर लौटने से हमें कौन रोक सकता है भला? “माह लाइफ, माह चॉइस!” जब कछुवे-खरगोश की कहानी से बिना रुके चलते रहना नहीं सीखा, तो हनुमान जी से भी लक्ष्य तक पहुंचे बिना विश्राम न करना सीखने का मन नहीं हो, ऐसा हो सकता है।


पंचक क्या है कब लगते है इनके गुण दोष क्या है



अपने परिपथ भ्रमण के काल में गोचरवश जब-जब चद्रँमा कुंभ और मीन राशियों में अथवा कहें कि धनिष्ठा नक्षत्र के उत्तरार्ध में, शतभिषा, पूर्वामाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्रों में होता है, तो इस काल को पंचक कहते हैं। अधिकांश लोगों में यह भ्रम और भय व्याप्त है कि इन नक्षत्रों में शुभ कर्म वर्जित होते हैं अथवा इन नक्षत्रों में प्रारम्भ किए गए कार्य पूर्ण नहीं होते और होते भी हैं तो पूरे पांच बार प्रयास करने बाद। यह मान्यता भी चली आ रही है कि पंचकों में कहीं से कोई सगे-सम्बन्धी की मृत्यु की सूचना मिलती है तो ऐसे में पांच दुःखद समाचार और भी सुनने को मिलते हैं। लोगों में भ्रम तो यहाँ तक व्याप्त है कि इन दिनों में सनातन धर्म के कोई भी  शुभ कार्र्य अशुभता अवश्य देते हैं। सबसे पहले यह मय, भ्रम और अंधविश्वास तो मन से एक दम ही निकाल दें कि तथाकथित यह पांच नक्षत्र सदैव अहितकारी ही सिद्ध होते हैं। अनेक जातक ग्रथों और विशेषरुप से मुहूर्त चिन्तामणि और राज भार्तण्ड में पंचको के शुभाशुभ विचार का विवरण मिलता है। यदि गहनता से पंचकों के विषय में अध्ययन किया जाए तो हम पाते हैं कि इनका निषेध केवल पांच कर्मों में ही किया जाता है और उनमें भी स्पष्ट रुप से आवश्यक कार्यों के लिए विकल्प लिखे गए हैं - पंचकों में जिन पांच कार्यों को न करने का वर्णन है उनके विषय में उनके दुष्परिणाम भी दिए गए हैं। इनको करना यदि आवश्कता बन जाए तो कुछ  सरल से उपयों द्वारा उनको सम्पन्न भी किया जा सकता है। पहला,  लकड़ी का सामान क्रय न करना और लकड़ी एकत्रित न करना। विशेष रुप से नक्षत्र में इस कर्म से बचें क्योंकि इससे अग्नि भय का संकट हो सकता है। यदि यह कर्म करना आवश्यक हो तो लकड़ी के कुछ भाग से हवन कर लें। मेरी मान्यता है कि इस ग्रह के स्वामी मंगल हैं और उसके इष्ट देव हनुमान जी हैं। कार्य से पूर्व धनिष्ढा नक्षत्र में उनका स्मरण अवश्य कर लें, अज्ञात भय से अवश्य ही रक्षा होगी। दूसरा, पंचकों में विशेषरुप से दक्षिण दिशा की यात्रा न करना। दक्षिण दिशा के अधिष्ठाता ‘यम’ हैं, इसलिए भी यात्रा को निषेध माना गया है। अति आवश्यक रुप से की जाने वाली यात्राओं के लिए पूर्व में किसी शुभ घड़ी में ‘चाला’ कर सकते हैं। इसके लिए यात्रा में प्रयुक्त कुछ पैसे, हल्दी तथा चावल अपने इष्ट देव के सम्मुख रख लें और यात्रा को मंगलमय बनाने की प्रार्थना करें। यात्रा वाले दिन रखे यह पैसे भी साथ  ले लें। हल्दी और चावल किसी वृक्ष की जड़ में  छोड दें अथवा जल प्रवाहित कर दें। तीसरा, भवन में छत न डलवाना। मान्यता है कि पंचकों में भवन में डाली गयी छत उस घर में कलह का कारण बनती है, वहाँ से सुख और शांति का पलायन हो जाता है। मान्यता तो यहाँ तक है कि इन नक्षत्रों में डाली गयी छत कमजोर होती है 

और-भवन स्वामियों में अलगाव तक करवा देती है। इन नक्षत्रों में यहि छत डलवा रहे हों तो उससे पूर्व इष्ट देव को मिष्ठानादि से प्रारम्भ करें और प्रसाद स्वरूप वह काम करने वाले लोगों में बांटकर उनकी प्रसन्नता बटोरें। चौथा, पंचकों में चारपाई नहीं बनवाई जाती इसके पीछे का भाव भी वही लकड़ी के क्रय करने वाला ही है। पंचको में लकड़ी को विशेष महत्व दिया गया है। पांचवाँ, सबसे महत्वपूर्ण है कि पंचको  में शव दाह नहीं करते।  इसके पीछे भी कारण लकडियों का ही है क्योंकि दाह के लिए लकड़ियों की आवश्कता होती है। शव दाह  के समय   शास्त्रों में कुछ कर्म दिए गए  हैं। यदि कुछ नहीं करना है तो  आटे अथवा कुशा के पांच पुतले बनाकर शव के साथ संस्कार करवा लेना चहिए । मुहूर्त चिंतामणि में  स्पष्ट लिखा है कि  अति आावश्यक कार्यों के लिए पंचको में भी घनिष्ठा नक्षत्र का अंत, शतमिषा नक्षत्र का मध्य, भाद्रपद का प्रारम्भ और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के अन्त की पांच घड़िया कार्य के लिए चुनी जा सकती हैं। पंचको में नक्षत्रों के अनुरुप अनेक कार्य शुभ माने गए हैं। इसीलिए यह भ्रम पालना सर्वथा अज्ञानता है |  धनिष्ठा और शतमिषा नामक नक्षत्र यात्रा, वस्त्र, आभूषण आदि के क्रय-विक्रय के लिए बहुत शुभ हैं। पूर्वाभाद्र नक्षत्र में कोर्ट-कचहरी  की ही नहीं, महत्वपूर्ण कार्यों के निर्णय आदि में भी शुभता प्रदान करते हैं। भूमि पूजन के लिए उत्तराभाद्रपद नक्षत्र शुभ सिद्व होता है। इस नक्षत्र में पूर्वनियोजित अधूरी और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं का कोर्ट-कचहरी किया जा सकता है। विद्या, संगीत, सौभ्य कर्म और गुह्य विधाओं का श्री गणेश रेवती नक्षत्र में करना अति उत्तम रहता है।



शबरी के राम 



शबरी को आश्रम सौंपकर महर्षि मतंग जब देवलोक जाने लगे, तब शबरी भी साथ जाने की जिद करने लगी। शबरी की उम्र दस वर्ष थी। वो महर्षि मतंग का हाथ पकड़ रोने लगी। महर्षि शबरी को रोते देख व्याकुल हो उठे। शबरी को समझाया पुत्री इस आश्रम में भगवान आएंगे, तुम यहीं प्रतीक्षा करो।

अबोध शबरी इतना अवश्य जानती थी कि गुरु का वाक्य सत्य होकर रहेगा, उसने फिर पूछा- कब आएंगे..? महर्षि मतंग त्रिकालदर्शी थे। वे भूत भविष्य सब जानते थे, वे ब्रह्मर्षि थे। महर्षि शबरी के आगे घुटनों के बल बैठ गए और शबरी को नमन किया। आसपास उपस्थित सभी ऋषिगण असमंजस में डूब गए। ये उलट कैसे हुआ। गुरु यहां शिष्य को नमन करे, ये कैसे हुआ???

महर्षि के तेज के आगे कोई बोल न सका। महर्षि मतंग बोले- पुत्री अभी उनका जन्म नहीं हुआ। अभी दशरथ जी का लग्न भी नहीं हुआ। उनका कौशल्या से विवाह होगा।  फिर भगवान की लम्बी प्रतीक्षा होगी। फिर दशरथ जी का विवाह सुमित्रा से होगा।  फिर प्रतीक्षा.,फिर उनका विवाह कैकई से होगा। फिर प्रतीक्षा…..फिर वो जन्म लेंगे, फिर उनका विवाह माता जानकी से होगा।  फिर उन्हें 14 वर्ष वनवास होगा और फिर वनवास के आखिरी वर्ष माता जानकी का हरण होगा। *तब उनकी खोज में वे यहां आएंगे। तुम उन्हें कहना आप सुग्रीव से मित्रता कीजिये। उसे आतताई बाली के संताप से मुक्त कीजिये, आपका अभीष्ट सिद्ध होगा। और आप रावण पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे।

शबरी एक क्षण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। अबोध शबरी इतनी लंबी प्रतीक्षा के समय को माप भी नहीं पाई। वह फिर अधीर होकर  पूछने लगी- इतनी लम्बी प्रतीक्षा कैसे पूरी होगी गुरुदेव???

महर्षि मतंग बोले- वे ईश्वर है, अवश्य ही आएंगे। यह भावी निश्चित है। लेकिन यदि उनकी इच्छा हुई तो काल दर्शन के इस विज्ञान को परे रखकर वे कभी भी आ सकते है। लेकिन आएंगे  अवश्य...!

जन्म मरण से परे उन्हें जब जरूरत हुई तो प्रह्लाद के लिए खम्बे से भी निकल आये थे। *इसलिए प्रतीक्षा करना। वे कभी भी आ सकते है। तीनों काल तुम्हारे गुरु के रूप में मुझे याद रखेंगे। शायद यही मेरे तप का फल है। 

शबरी गुरु के आदेश को मान वहीं आश्रम में रुक गई। उसे हर दिन प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा रहती थी।  वह जानती थी समय का चक्र उनकी उंगली पर नाचता है, वे कभी भी आ सकतें है। हर रोज रास्ते में फूल बिछाती है और हर क्षण प्रतीक्षा करती। कभी भी आ सकतें हैं। हर तरफ फूल बिछाकर हर क्षण प्रतीक्षा। शबरी बूढ़ी हो गई। लेकिन प्रतीक्षा  उसी अबोध चित्त से करती रही। और एक दिन उसके बिछाए फूलों पर प्रभु श्रीराम के चरण पड़े। शबरी का कंठ अवरुद्ध हो गया। आंखों से अश्रुओं की धारा फूट पड़ी। गुरु का कथन सत्य हुआ। भगवान उसके घर आ गए। शबरी की प्रतीक्षा का फल ये रहा कि जिन राम को कभी तीनों माताओं ने जूठा नहीं खिलाया, उन्हीं राम ने शबरी का जूठा खाया। ऐसे पतित पावन मर्यादा, पुरुषोत्तम, दीन हितकारी श्री राम जी की जय हो। जय हो। जय हो। एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद वृद्धा भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे- कहो राम ! शबरी की कुटिया को ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ..? राम मुस्कुराए- *"यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य..? जानते हो राम  तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्मे भी नहीं थे, यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो ? कैसे दिखते हो ? क्यों आओगे मेरे पास ? बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा, जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा। राम ने कहा- तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था कि राम को शबरी के आश्रम में जाना है। एक बात बताऊँ प्रभु ! भक्ति में दो प्रकार की शरणागति होती है। पहली ‘वानरी भाव’ और दूसरी ‘मार्जारी भाव’।

बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है...! (वानरी भाव) पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया। मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी, और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है। मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना...। (मार्जारी भाव) राम मुस्कुराकर रह गए!!

भीलनी ने पुनः कहा- *"सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... “कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं!" तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी।  यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते..?

राम गम्भीर हुए और कहा- भ्रम में न पड़ो मां! “राम क्या रावण का वध करने आया है..? रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से बाण चलाकर भी कर सकता है। राम हजारों कोस चलकर इस गहन वन में आया है, तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि सहस्त्रों वर्षों के बाद भी, जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे, कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिलकर गढ़ा था। जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़कर कहे कि नहीं! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ, एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है। राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि  जब युगों का इतिहास लिखा जाए, तो उसमें अंकित हो कि शासन/प्रशासन और सत्ता जब पैदल चलकर वन में रहने वाले समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, तभी वह रामराज्य है। (अंत्योदय) राम वन में इसलिए आया है,  ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया है माँ!

माता शबरी एकटक राम को निहारती रहीं। राम ने फिर कहा-राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता!  राम की यात्रा प्रारंभ हुई है, भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए। राम राजमहल से निकला है, ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि एक माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है। राम निकला है, ताकि भारत विश्व को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है। राम आया है, ताकि  भारत विश्व को बता सके कि अन्याय और आतंक का अंत करना ही धर्म है। राम आया है, ताकि  भारत विश्व को सदैव के लिए सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाए और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाए। और  राम आया है, ताकि  युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी शबरी के आशीर्वाद से जीते जाते है। शबरी की आँखों में जल भर आया था।

उसने बात बदलकर कहा - बेर खाओगे राम..? राम मुस्कुराए, बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां!

शबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर लेकर आई और राम के समक्ष रख दिये। राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा-बेर मीठे हैं न प्रभु..? यहाँ आकर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है। सबरी मुस्कुराईं, बोली -  सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम |

 

 पण्डित की प्रेम कहानी 

.सत्रहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध था,दूर दक्षिण में गोदावरी तट के एक छोटे राज्य की राज्यसभा में एक विद्वान ब्राह्मण सम्मान पाता था, नाम था जगन्नाथ शास्त्री। साहित्य के प्रकांड विद्वान, दर्शन के अद्भुत ज्ञाता। इस छोटे से राज्य के महाराज चन्द्रदेव के लिए जगन्नाथ शास्त्री सबसे बड़े गर्व थे।कारण यह, कि जगन्नाथ शास्त्री कभी किसी से शास्त्रार्थ में पराजित नहीं होते थे। दूर दूर के विद्वान आये और पराजित हो कर जगन्नाथ शास्त्री की विद्वत्ता का ध्वज लिए चले गए।पण्डित जगन्नाथ शास्त्री की चर्चा धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत में होने लगी थी। 

उस समय दिल्ली पर मुगल शासक शाहजहाँ का शासन था। शाहजहाँ मुगल था, सो भारत की प्रत्येक सुन्दर वस्तु पर अपना अधिकार समझना उसे जन्म से सिखाया गया था। पण्डित जगन्नाथ की चर्चा जब शाहजहाँ के कानों तक पहुँची तो जैसे उसके घमण्ड को चोट लगी। मुगलों के युग में एक तुच्छ ब्राह्मण अपराजेय हो, यह कैसे सम्भव है? शाह ने अपने दरबार के सबसे बड़े मौलवियों को बुलवाया और जगन्नाथ शास्त्री तैलंग को शास्त्रार्थ में पराजित करने के आदेश के साथ महाराज चन्द्रदेव के राज्य में भेजा। जगन्नाथ को पराजित कर उसकी शिखा काट कर मेरे कदमों में डालो,शाहजहाँ का यह आदेश उन चालीस मौलवियों के कानों में स्थायी रूप से बस गया था।

सप्ताह भर पश्चात मौलवियों का दल महाराज चन्द्रदेव की राजसभा में पण्डित जगन्नाथ को शास्त्रार्थ की चुनौती दे रहा था। गोदावरी तट का ब्राह्मण और अरबी मौलवियों के साथ शास्त्रार्थ,पण्डित जगन्नाथ नें मुस्कुरा कर सहमति दे दी।मौलवी दल ने अब अपनी शर्त रखी,पराजित होने पर शिखा देनी होगी । पण्डित की मुस्कराहट और बढ़ गयी, स्वीकार है, पर अब मेरी भी शर्त है। आप सब पराजित हुए तो मैं आपकी दाढ़ी उतरवा लूंगा। मुगल दरबार में जहाँ पेंड़ न खूंट वहाँ रेंड़ परधान की भांति विद्वान कहलाने वाले मौलवी विजय निश्चित समझ रहे थे, सो उन्हें इस शर्त पर कोई आपत्ति नहीं हुई।शास्त्रार्थ क्या था; खेल था। अरबों के पास इतनी आध्यात्मिक पूँजी कहाँ जो वे भारत के समक्ष खड़े भी हो सकें। पण्डित जगन्नाथ विजयी हुए,मौलवी दल अपनी दाढ़ी दे कर दिल्ली वापस चला गया।दो माह बाद महाराज चन्द्रदेव की राजसभा में दिल्ली दरबार का प्रतिनिधिमंडल याचक बन कर खड़ा था, महाराज से निवेदन है कि हम उनकी राज्य सभा के सबसे अनमोल रत्न पण्डित जगन्नाथ शास्त्री तैलंग को दिल्ली की राजसभा में सम्मानित करना चाहते हैं,यदि वे दिल्ली पर यह कृपा करते हैं तो हम सदैव आभारी रहेंगे।मुगल सल्तनत ने प्रथम बार किसी से याचना की थी। महाराज चन्द्रदेव अस्वीकार न कर सके। 

पण्डित जगन्नाथ शास्त्री दिल्ली के हुए,शाहजहाँ नें उन्हें नया नाम दिया "पण्डितराज"। दिल्ली में शाहजहाँ उनकी अद्भुत काव्यकला का दीवाना था,तो युवराज दारा शिकोह उनके दर्शन ज्ञान का भक्त। दारा शिकोह के जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव पण्डितराज का ही रहा,और यही कारण था ... कि मुगल वंश का होने के बाद भी दारा मनुष्य बन गया। मुगल दरबार में अब पण्डितराज के अलंकृत संस्कृत छंद गूंजने लगे थे। उनकी काव्यशक्ति विरोधियों के मुह से भी वाह-वाह की ध्वनि निकलवा लेती। यूँ ही एक दिन पण्डितराज के एक छंद से प्रभावित हो कर शाहजहाँ ने कहा - अहा! आज तो कुछ मांग ही लीजिये पंडितजी, आज आपको कुछ भी दे सकता हूँ। पण्डितराज ने आँख उठा कर देखा,दरबार के कोने में एक हाथ माथे पर और दूसरा हाथ कमर पर रखे खड़ी एक अद्भुत सुंदरी पण्डितराज को एकटक निहार रही थी। अद्भुत सौंदर्य, जैसे कालिदास की समस्त उपमाएं स्त्री रूप में खड़ी हो गयी हों। पण्डितराज ने एक क्षण को उस रूपसी की आँखों मे देखा, मस्तक पर त्रिपुंड लगाए शिव की तरह विशाल काया वाला पण्डितराज उसकी आँख की पुतलियों में झलक रहा था। पण्डित ने मौन के स्वरों से ही पूछा- चलोगी? लवंगी की पुतलियों ने उत्तर दिया - अविश्वास न करो पण्डित प्रेम किया है,पण्डितराज जानते थे,यह एक नर्तकी के गर्भ से जन्मी शाहजहाँ की पुत्री 'लवंगी' थी। एक क्षण को पण्डित ने कुछ सोचा,फिर ठसक के साथ मुस्कुरा कर कहा-

न याचे गजालीम् न वा वजीराजम्,न वित्तेषु चित्तम् मदीयम् कदाचित्।*

इयं सुस्तनी       मस्तकन्यस्तकुम्भा,लवंगी    कुरंगी     दृगंगी   करोतु।।*

शाहजहाँ मुस्कुरा उठा कहा - लवंगी तुम्हारी हुई पण्डितराज।

यह भारतीय इतिहास की विरल घटना है,जब किसी मुगल ने किसी हिन्दू को बेटी दी थी।लवंगी अब पण्डित राज की पत्नी थी।

युग बीत रहा था। पण्डितराज दारा शिकोह के गुरु और परम् मित्र के रूप में ख्यात थे। समय की अपनी गति है।शाहजहाँ के पराभव, औरंगजेब के उदय और दारा शिकोह की निर्मम हत्या के पश्चात पण्डितराज के लिए दिल्ली में कोई स्थान नहीं रहा। पण्डित राज दिल्ली से बनारस आ गए,साथ थी उनकी प्रेयसी लवंगी। बनारस तो बनारस है,वह अपने ही ताव के साथ जीता है। बनारस किसी को इतनी सहजता से स्वीकार नहीं कर लेता।और यही कारण है कि बनारस आज भी बनारस है, नहीं तो अरब की तलवार जहाँ भी पहुँची वहाँ की सभ्यता-संस्कृति को खा गई। यूनान, मिश्र, फारस, इन्हें सौ वर्ष भी नहीं लगे समाप्त होने में, बनारस हजार वर्षों तक प्रहार सहने के बाद भी ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा गा रहा है।

बनारस ने एक स्वर से पण्डितराज को अस्वीकार कर दिया। कहा- लवंगी आपके विद्वता को खा चुकी, आप सम्मान के योग्य नहीं। तब बनारस के विद्वानों में पण्डित अप्पय दीक्षित और पण्डित भट्टोजि दीक्षित का नाम सबसे प्रमुख था,पण्डितराज का विद्वत समाज से बहिष्कार इन्होंने ही कराया। पर पण्डितराज भी पण्डितराज थे,और लवंगी उनकी प्रेयसी। जब कोई कवि प्रेम करता है तो कमाल करता है। पण्डितराज ने कहा - लवंगी के साथ रह कर ही बनारस की मेधा को अपनी सामर्थ्य दिखाऊंगा। पण्डितराज ने अपनी विद्वता दिखाई भी,पंडित भट्टोजि दीक्षित द्वारा रचित काव्य "प्रौढ़ मनोरमा" का खंडन करते हुए उन्होंने " प्रौढ़ मनोरमा कुचमर्दनम" नामक ग्रन्थ लिखा। बनारस में धूम मच गई,पर पण्डितराज को बनारस ने स्वीकार नहीं किया। पण्डितराज नें पुनः लेखनी चलाई,पण्डित अप्पय दीक्षित द्वारा रचित "चित्रमीमांसा" का खंडन करते हुए " चित्रमीमांसाखंडन" नामक ग्रन्थ रच डाला। बनारस अब भी नहीं पिघला,बनारस के पंडितों ने अब भी स्वीकार नहीं किया पण्डितराज को।पण्डितराज दुखी थे, बनारस का तिरस्कार उन्हें तोड़ रहा था।

असाढ़ की सन्ध्या थी।गंगा तट पर बैठे उदास पण्डितराज ने अनायास ही लवंगी से कहा गोदावरी चलोगी लवंगी ?? वह मेरी मिट्टी है, वह हमारा तिरस्कार नहीं करेगी।

लवंगी ने कुछ सोच कर कहा- गोदावरी ही क्यों, बनारस क्यों नहीं? स्वीकार तो बनारस से ही करवाइए पंडीजी। पण्डितराज ने थके स्वर में कहा - अब किससे कहूँ, सब कर के तो हार गया लवंगी मुस्कुरा उठी,जिससे कहना चाहिए उससे तो कहा ही नहीं।  गंगा से कहो, वह किसी का तिरस्कार नहीं करती। गंगा ने स्वीकार किया तो समझो शिव ने स्वीकार किया। पण्डितराज की आँखे चमक उठीं। उन्होंने एकबार पुनः झाँका लवंगी की आँखों में, उसमें अब भी वही बीस वर्ष पुराना उत्तर था-प्रेम किया है पण्डित संग कैसे छोड़ दूंगी?

पण्डितराज उसी क्षण चले, और काशी के विद्वत समाज को चुनौती दी - आओ कल गंगा के तट पर, तल में बह रही गंगा को सबसे ऊँचे स्थान पर बुला कर न दिखाया तो पण्डित जगन्नाथ शास्त्री तैलंग अपनी शिखा काट कर उसी गंगा में प्रवाहित कर देगा पल भर को हिल गया बनारस,पण्डितराज पर अविश्वास करना किसी के लिए सम्भव नहीं था। जिन्होंने पण्डितराज का तिरस्कार किया था, वे भी उनकी सामर्थ्य जानते थे। अगले दिन बनारस का समस्त विद्वत समाज दशाश्वमेघ घाट पर एकत्र था।पण्डितराज घाट की सबसे ऊपर की सीढ़ी पर बैठ गए, और गंगलहरी का पाठ प्रारम्भ किया। लवंगी उनके निकट बैठी थी।गंगा बावन सीढ़ी नीचे बह रही थी।पण्डितराज ज्यों ज्यों श्लोक पढ़ते, गंगा एक एक सीढ़ी ऊपर आती।बनारस की विद्वता आँख फाड़े निहार रही थी।गंगलहरी के इक्यावन श्लोक पूरे हुए, गंगा इक्यावन सीढ़ी चढ़ कर पण्डितराज के निकट आ गयी थी। पण्डितराज ने पुनः देखा लवंगी की आँखों में, अबकी लवंगी बोल पड़ी क्यों अविश्वास करते हो पण्डित? प्रेम किया है तुमसे पण्डितराज ने मुस्कुरा कर बावनवाँ श्लोक पढ़ा।गंगा ऊपरी सीढ़ी पर चढ़ी और पण्डितराज-लवंगी को गोद में लिए उतर गई।बनारस स्तब्ध खड़ा था, पर गंगा ने पण्डितराज को स्वीकार कर लिया था।



मासिक पंचांग- जुलाई  -2022


दिनांक 

भारतीय व्रत उत्सव जुलाई - 2022

1

श्री जगन्नाथ यात्रा पूरी

2

विनायक चतुर्थी व्रत

5

कुमार षष्टी 

श्री दुर्गा अष्टमी

भाद्दलिया नवमी ,गुप्त नवरात्र प्रा,

10 

देव शयनी एकादशी व्रत 

11 

सोम प्रदोष व्रत 

12 

जया पार्वती व्रत 

13 

सत्य व्रत ,व्यास पूर्णिमा ,गुरु पूर्णिमा 

14 

हिंडोले प्रा ,ब्रज मंडल 

16 

श्री गणेश  चतुर्थी व्रत,संकांति पुन्य  

18 

नाग पंचमी 

20 

कालाष्टमी 

24 

कामिका एकादशी व्रत 

26 

मास शिव रात्रि 

28 

हरियाली अमावस्या 

30 

सिंघारा 

31 

तीज ,मंगलागोरी पूजन 



पंचक विचार जुलाई - 2022  

पंचक विचार -(धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से रेवती नक्षत्र तक) पंचको में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना मकान दुकान आदि की छत डालना चारपाई पलंग आदि बुनना,दाह संस्कार,बांस की चटाई दीवार प्रारंभ करना आदि स्तंभ रोपण तांबा पीतल तृण काष्ट आदि का संचय करना आदि कार्यों का निषेध माना जाता है समुचित उपाय एवं पंचक शांति करवा कर ही उक्त कार्यों का संपादन करना कल्याणकारी होगा ध्यान रहेगा  पंचर नक्षत्रों का विचार मात्र उपरोक्त विशेष कृतियों के लिए ही किया जाता है विवाह मंडल आरंभ गृह प्रवेश प्रवेश उपनयन आदि मुद्दों से तो पंचक नक्षत्रका प्रयोग शुभ माना जाता है पंचक विचार- दिनांक 16 को 04 - 16 से दिनांक 20 से 12 - 50 बजे तक पंचक हैं |

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

भद्रा विचार जुलाई - 2022 

भद्रा काल का शुभ अशुभ विचार - भद्रा काल में विवाह मुंडन, गृह प्रवेश, रक्षाबंधन आदि मांगलिक कृत्य का निषेध माना जाता है परंतु भद्रा काल में शत्रु का उच्चाटन करना,स्त्री प्रसंग में,यज्ञ करना, स्नान करना, अस्त्र शस्त्र का प्रयोग, ऑपरेशन कराना, मुकदमा करना, अग्नि लगाना, किसी वस्तु को काटना,घोड़ा ऊंट संबंधी कार्य, प्रशस्त माने जाते हैं सामान्य परिस्थिति में विवाह आदि  शुभ मुहूर्त में भद्रा का त्याग करना चाहिए परंतु आवश्यक परिस्थितिवश अति आवश्यक कार्य भूलोक की भद्रा ,भद्रा मुख चोट क्र भद्रा पंच में शुभ कार्य कर सकते है |

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227


दिनांक 

शुरू 

दिनांक 

समाप्त 

03

04-12

03

17-07

06

19-48

07

07-43

10

03-36

10

14-14

13

04-01

13

14-04

16

03-03

16

13-27

19

07-50

19

19-43

22

22-29

23

11-17

26

18-47

27

08-00



 


मूल नक्षत्र विचार जुलाई  - 2022 





दिनांक

शुरू 

दिनांक

समाप्त 

02

03-55

04

08-43

11

07-49

13

02-21

19

12-11

21

14-17

29

09-46

31

14-19


 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227


सर्वार्थ सिद्धि योग जुलाई -2022

दैनिक जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण कार्यों के लिए शीघ्र ही किसी  शुभ मुहूर्त का अभाव हो,किंतु शुभ मुहर्त के लिए अधिक दिनों तक रुका ना जा सकता हो तो इन सुयोग्य वाले मुहर्तु  को सफलता से ग्रहण किया जा सकता है | इन से प्राप्त होने वाले अभीष्ट फल के विषय में संशय नहीं करना चाहिए यह योग हैं सर्वार्थ सिद्धि,अमृत सिद्धि योग एवं रवियोग | योग्यता नाम तथा गुण अनुसार सर्वांगीण सिद्ध कारक  है| अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227


दिनांक

प्रारंभ

दिनांक

समाप्त

06

11-43

07

05-34

09

05-35

09

11-24

11

05-36

11

07-49

15

05-38

15

17-31

21

05-40

21

14-17

23

19-02

24

05-42

25

05-42

26

01-05

28

05-44

29

05-44


सुर्य उदय- सुर्य अस्त जुलाई -2022 


दिनांक

उदय 

दिनांक

अस्त 

05-28 

1

19-21

5

05-29

5

19-21

10

05-32

10

19-20

15

05-34

15

19-18

20

05-37

20

19-16

25

05-40

25

19-14

30

05-42

30

19-11

 

 अधिक जानकारी के लिये संपर्क करें - शर्मा जी - 9560518227

ग्रह स्थिति जुलाई - 2022


ग्रह स्थिति - दिनांक 02 मिथुन में ,दिनांक 06  बुध पूर्व अस्त , शनि मकर में ,दिनांक 13 शुक्र मिथुन मे,दिनांक 16  सूर्य कर्क में, दिनांक 17  बुध कर्क में, दिनांक - 28 गुरु वक्री,दिनांक - 29 बुध पश्चिम उदय |

चौघड़िया मुहूर्त 

 

चौघड़िया मुहूर्त देखकर कार्य या यात्रा करना उत्तम होता है। एक तिथि के लिये दिवस और रात्रि के आठ-आठ भाग का एक चौघड़िया निश्चित है। इस प्रकार से 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात मानें तो प्रत्येक में 90 मिनट यानि 1.30 घण्टे का एक चौघड़िया होता है जो सूर्योदय से प्रारंभ होता है|

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे शर्मा जी - 9312002527,9560518227

राहू काल 

 

 राहुकाल -राहुकाल दक्षिण भारत की देन है,दक्षिण भारत में राहु काल में कृत्य करना अच्छा नहीं माना जाता, राहु काल में शुभ कृतियों में वर्जित करने की परंपरा अब हमारे उत्तरी भारत में भी अपनाने लगे हैं राहुकाल प्रतिदिन सूर्यादि वारों में भिन्न-भिन्न समय पर केवल डेढ़ डेढ़ घंटे के लिए घटित होता है |

 

 

मुहर

नोरिन शर्मा

 

हमारा 'रोका' हुए एक सप्ताह होने को आया;मेरे पापा और अनिरुद्ध के पापा के व्यापारिक संबंध थे।अनिरुद्ध के पापा ने ही बात शुरू की और हम दोनों ने पहली बार एक दूसरे को उनके कॉमन दोस्त की शादी में देखा ;मिले और दोनों ने एक घंटे की मुलाक़ात में ही घर जाकर अपनी अपनी सहमति दे दी..!

शादी और सगाई में चार महीने का समय था।अनिरुद्ध मुझे डिनर पर ले जाना चाहते थे..!शनिवार का दिन निश्चित हुआ, माँ साड़ी पहनने की सलाह दे रही थीं और मैं जीन्स और कुर्ते या फिर किसी टीशर्ट में सहज महसूस करती हूं।

मेरा तर्क सुनकर माँ ने फिर कुछ न कहा;, दरअसल उस शादी में जब हम पहली बार मिले थे , मैंने साड़ी ही पहनी हुई थी..!

अनिरुद्ध समय से आधा घंटे पहले हो घर आ चुके थे..मैं हल्का मेकअप कर रही थी…!

भाई और माँ से अनिरुद्ध ऐसे बतिया रहे थे मानो बरसों की मैत्री हो…!

मेरे ड्रॉइंग रूम में आते ही हमें विदा करते हुए माँ ने एक बार फिर कहा,"बेटा ,देर ना करना..!"

हम दोनों ने मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिला दिया।एक बहुत बड़े होटल के सामने कार जाकर रुकी…! मुझे पहली बार कैजुअल ड्रेस में देखा तो बोले,"बहुत स्मार्ट लग रही हो..अमेजिंग..!"

मैंने थैंक्स कहा और अनिरुद्ध को देखा.. 

क्या ये मेरे लिए एक सही पति होंगे..???भावों का बवंडर अक्सर आँखें धुंधला देता था...इनकी आँखों में प्रशंसा के साथ प्रेम भी झलक रहा था..!मेरी नज़रें ख़ुद ब ख़ुद झुक गईं..! अनिरुद्ध ने मेरी हथेली को अपनी पकड़ में मानो जकड़ सा लिया..!! मैं बहुत आश्वस्त और गर्वित महसूस कर रही थी…!

खाने का ऑर्डर तो मुझे ही देना था... कहाँ से शुरू करूं..सोच में पड़ी थी, अभी तक हमें एक दूसरे की पसंद/नापसंद कुछ भी नहीं पता थीं।ऐसे में अनिरुद्ध ने ऑर्डर देना शुरू किया..!

'रुको-रुको..और कोई भी आ रहा है क्या..?'

'नहीं तो...मैं समझा नहीं '

'आपने इतना सारा खाना जो ऑर्डर किया है इसलिए पूछा…!'

'सच कहूं; मुझे आपकी पसंद नहीं मालूम इसलिए …'

'ओह माई गॉड...क्या इसमें से कुछ कैंसल कर सकते हैं...हम दोनों कितना खा पाएंगे, बहुत सारा वेस्ट जाएगा ….'

'इसकी चिंता मत करो ; जो पसंद हो खा लेना…!'

'बाकी…..'

मुझे लगा ज़्यादा बोले जा रही हूं..पहली बार अकेले मिली हूं...अनिरुद्ध न जाने क्या सोचें, सोचकर चुप हो गई। यहाँ वहाँ की बातें ,ऑफिस, बिज़नेस, टूर और भी ना जाने कितनी बातें कीं…!

मेरी नज़र बचे हुए कितने ही डोंगों पर गढ़ी थीं...ऐसे होटल में "बैग पैक" के लिए बोलूं या नहीं...कश्मकश में थी कि अनिरुद्ध ने वेटर को बैग पैक के लिए कहा…!

कैसे जान ली अनिरुद्ध ने मेरे दिल की बात ; मेरी ओर देख अनिरुद्ध मुस्कुराए बिना न रह सके..!

वापिसी में कार अलग दिशा में जाती देख , मैंने माँ के शब्द याद दिलाए तो अनिरुद्ध मुस्कुरा रहे थे…! बोले कुछ नहीं..!

मैंने ही चुप्पी फिर से तोड़ी,"आप मुझे 'आप' ना कहें, तुम या फिर मेरा एक नाम भी है अविका..!"

"ओके अविका जी"

"अब जी…!"

ओके अवि...बस अब ठीक है…?

हम्मम…

मुझे इनका स्वभाव और साथ बहुत अच्छा लग रहा था...समय की तरह कार भी अपनी रफ़्तार से गुज़र रही थी...।

तभी गाड़ी के ब्रेक लगाने पर मैं चौंकी..!

"ये कहाँ आ गए हम..! कौन सी जगह है..?"

इन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और बैग पैक का ढेर सा खाना लेकर एक पुल के नीचे बड़े बड़े पाइपों में सिहरती ज़िंदगी से मुझे रूबरू कराया…!!

दो तीन बच्चे नमस्ते अंकल कहते हुए इनके हाथ से पैकेट ले अपने आशियाने में चले गए..!

इनके हाथ में एक बिरयानी का पैकेट बचा था.."अम्मा.." की आवाज़ सुनते ही एक बुज़ुर्ग महिला आई और ढेरों आशीषें देती हुई अचानक रुकी।

बेटा आज बहू को भी संग लाए हो…?

जी अम्मा आपसे आशीर्वाद लेने..!

आशीषों की झड़ी लग गई

इनके इस रूप को देख गदगद हो उठी…!!!

यहाँ मैं हर दूसरे तीसरे दिन आता हूं…

एक ढाबे वाले से मैंने बात कर रखी है...वो अक्सर इन सबको खाना पहुँचा देता है…मेरे बिजी होने पर…!

आज मैंने उसको मना किया था….!!!

मेरी आँखों में पानी देख ,अनिरुद्ध घबरा गए..!

और मैंने बिना किसी हिचक के इनको बाहों में भर लिया..!इनकी बाहों की तपिश में जिस प्रेम और सुरक्षा को महसूस किया उसको शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता..!

इनकी फुसफुसाहट सुनाई दी, ' लव यू अवि..!'

मैं अपनी भावनाएं नहीं रोक पाई...आई लव यू अनी... लव यू, लव यू…!

पापा की पसंद पर मेरी ज़बरदस्त मुहर लग चुकी थी…!!!

 

सकाम और निष्काम में भेद 

 

एक गरीब विधवा के पुत्र ने एक बार अपने राजा को देखा। राजा को देख कर उसने अपनी माँ से पूछा- माँ! क्या कभी मैं राजा से बात कर सकता पाऊँगा ?माँ हंसी और चुप रह गयी। 

पर लड़का तो निश्चय कर चुका था। उन्ही दिनों गाँव में एक संत आए हुए थे। तो युवक ने उनके चरणों में अपनी इच्छा रखी। संत ने कहा- अमुक स्थान पर राजा का महल बन रहा है, तुम वहाँ चले जाओ और मजदूरी करो।पर ध्यान रखना, वेतन न लेना। अर्थात बदले में कुछ मांगना मत। निष्काम रहना। वह लड़का गया। वह मेहनत दुगनी करता पर वेतन न लेता। 

एक दिन राजा निरिक्षण के लिए आया। उसने लड़के की लगन देखी। प्रबंधक से पूछा-यह लड़का कौन है, जो इतनी तन्मयता से काम पर लगा हुआ है? आज इसे अधिक मजदूरी देना।

प्रबंधक ने अवगत कराया कि महाराज! इसका अजीब हाल है, दो महीने से इसी उत्साह से काम कर रहा है। पर हैरानी यह है कि यह मजदूरी नहीं लेता। कहता है कि मेरे घर का काम है। घर के काम की क्या मजदूरी लेनी? राजा ने उसे बुला कर कहा- बेटा तू मजदूरी क्यो नही लेता? बता तू चाहता क्या है? लड़का राजा के पैरों में गिर गया और बोला- महाराज! आपके दर्शन हो गये, आपकी कृपा दृष्टि मिल गई, मुझे मेरी मजदूरी मिल गई। अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए। 

राजा उसे मंत्री बना कर अपने साथ ले गये। और कुछ समय बाद अपनी इकलौती पुत्री का विवाह भी उसके साथ कर दिया। राजा का कोई पुत्र नहीं था तो कलांतर में उसे ही राज्य सौंप दिया। ज्ञानी लोग कहते हैं कि भगवान ही राजा है। हम सभी भगवान के मजदूर हैं। भगवान का भजन करना ही मजदूरी है। संत ही मंत्री है। भक्ति ही राजपुत्री है। मोक्ष ही वह राज्य है। हम भगवान के भजन कै बदले में कुछ न मांगे तो भगवान स्वयं दर्शन देकर , पहले संत बना देते हैं और अपनी भक्ति प्रदान कर,कलांतर मे मोक्ष हो दे देते हैं। वह लड़का सकाम कर्म करता, तो मजदूरी ही पाता, निष्काम कर्म किया तो राजा बन बैठा। यही सकाम और निष्काम कर्म के फल में भेद है। 

 

"तुलसी विलम्ब न कीजिए, निश्चित भजिए राम, जगत मजूरी देत है, क्यो राखे भगवान। ।"

नश्वर होते हुए भी शाश्वत बन जाना है

हे मानव!

जीवन तो है कच्ची मिट्टी की गगरी

क्या पता कब फूंट जाए?

जीवन तो है तारों से भरा प्रभात

क्या पता कब छिप जाए?

जीवन तो है सुंदर सुमधुर सुमन

क्या पता कब सूख जाए?

कुछ लेकर नहीं आया है

और कुछ लेकर नहीं जाना है।

जीवन के रहस्य को जान सके तो जान ले

और जीवन की लीला को समझ सके तो समझ ले।

हे मानव!

लधु जीवन लेकर आया है,

इसलिए आज़ तुम्हें एक बात को ठान लेना है....

बीता हुआ पल नहीं आने वाला है...

हर एक पल बड़ा ही मूल्यवान है...

उसे यूं ही जाया नहीं करना है...

हर एक पल को जी जाना है...

और सुनहरी यादें छोड़ जाना है।

 

 

 

हे मानव!

क्षणभंगुर जीवन लेकर आया है,

इसलिए आज़ तुम्हें एक बात का प्रण लेना है-

मुझे सत्य के साथ चलना है...

असत्य का पक्ष नहीं लेना है...

ज़रूरत से ज्यादा संग्रह नहीं करना है...

कथनी और करनी में भेद नहीं रखना है...

मन, वचन और कर्म से जीव-हिंसा नहीं करना है...

राग-द्वेष से मुक्त हो जाना है...

मोह-माया से परे रहना है...

ईर्ष्या और नफ़रत को जला देना है...

लालच की बला को मात देना है...

संपत्ति को गौण स्थान देना है...

संबंधों को जान बख्श देना है...

लोगों के दिलों में जगह बना लेना है...

सुवर्ण के पतरों पर नाम मुद्रित करके जाना है...

नश्वर होते हुए भी शाश्वत बन जाना है... 

नश्वर होते हुए भी शाश्वत बन जाना है... 

नश्वर होते हुए भी शाश्वत बन जाना है…

समीर उपाध्याय 'ललित'

 

 

    

 

तनोट माता मन्दिर 

किशन लाल शर्मा 

 

 

राजस्थान प्रान्त के जैसलमेर ज़िले में पाक सीमा क्षेत्र पर एक प्राचीन तनोट माता का बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। 1974 तथा 1975 में सर्विस के दौरान बाड़मेर से जैसलमेर के सीमा क्षेत्र की रेकी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।  झुंझुनू ज़िले के रेत के टीले बचपन से देखते आ रहे थे और जब जैसलमेर में विशाल धोरे और टीले देखे तो असली राजस्थान से परिचय हुआ। फ़िल्मी जगत के सुनील दत्त और वहीदा रहमान की पिक्चर " रेशमा -शेरा या सेहरा " की शूटिंग इसी क्षेत्र में हुई थी। पिक्चर अच्छी चली थी अतः यह एरिया जानने में आया। 1971 भारत - पाक युद्ध के समय दो घटनाएं बहुत प्रसिद्ध हुईं। अतः हमने भी रेकी के समय बहु चर्चित तनोट माता मंदिर में माता जी के चरणों में शीश नवाया था।  मंदिर के बाहर 1971 के युद्ध के समय पाकिस्तान के तोपखाना  ने हजारों बम्ब हमारे क्षेत्र में दागे थे , लेकिन तनोट माता जी की कृपा से सारे बम्ब जमीन पर गिर कर फुस हो गए और एक भी बम्ब नहीं फटा।  हमारा कोई भी जान माल का नुकसान नहीं हुआ। उन बम्बों की प्रदर्शनी आज भी आप देख 

सकते हैं। लड़ाई के समय बी० एस० एफ० के जवानों ने तनोटमाता मंदिर के आस पास मोर्चे खोदे थे। इनके पास पीने के पानी की कमी आ गई। माता की कृपा से इनकी खाकी वर्दी को देखकर और पाक  सैनिक समझ पाकिस्तानी हवाई जहाजों ने पानी से भरे जेर्रीकेन पैराशूट से गिराए  और इनकी पानी की कमी पूरी हो गई । नौकरी के समय देश में अनेक दर्शनीय  स्थान  घूमने का मौका मिला।  बहुत बार अनेक जानकारों से मिलने के समय तथा आम चर्चा में तनोट माता मंदिर के चर्चे सुनने में आये।  देश के विभिन्न प्रांतों से लोग माता मंदिर जाते।  कोई न कोई माता से प्रार्थना करते और माता उनकी पुकार सुनती और उनके काम सफल होते।  जिस समय हम गए थे , उस समय हमें माता की कृपा के अधिक किस्से नहीं सुने थे।  काश हमें भी उस समय इन सब का ज्ञान होता और हम भी माता से कुछ मांग लेते। अब तो तीस चालीस वर्ष बीत गए हैं।  सर्विस से ही रिटायर हुए तीस वर्ष हो गए।  तनोट माता मंदिर जाने की इच्छा तो बहुत होती,लेकिन कोई ऐसा योग नहीं बन पा रहा था।  मन में बहुत बार माता को याद करता था और सदा येही माता से प्रार्थना करता की माँ आपके दरबार में एक बार शीश नवाने की बड़ी इच्छा है। अगर आप बुलाएं  तो पहले की भांति एक वी ० आई ० पी ० की तरह  बुलाएँ। वर्षों की मेरी माता से यहि प्रार्थना रही। अब 82 वर्ष के बूढ़े को कौन पुराने लोग याद करते हैं, अतः ये संभव होना कठिन है अतः मन मार कर बैठ जाते थे । अचानक बेटी का बच्चों के साथ कनाडे से इंडिया आने का प्रोग्राम बन गया और किस्मत से अपने ही परिवार जैसे अपने मित्र के सुपुत्र जैसलमेर में बड़े अधिकारी नियुक्त हुए।बेटी ने कनाडा से ही हवाई यात्रा के  टिकट और रेज़र्वेशन करवा लिए।  निःसंदेह माता ने मेरी वर्षों की प्रार्थना सुनली और इसी वर्ष मार्च माह में हम जैसलमेर , लोंगेवाला और तनोट माता मंदिर दर्शन के लिए गए। मैंने माँ का बहुत बहुत धन्यवाद किया।जैसा मैं चाहता था उससे भी अधिक हमारी वी०आई०पी० जैसी देखभाल - आव भगत की गई। माता मंदिर के बाद हम पाक सीमा पर बी० एस० ऍफ़० पोस्ट पर गए और बच्चों ने  सीमा क्षेत्र को देखा।  उनके लिए ये एक बहुत ही अच्छा अनुभव था। नाश्ता पानी के बाद हम जब चलने लगे तो हमारे साथ जो सम्पर्क अधिकारी थे ; उनका मोबाइल फ़ोन गुम हो गया।  वहां काफी ढूँढा और बी० एस० ऍफ़० के लोगों से भी पूछा , लेकिन फ़ोन नहीं मिला। हताश हो हम वापस माता मंदिर के लिए चल पड़े। विचार किया गया कि हो सकता है माता दर्शन के समय मोबाइल वहां छूट गया हो। रास्ते भर मैं मन ही मन माता से प्रार्थना करता रहा की माता वर्षों बाद  तेरे दर्शन के लिए आये  हैं। अभी तक हमारा सारा प्रोग्राम बहुत ही अच्छा रहा। अब इस अधिकारी का मोबाइल गुम हो गया।  ये तो हमारी शुभ दर्शन यात्रा में  एक काला  धब्बा लग गया। माँ  कुछ कर। इस गरीब का नुकसान ना हो। इनका मोबाइल किसी तरह दिलवा दे।  .हम मंदिर पहुंचे और संपर्क अधिकारी दौड़ कर मंदिर में गया और वहां लोगों से पूछताछ की क्या किसी को उनका मोबाइल मिला ? एक सिविलियन ने  कहा , हाँ , मिला था।  हमने बी ० एस ० ऍफ़ ० वालों के देदिया ।  अधिकारी ने उनसे सम्पर्क किया और फ़ोन मिल गया।  माता ने हमारी प्रार्थना सुनली।  हम सभी को अत्यंत ख़ुशी हुई। माता ने तत्काल हमें अपना चमत्कार दिखाया। जिस सिविलियन को मोबाइल मिला उसके मन में फोन को अपने इस्तेमाल के लिए घर लेजाने के विचार भी आ सकते थे। उसके मन में माता की आभा के कारण सुविचार आये और उसने फोन मंदिर के बी० एस० ऍफ़० के अधिकारियों को दे दिया। माता ने हमारी प्रार्थना सुनी और हम ख़ुशी ख़ुशी अपने डेरे में लौट आये। माता; माता है  और वह हमारी सुनती है। माता को सच्चे दिल से पुकारो ,माता आपकी कामना पूरी अवश्य करेंगी। 

 

 

स्त्रीमुक्ति व अधिकारों के लिए राजा राममोहन के प्रयास और उपलब्धियां

 

 

वेद आलोक

हमारा देश विविधताओं का देश है।  यहां अनेक प्रकार की विविधता  देखने को मिलती है। खान-पान, वेशभूषा, परंपराएं, रीति-रिवाज आदि देखकर अत्यंत आनंद की अनुभूति तब और प्रगाढ़ हो जाती है  जब हमें अनेकता में एकता की  सुगंध सर्वत्र प्रवाहमान होती दिखाई देती है। यह सब होते हुए भी देश में कुछ ऐसी प्रथाएं थीं, जिन्हें देखकर मन खिन्न हो जाता था।स्त्री जाति के प्रति अन्याय  एवं उनका शोषण, सती प्रथा, बहु विवाह आदि आदि अनेक ऐसी समस्याएं इस देश में रहीं, जिन्हें देखकर किसी का भी मन विचलित हो  जाता था। लेकिन कोई भी चीज इस धरती पर अमर नहीं है।  अति  तो किसी भी चीज की बुरी होती है। जब अतिरेक असीम और असह्य हो जाता है,  तब कोई न कोई महापुरुष इस देश में अवतरित होता है ,जो हाथ उठाकर हिम्मत के साथ कहता है- जो होता है वह होने दो यह पौरुषहीन कथन है,जो हम चाहेंगे वह होगा इन शब्दों में जीवन है।बंगाल की धरती पर एक ऐसे संवेदनशील, कर्मवीर, साहसी महापुरुष ने जन्म लिया, जिसने अपने श्रम-जल से स्त्री जाति को सम्मान ही नहीं अपितु उन्हें कुरीतियों से मुक्त करा दिया। नारी मुक्त के लिए उन्होंने अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। इस श्रेष्ठतम कार्य में जिन्होंने अपना जीवन  तिल तिल कर गलाया वह कोई और नहीं राजा राममोहन राय थे।राजा राममोहन राय एक उच्च कोटि के चिंतक और विचारक थे। उनका

स्पष्ट मत था कि जिस प्रकार वैदिक काल में स्त्रियों को सम्मान प्राप्त था उसीप्रकार स्त्रियों को आज भी सम्मान मिलना चाहिए। हमारे यहां कहा भी गया-“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता:”यह उच्च कोटि का भाव नारी जाति के प्रति  अत्यंत सराहनीय है, परंतु आज भी कभी-कभी इसके विपरीत व्यवहार दिखाई देता है। समाज में स्त्रियों का शोषण लज्जास्पद है परंतु इसे देखकर भी कुछ सज्जन शक्तियां मौन हो जाती हैं। और शोषणकर्ता इसे अपना अधिकार मानने लगते हैं। राजा राममोहन राय ने समाज में हो रहे स्त्री शोषण के विरुद्ध संपूर्ण शक्ति के साथ अपनी आवाज उठाई, इसके लिए उन्होंने निरंतर संघर्ष किया। बंगाल में सती प्रथा चरम पर थी। वह  धीरे-धीरे अन्य प्रदेशों में भी  चिता की ज्वालाओं की तरह फैल रही थी।  बचपन में राजा राममोहन राय ने अपनी भाभी को सती कराते हुए  लोगों के अत्याचार को देखा था। किस तरह उनकी भाभी की अनिच्छा होते हुए भी उन्हें सती होने के लिए विवश किया गया, किस तरह सती माता की जय जय के बीच चीखती चिल्लाती  करुणा भरी आवाज को अनसुना किया गया। सब कुछ हृदय को झकझोर ने वाला, प्रश्नचिन्ह खड़े करने वाला, नारी अत्याचार का दृश्य दिखाई दे रहा था।  चिता पर चीखती चिल्लाती धू धू कर जलती  हुई भाभी को देख कर  राममोहन राय का मन रो रहा था, उनकी आत्मा से आवाज़ निकली कि मैं इस कुप्रथा को जड़ से मिटा कर रहूंगा।किशोर मन का संकल्प बड़े होकर उन्होंने पूरा करके दिखाया। बालक श्री राम ने भी कभी संकल्प लिया था "निसिचर हीन करहुं महि भुज उठाय प्रण कीन्ह"  बाल मन की संवेदना, संकल्प को पूरा करने की साधना, शक्ति, सामर्थ्य एक दिन रंग लाती है और फिर वही हुआ। निरंतर संघर्ष करने के बाद कानूनी लड़ाई में राजा राममोहन राय सफल हुए।  1929 में उन्होंने सती प्रथा के विरुद्ध विलियम बेंटिक से आदेश पारित करवा कर सती प्रथा का अंत  कर दिया। राजा राममोहन  राय का यह प्रयास  युगों-युगों तक स्मरणीय रहेगा। निश्चय  ही सती प्रथा  नारी शक्ति के प्रति  एक घोर अन्याय था कि उन्हें पति की मृत्यु के बाद जिंदा जला दिया जाए। बंगाल में उच्च कुल के लोगों में यह मनोवृति पैदा हो रही थी कि एक से अधिक पत्नी विवाह करके विलासी जीवन जिया जाए। बहु पत्नी विवाह से स्त्री जाति के प्रति सम्मान को ठेस पहुंच रही थी।

राजा राममोहन राय ने इस मनोवृति के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ाई और स्त्रियों को सम्मान दिलाया।वैदिक काल में नारी शिक्षा की स्थिति का राजा राम मोहन राय को बहुत अच्छा ज्ञान था इसलिए वह चाहते थे कि अपाला, लोप मुद्रा, घोषा,गार्गी, मैत्रेयी, सीता, सावित्री आदि जैसी सतीत्व वाली प्रज्ञावान नारी समाज में विकसित हों। वे मानते थे कि यदि नारी शक्ति शिक्षित होगी तो देश की भावी पीढ़ी भी सुशिक्षित-सुसंस्कृत होगी। सुशिक्षित और सुसंस्कृत पीढ़ी जीवन मूल्यों की रक्षा कर सकेगी, इससे देश का भविष्य निश्चय ही उज्जवल होगा। स्त्री जाति को अपने अधिकारों का भी ज्ञान होना चाहिए। यह तभी संभव है जब वे सुशिक्षित  होंगी। इसलिए स्त्री शिक्षा के लिए राजा राममोहन राय ने बहुत अधिक प्रयास किए। राजा राममोहन राय स्त्रियों की समानता के समर्थक थे। उनका मत था की स्त्रियां हर प्रकार से  सामर्थ्यवान होती हैं। उनसे किसी भी प्रकार भेद भाव अनुचित है। आज यह प्रमाणित हो चुका है कि स्त्री जाति सामाजिक जीवन

के हर क्षेत्र में आगे रहकर काम कर रही हैं, और  काम करना चाहती हैं। राजा राममोहन राय ने हिन्दू स्त्रियों को सम्पति में समान अधिकार दियेजाने की वकालत की। स्त्रियों के इस अधिकार के लिए उन्होंने कानूनी प्रावधान की माँग की। 1822 में उन्होंने स्त्रियों के लिए एक लेख लिखा,जिसका नाम था “हिन्दू उत्तराधिकार विधि पर आधारित स्त्रियों के प्राचीनअधिकार का आधुनिक अतिक्रमण” । इस लेख में उन्होंने धर्मशास्त्रों, नारद,विष्णु, याज्ञवल्क्य, बृहस्पति आदि के उदाहरण भी दिये। राजा राममोहन राय ने समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता तथा अन्ध विश्वासों का विरोध किया। वे यह नहीं मानते थे कि समाज में कोई बात पुराने समय से चली आ रही है तो इस समय भी ठीक होगी। इस प्रकार हम देखते हैं कि राजा राममोहन राय ने नारी मुक्ति के लिए अनेक सार्थक प्रयास किए जिन्हें इतिहास में  सदैव याद किया जाएगा।  उनके द्वारा बहु विवाह, विधवा विवाह, स्त्री जति के प्रति भेदभाव, सती प्रथा, स्त्री

शिक्षा की दिशा किए गए कार्य नारी मुक्ति के लिए वरदान सिद्ध हुए हैं।

 

 

 

भारत में भारतीय शिक्षा को पुनर्स्थापित करने वाले : विवेकानंद 

रवि कुमार

 

आज शिक्षा की चर्चा सर्वत्र है । देश भर में जिस प्रकार की शिक्षा पद्धति चल रही है उसका गुरुत्व केंद्र भारत की बजाय यूरोप है । जोकि 19वीं सदी में अंग्रेजों के समय यहाँ लागू की गई और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी देश में लागू रही । अंग्रेजों के समय से अब तक भारत में भारतीय शिक्षा को पुनर्स्थापित करने के अनेक प्रयास भारत में हुए । उन प्रयासों की कड़ी में भारतीय शिक्षा का बीड़ा उठाने वाले दार्शनिकों में स्वामी विवेकानंद का नाम प्रमुख है । उन्होंने भारत में पाश्चत्य शिक्षा प्रणाली का विरोध किया और भारत संस्कृति के अनुरूप शिक्षा अपनाने का समर्थन किया । उन्होंने कहा “Education Should be Routed to culture & target to progress.” उन्होंने पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली की आलोचना करते हुए उसकी तुलना ऐसे व्यक्ति से की जिसे अपने गधे को घोड़ा बनाने के लिए खूब पिटने की सम्मति दी गई थी और व्यक्ति ने अपने गधे को घोड़ा बनाने की इच्छा से इतना पीटा की वह बेचारा मर ही गया।

स्वामी विवेकानंद जी कहते है, “इस तरह लड़के को ठोक–पीटकर शिक्षित बनाने की जो प्रणाली है, उसका अंत कर देना चाहिए । माता-पिता के अनुचित दबाव के कारण हमारे बालकों के विकास का स्वतंत्र अवसर प्राप्त नहीं होता । प्रत्येक में ऐसी असंख्य प्रवृतियाँ रहा करती है जिनके विकास के लिए समुचित क्षेत्र की आवश्यकता होती है । सुधार के लिए जबरदस्ती उद्योग करने का परिणाम सदैव उल्टा ही होता है यदि किसी को सिंह न बनने देंगे तो वह स्यार ही बनेगा । ”

स्वामी विवेकानंद जी का मानना है कि शिक्षा की व्याख्या शक्ति के विकास के रूप में की जा सकती है । बालक-बालिकाओं के मस्तिष्क में जानकारी को ठूसने के प्रयास को शिक्षा नहीं कहना चाहिए ।

शिक्षा के बारे में स्वामी विवेकानंद जी ने कहा, “Education is Manifestation of perfection already in the man.” शिक्षा मनुष्य में अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है  ।  ज्ञान मनुष्य में निहित सिद्धांत है बाहर से कोई ज्ञान नहीं आता ।  समस्त लौकिक व आध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य के मन में है । वह आवरण द्वारा ढका रहता है ।  जब यह आवरण धीरे धीरे हटता है तो व्यक्ति कुछ न कुछ सिखता जाता है ।  जैसे-जैसे प्रक्रिया बढ़ती है वैसे-वैसे ज्ञान वृद्धि बढ़ती है ।

स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु निम्न चार प्रकार के ध्येय के रूप में की जा सकती है :-

व्यक्ति की आन्तरिक शक्ति को उजागर करना – व्यक्ति की आंतरिक शक्ति को बाह्य जगत में प्रकट करना है जिससे वह स्वयं को भली भांति समझे । स्वयं को समझने का पूर्ण अर्थ है मनुष्य की आत्मा का उस परमात्मा से सम्बन्ध स्थापित करना, जिसका वह अंश है । इसे आध्यात्मिकता की जाग्रति भी कहा जा सकता है ।

मनुष्य का निर्माण करना – व्यक्ति विशेष में मनुष्यत्व का निर्माण । मनुष्य द्वारा उन लौकिक व अलौकिक गुणों को धारण करना है जिससे वह दिव्य पुरुष बन जाए और आत्मविश्वास, आत्मश्रद्धा, आत्मत्याग, आत्म नियंत्रण , आत्मनिर्भरता एवं मानव प्रेम जैसे गुणों को आत्मसात कर लें । स्वामी विवेकानंद ने स्पष्ट रूप से कहा है कि “सभी प्रकार की शिक्षा और अभ्यास का उद्देश्य मनुष्य निर्माण ही हो ।  सारे प्रशिक्षण का अंतिम ध्येय मनुष्य का विकास करना ही है ।”

मनुष्य का शारीरिक विकास करना – स्वामी विवेकानंद जी ने व्यक्ति के बलिष्ट शरीर की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा है, “सबसे पहले हमारे युवकों को सबल बनाना चाहिए । यदि तुम्हारा शरीर स्वस्थ है, अपने पैरों पर दृढ़तापूर्वक खड़े हो सकते हो, यदि तुम अपने भीतर मानव शक्ति का अनुभव कर सकते हो तो तुम उपनिषदों और आत्मा की महत्ता को अधिक अच्छी प्रकार समझा सकते है । ”

Swami Vivekanandaa also said, “You will be nearer to heaven tthrough football than through the study of The Gita.” अर्थात् गीता अध्ययन से पूर्व फुटबॉल खेल कर सबल होकर गीता को अधिक अच्छी प्रकार से समझ सकते है ।

जीवन संघर्ष के लिए तैयारी – बालकों को जीवन संघर्ष के लिए तैयार करना । जीवन संघर्ष की तैयारी के लिए तकनीकी एवं विज्ञान की शिक्षा आवश्यक है । स्वामी विवेकानंद जी का मानना है कोई व्यक्ति प्रकृति विरुद्ध लड़ता है तो उसमें ही चैतन्य का विकास होता है ।  स्वामी विवेकानंद जी ने गुरु और शिष्य के विषय में कहा है, “ गुरु को शिष्य की प्रवृति में अपनी सारी शक्ति लगा देनी चाहिए । सच्ची सहानुभूति के बिना हम अच्छी शिक्षा कभी नहीं दे सकते ।”  शिष्य के लिए आवश्यकता है शुद्धता ज्ञान की सच्ची पिपासा और लगन के साथ परिश्रम की । विचार वाणी और कार्यों की पवित्रतता नितांत आवश्यक है । ज्ञान पिपासा के सम्बन्ध में नियम यह है कि हम जो कुछ चाहते है, वही पाते है जिस वस्तु की अंत:करण से चाह नहीं करते वह हमें प्राप्त नहीं होती ।”

शिक्षा सभी के लिए सुलभ हो इस विषय पर स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है, “If poor boy cannot come to education, education must go to him.”

उपरोक्त बिन्दुओं से ध्यान में आता है कि किस प्रकार स्वामी विवेकानन्द भारतीय शिक्षा के पक्षधर थे ।  भारतीय शिक्षा के लिए उन्होंने अनेक लोगों को प्रोत्साहित किया ।  रामकिशन मिशन की स्थापना करते हुए ‘रामकिशन मिशन विद्यालय’ के माध्यम से भारतीय शिक्षा को व्यक्त रूप देने का प्रयास किया ।  आज भी यह विद्यालय स्थापित है और भारतीय शिक्षा का प्रतिमान है ।  उनके द्वारा बताई गई भारतीय शिक्षा की संकल्पना की आज भी महत्ती आवश्यकता है ।  देशभर में अनेक संस्थाए, संगठन यथा अरविन्द आश्रम, विद्या भारती, आर्य समाज, चैतन्य मिशन, स्वामी नारायण सम्प्रदाय आदि शिक्षा में भारतीय शिक्षा की संकल्पना को व्यक्त एवं स्थापित करने में लगे है 

 

 

विभिन्न नक्षत्रों में पैदा हुए बालको का स्वभाव 

 

ज्योतिष विज्ञान में कुल 27 नक्षत्र होते  हैं पर विशेष परिस्थिति में 28 होते है | नक्षत्रों का हमारे जीवन पर बहुत ही प्रभाव पड़ता है | जाने नक्षत्रों का अपने जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है | अश्विनी नक्षत्र - इस नक्षत्र  में पैदा हुआ बालक धनी,हंसमुख,सुंदर,बुद्धिमान,नम्र,

स्पस्ट वक्ता  अच्छी पोशाक पहनने का व अच्छे आभूषण पहनने का शौक रखने वाला, गठीला शरीर, जनप्रिय अगर नेता बने तो बहुत कामयाब होते हैं हर काम होशियारी से करते हैं,परोपकारी होते हैं | वाहन,मकान व हर प्रकार का सुख मिलता है | कमजोर चरित्र वाले होते है | स्वार्थ पूर्ति के लिय विश्वास घात  भी कर सकते हैं | क्रूर ग्रह की दशा में सूर्य मंगल व् गुरु के अंतर में चोरी का भय रहता है |

भरणी नक्षत्र - पैदा हुए बालक सच्चे होते हैं, अच्छे स्वास्थ्य अच्छा, बीमार कम पड़ते हैं,सुमार्ग पर चलते हैं,स्त्री सुख रहता है, अस्थिर मनोव्रती,विचारो में भटकाव, विदेश जाने बहुत इच्छा रहती है दीर्घायु होते हैं | 25 वर्ष के बाद का भाग्य उदय होता है और अगर ग्रह क्रूर हो तो चोट लगने का भय रहता है | 

कृतिका नक्षत्र - जिस काम में हाथ डाले उसको पूरा करते हैं, किसी विशेष विषय में कार्य करने वाले,बुद्धिमान,लोभी,आशावादी,

सुंदर व्यक्तित्व वाले,क्रूर ग्रह की दिशा में मंगल बुध की अंतर्दशा में कष्ट होता है | 

रोहिणी नक्षत्र - सुंदर आकर्षक व्यक्तित्व, सत्यवादी,जनप्रिय कलाकार,सांसारिक कार्य बुद्धि से संपन करे,क्रूर ग्रह की दशा में राहू शनि व् केतु की अंतर दशा में  कष्ट होता है

अधिक जानकारी के लिय फोन करे शर्मा जी 9560518227

जुलाई के महत्वपूर्ण दिन

 

प्रत्येक वर्ष भारत में 1 जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सा दिवस मनाया जाता है इसे मनाने का उद्देश्य है कि चिकित्सा में कार्यरत डॉक्टरों को उचित सम्मान दिया जा सके और चिकित्सा के महत्व को समझाया जा सके | 

भारत में प्रत्येक वर्ष 1 जुलाई को राष्ट्रीय डाक कर्मचारी दिवस मनाया जाता है इस दिन को मनाने का उद्देश्य है कि डाक सेवा में कार्यरत लोगों को सम्मान प्रदान किया जा सके

1 जुलाई:- कनाडा राज्य का निर्माण 1 जुलाई 1867 में हुआ था इसलिए प्रत्येक वर्ष कनाडा इस दिन को कनाडा दिवस के रूप में आयोजित करता है

1 जुलाई:- इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया के लिए संसद ने एक जुलाई 1949 को एक कानून पारित किया था इसलिए हर साल इस दिन को चार्टर्ड अकाउंटेंट डे के रूप में भारत में मनाया जाता है

1 जुलाई:- प्रत्येक वर्ष अमेरिका में 1 जुलाई को राष्ट्रीय अमेरिकी डाक टिकट दिवस मनाया जाता है इसके जरिए याद किया जाता है कि 1 जुलाई को डाक टिकट का प्रारंभ हुआ था

2 जुलाई:- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक वर्ष 2 जुलाई को विश्व यू एफ ओ दिवस के रूप में मनाया जाता है इस दिन को मनाने का उद्देश्य है कि लोगों को इस बात के लिए जागरूक किया जाए कि वह ब्रह्मांड अकेला नहीं है

4 जुलाई 1776 में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका को ग्रेट ब्रिटेन से स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी इसलिए इस दिन को वहां पर यूएसए स्वतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है

6 जुलाई:- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक वर्ष इसदिन विश्व जुनोसिस दिवस के रूप में आयोजित किया जाता है इसका उद्देश्य है कि जुनोसिस जैसी बीमारी के बारे में लोगो को जागरूक किया जा सके 

9 जुलाई:- भारत में 9 जुलाई 1949 को विद्यार्थी परिषद की स्थापना हुई थी इसलिए प्रत्येक वर्ष 9 जुलाई को भारत में राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस आयोजित किया जाता है इसका उद्देश्य है कि छात्रों को अपने देश की समस्याओं को हल करने के लिए प्रेरित किया जाए

11 जुलाई:- प्रत्येक वर्ष अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसदिन  विश्व जनसंख्या दिवस आयोजित किया जाता है इसका उद्देश्य है कि जनसंख्या के मुद्दों पर ध्यान दिया जाए और जनसंख्या नियंत्रण के प्रति जागरूक किया जाए

12 जुलाई:- इस दिन हेनरी डेविड थोरा को सम्मानित करने के लिए राष्ट्रीय सादगी दिवस मनाया जाता है हेनरी डेविड एक लेखक दार्शनिक इतिहासकार विकास आलोचक सर्वेक्षण करता आदि थे

12 जुलाई को पेपर बैग डे आयोजित किया जाता है इसे आयोजित करने का उद्देश्य है कि हम पेपर बैग के महत्व को समझ सके और पेपर बैग को प्रयोग करने के लिए लोगों को जागरूक करें

17 जुलाई:- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक वर्ष इसदिन अंतर्राष्ट्रीय न्याय के लिए विश्व दिवस या अंतर्राष्ट्रीय अपराधिक न्याय दिवस आयोजित किया जाता है ताकि न्याय के प्रति लोगो को जागरूक किया जा सके

 18 जुलाई:- प्रत्येक वर्ष अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हम इसदिन अंतर्राष्ट्रीय नेल्सन मंडेला दिवस को आयोजित करते हैं इस दिन को नेल्सन मंडेला जिन्होंने दुनिया में शांति बनाये रखने के लिए मार्ग दिखाया था उनकी याद में मनाया जाता है

24 जुलाई:- इसदिन राष्ट्रीय थर्मल इंजीनियर दिवस आयोजित किया जाता है इसका उद्देश्य है कि हम इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को नवीन उमा उच्च गुणवत्ता वाले और कम लागत वाले प्रभावी थर्मल प्रबंधन और इसके पैकेजिंग प्रदान कर सकें

26 जुलाई:- भारत में कारगिल युद्ध 26 जुलाई को समाप्त हुआ था यह युद्ध पूरे 60 दिनों तक चलता रहा था इसलिए इस दिन को याद रखने के लिए हम प्रत्येक वर्ष कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाते हैं ताकि उन सैनिकों को सम्मान प्रदान कर सके जो उस युद्ध में शहीद हुए थे 

28 जुलाई:- प्रत्येक वर्ष अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 28 जुलाई को विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस मनाया जाता है इसे बनाने का उद्देश्य है कि हम प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा कर सकें और एक स्वस्थ वातावरण की नींव रखी जा सके

28 जुलाई:– विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस के साथ ही इस दिन विश्व हेपेटाइटिस दिवस अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जाता है इसका उद्देश्य है कि लोगों को हेपेटाइटिस बीमारी के बारे में जागरूक कर सके

29 जुलाई:- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक वर्ष इसदिन को अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस आयोजित किया जाता है इसका उद्देश्य है कि बाघों को संरक्षण प्रदान किया जा सके

जुलाई के चौथे रविवार:- प्रत्येक वर्ष जुलाई के चौथे रविवार को राज्य माता पिता दिवस मनाया जाता है इस दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि हम अपने माता-पिता को सम्मानित कर सके |

श्रीमद् भगवद्गीता से 

 योगस्थ: कुरु कर्माणि,संगं त्यक्त्वा धनंजय।

  सिद्धि-असिद्ध्यो समो भूत्वा,समत्वं योग उच्यते।। 

 

भावार्थ:- हे अर्जुन !आसक्ति को त्याग कर, सफलता और असफलता की स्थिति में समभाव रखकर ,केवल अपना कर्तव्य पूरा करते जाओ ।इस प्रकार स्वत:जन्य समभाव को आचरण में लाने की स्थिति को ही योग कहते हैं ।

सारांश:-अपने कर्तव्य के साथ निष्काम भाव से और पूर्ण समर्पित भाव से जुड़ना ही योग है ।ऐसा आचरण करने वाला व्यक्ति कभी भी, किसी भी स्थिति में दुखी नहीं होता, और उसे परमानन्द की अनुभूति होती है।


 


कपालभाती 


कपालभाति - इस प्राणायाम को कपाल उदय साँस, ललाट मस्तिक शोधन और कपाल भारती के नाम से भी जाना जाता है | मनुष्य के मस्तिष्क के आगे वाले हिस्से को कपाल  कहा जाता है | और भाती का अर्थ है ज्योति इस तरह कपालभाति प्राणायाम का अर्थ उस प्राणायाम  से हुआ जो मस्तिक को प्रकाशित करता है | कपालभाति प्राणायाम हठयोग से आता है | और इसे सभी प्राणायाम  में सबसे कारगर प्राणायाम माना जाता है | इस प्राणायाम में सांस  छोड़ने पर अधिक जोर दिया जाता है | कपालभाति प्राणायाम करने की विधि -

इसके लिए आप पद्मासन मुद्रा में बैठ जाएं या सुखासन में बैठ जाएं और पेट के अगले हिस्से को हल्का सा झटका देकर अंदर की तरफ करें और अपनी नाक से सांस को बाहर करें आप अपने पेट को ढीला छोड़ दें फिर हल्के झटके से सांस को बाहर निकाले इस तरह कुछ देर तक करते रहे यह शरीर को शक्ति प्रदान करता है |

कपालभाती प्राणायाम के लाभ -

 यह प्राणायाम  शरीर में गर्मी पैदा कर शरीर को बीमारियों और एलर्जी से बचाता है |रोजाना कपालभाति करने से लिवर और किडनी से जुड़ी समस्या ठीक होती है |यह दिमाग को तनावमुक्त भी करता है | यह आपके फेफड़ों की क्षमता को बढ़ाता है, और उन्हें मजबूत करता है |कपालभाती को शरीर से विषाक्त पदार्थों और अन्य अपशिष्ट पदार्थों को निकालने के लिए जाना जाता है |




गुरु 

गुरू ब्रह्मा गुरू विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा 

गुरु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः


हमारे देश में गुरु पूर्णिमा को गुरु पूजन करने का प्रचलन है | भोग की जगह हमने ज्ञान को सर्वोच्च माना है | इसीलिए भारत को ज्ञान की धरा कहते | हम गुरु को भगवान से भी बड़ा मानते है |

 गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।

बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।

 गुरु हमे अंधकारमय जीवन से प्रकाश की ओर ले जाते है। गुरु एक दिये की तरह होते है, जो शिष्यों के जीवन को रोशन कर देते है। खासकर विद्यार्थी जीवन में गुरु की अहम भूमिका होती है। गुरु विद्यार्थी को हर प्रकार के विषयो से संबंधी जानकारी देते है ओर जीवन के अलग अलग पड़ाव में उन्हें मुश्किलों से लड़ना सीखाते है।वे हमें जिंदगी में एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनने में हमारी मदद करते हैं। वो ही हमें जीवन जीने का असली सलीका सिखाते हैं और वो ही हमें अपने जीवन पथ पर ताउम्र सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। जिस तरह से शिक्षक हमें शिक्षा और ज्ञान के जरिए बेहतर इंसान बनने के लिए मेहनत करता है। महर्षि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई. पूर्व में हुआ था। उनके सम्मान में ही हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाया जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन व्यास जी ने शिष्यों एवं मुनियों को सर्वप्रथम श्री भागवतपुराण का ज्ञान दिया था।गुरु ही शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और वे ही जीवन को ऊर्जामय बनाते हैं। जीवन विकास के लिए भारतीय संस्कृति में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका मानी गई है। गुरु की सन्निधि, प्रवचन, आशीर्वाद और अनुग्रह जिसे भी भाग्य से मिल जाए उसका तो जीवन कृतार्थता से भर उठता है। क्योंकि गुरु बिना न आत्म-दर्शन होता और न परमात्म-दर्शन।गुरु आत्मज्ञानी होते हैं। -उनका स्वभाव शुद्ध होता है। -वह जितेंद्रिय होते हैं। -वह दयालु, शांतिप्रिय, क्षमावान, धैर्यशाली, प्रेम, उत्साही, साहसी और ज्ञान की मूर्ति होते हैं।

बेसन के गट्टे की सब्जी

बेसन के गट्टे की सब्जी लोग बहुत स्वाद से खाते है | यह एक स्वास्थवर्धक सब्जी है |

बेसन के गट्टे की सब्जी बनाने की सामग्री -

दो कप बेसन,दही,तेल,टमाटर,अदरक,हरी मिर्च,नमक,हल्दी,लाल मिर्च,धनिया,हरा धनिया,

गरम मसाला,तेज पत्ता,अमचुर,जीरा,हींग,अजवायन,सौंफ,प्याज,लहसन |

बेसन के गट्टे की सब्जी बनाने की विधि -

बेसन को छान कर उसमे नमक लाल मिर्च,हल्दी,अजवायन व सोंफ को मसल कर डाले हींग डाले दो चच्म्म्च दही,तेल डाल कर गुंदे जब मुलायम हो जाये तो पांच मिनट रख कर लबे गोल रोल बना कर गरम पानी में उबाल ले ,जब उपर आ जाये तो बाहर निकल ले व छोटे गट्टे काट ले |काढई में तेल गरम करे गट्टे हलके सेक ले आप चाहे तो ना भी सेके | काढई में तेल डाल कर गरम करे उसमे तेज पत्ता पिशा अदरक लहसन प्याज का पेस्ट डाले जीरा हींग डाल कर भुने लाल होने पर टमाटर पीस कर डाले ,नमक ,लाल मिर्च ,हल्दी धनिया  पाउडर डाल कर भुने दो चमच्च दही डाले मसाले को भुने आब गट्टे डाल कर  मिलाने के बाद आवश्यकता अनुसार  पानी डाले ,अच्छी तरह पकाए ,उपर से  गरम मसला अमचुर डाल कर हरा धनिया बुर्के तयार है राजस्थानी बेसन के गट्टे की सब्जी | आप इसे चावल व रोटी के साथ परोसे | स्वाद ले लाजबाब राजस्थानी  बेसन के गट्टे की सब्जी | 

नोट - प्याज व लहसन आपकी मर्जी पर है | पानी तेल व मसाले अपने स्वाद अनुसार डाले तेल की जगह देसी घी का भी इस्तेमाल कर सकते है |                                                 - मिथलेश शर्मा 

हरयाली तीज 


हरियाली तीज सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज मनाई जाती है | हरियाली तीज यह महिलाओं के लिए मौज मस्ती का दिन होता है | आज के दिन हाथों में मेहंदी लगाई जाती है | हरियाली तीज मनाने हेतु अधिकतर लड़कियां मायके में जाती हैं | जिस लड़की की शादी की पहली तीज होती है उसकी ससुराल से इस पर्व पर से साड़ी ब्लाउज झूला पटरी  बहन भाइयों के कपड़े मेहंदी सिंगार का सब सामान फल मिठाई भेजा जाता है | और मायके से सांस की कपड़े  दमाद के कपड़े फल मिठाई आदि भेजे जाते हैं | इसको सिंद्धारा कहते हैं | यह कहावत भी है कि इस दिन शंकर भगवान और पार्वती भी हरियाली तीज वाले दिन आनंद उत्सव मनाते हैं | अधिकांश जगह पर झूले डाले जाते हैं और सावन के गीत गाए जाते हैं | आजकल कुछ जगह पर मेहंदी उत्सव भी मनाया जाता है | कहीं-कहीं तो श्रृंगार उत्सव भी मनाया जाता है | महिलाएं भांति भांति से सज कर आती हैं और उनमे प्रतियोगिता होती है व उनको  पुरस्कार दिया जाता है |


कांवड़ यात्रा

कावड़ यात्रा की महिमा,भगवान शिव पदयात्रा द्वारा लाए गंगाजल से अति प्रसन्न होते हैं |कलयुग में जहां लाखों लोग जो 1 किलोमीटर भी दैनिक दिनचर्या में पैदल नहीं चलते यह सब सावन व फाल्गुन मास के महीने में भगवान शिव के आशीर्वाद से 100 किलोमीटर से लेकर 600 किलोमीटर तक का कठिन रास्ता पैदल चलकर जाते हैं और भगवान भोलेनाथ पर गंगाजल से अभिषेक करते हैं | पूरे रास्ते बम बोल बम बोल का उच्चारण करते चलते हैं | ओम नमः शिवाय का जाप करते रहते हैं | भोले बाबा अपने भक्तों की सभी मनोकामना शिव कृपा से पूरी करते हैं भक्तों की श्रद्धा और निष्ठा भाव देखने लायक होता है जब उनके पैरों में छाले होते हैं और वह ओम नमः शिवाय का जाप करते हुए अपनी मंजिल पर पहुंच जाते हैं | यात्रा तेज धूप आदि और मूसलाधार वर्षा से भी नहीं रुकती और ओम नमः शिवाय का जाप करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं जब सभी भक्तजन भोले बाबा के भवन में पहुंचकर गंगा जल से उनका अभिषेक करते हैं तो उनकी सब पीड़ा और थकान दूर हो जाती है और वह खुशी से झूम उठते हैं |

|

  देव शयनी  एकादशी व्रत 

देव शयनी एकादशी अषाढ़ शुक्ल की एकादशी को देव शयन करते हैं इसलिए इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं | यह एकादशी आषाढ़ शुक्ल की एकादशी को मनाई जाती है | इसके बाद कार्तिक एकादशी को देव जागते हैं | इसलिए इसे कहते देव उठानी एकादशी कहते  हैं | आषाढ़ की एकादशी व्रत करना चाहिए | भगवान का नया बिछौना बिछाकर भगवान को सजाना चाहिए और जागरण करके पूजा करनी चाहिए देव शयनी एकादशी की व्रत कथा सूर्यवंश में मांधाता नामक प्रसिद्ध सत्यवती राजा अयोध्यापुरी में राज्य करता था एक समय उसके राज्य में अकाल पड़ गया प्रजा दुखी होकर भूखी मरने लगी हवन आदि शुभ कर्म बंद हो गए राजा को कष्ट हुआ वह वन को निकल पड़ा और अंगिरा ऋषि के आश्रम में जा पहुंचा ऋषि सप्तऋषियों में श्रेष्ठ अंगिरा जी मैं आपकी शरण में आया हूं मेरे राज्य में अकाल पड़ गया है | प्रजा कह रही है की राजा के पापों से प्रजा को दुख मिलता है | मैंने अपने जीवन में किसी प्रकार कोई पाप नहीं किया आप दिव्य दृष्टि से देख कर कहो कि अकाल पड़ने का क्या कारण है अंगिरा ऋषि बोले सतयुग में ब्राह्मणों का वेद पढ़ना और तपस्या करना है परंतु आपके राज्य में आजकल ऐसा नही हो रहा है | राजा बोला आप कोई  सरल उपाय बताएं ऋषि बोले उपाय बताता हूं और मोक्ष देने वाली देव शयनी एकादशी है इसका व्रत  करो उसके प्रभाव से चतुर्मास तक वर्षा होती रहेगी इस एकादशी का व्रत सिद्धियों को देने वाला तथा प्रभाव को शांत करने वाला है |  राजा ने प्रजा सहित देव शयनी एकादशी ( पदमा एकादशी ) का व्रत किया और सब पापो से छूट गया इस व्रत व् कथा को  पढ़ने से अकाल मृत्यु के भय से दूर हो जाते हैं | आज के दिन तुलसी का बीज बोया जाए तो महापुण्य प्राप्त होता है तुलसी के प्रताप से यमदूत नही सताते व दूर रहते  हैं तुलसी की माला से सुशोभित हो कर अपना जीवन धन्य समझना चाहिए |




कामिका एकादशी सावन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कामिका एकादशी कहते हैं | इसे पवित्रता एकादशी के नाम से भी जाना जाता है | प्रातः स्नानादि करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराके भोग लगाना चाहिए | आगमन के पश्चात धूप दीप चंदन आदि सुगंधित पदार्थों से आरती उतारनी चाहिए | 

कामिका एकादशी व्रत की कथा एक समय की बात है कि किसी गांव में एक ठाकुर रहते थे बहुत ही क्रोधी स्वभाव के थे क्रोधवस  उनकी एक ब्राह्मण से भिड़ंत हो गई जिसका परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मण मारा गया उस ब्राह्मण के मरणोपरांत उन्होंने उसकी तेह्र्वनी करनी चाही लेकिन सभी ब्राह्मणों ने भोजन करने से इंकार कर दिया | तब उन्होंने सभी ब्राह्मणों से निवेदन किया कि आप सब बताओ की  मेरा पाप  कैसे दूर हो सकता है | इस प्रार्थना पर उन सब ने उसे एकादशी व्रत करने की सलाह दी | ठाकुर ने वैसा ही किया रात में भगवान की मूर्ति के पास जब वह सो रहा था तभी उसने एक सपना देखा सपने में भगवान ने उसे दर्शन देकर कहा कि ठाकुर तेरा सारा पाप दूर हो गया अब तुम  ब्राह्मण की तेहरवीं  कर सकते हो | तेरे पाप नष्ट हो गये है | ठाकुर ने सभी को बुला कर ब्राह्मणो के साथ मिल कर तेहरवीं की | इस तरह वो पाप  से मुक्त हो गया और अंत में मोक्ष प्राप्त करके वैकुण्ठ को  चला गया |


एतिहासिक प्रेम कहानी पढ़ने के लिए क्लिक करें-

https://www.sumansangam.com/index.php/2022/06/30/story/


हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा

   हरियाणा के हिसार ( वीर बरबरान ) मे एक पीपल का पेड़ है जिसको वीर बर्बरीक ने श्री कृष्ण भगवान के कहने पर अपने वाणों से छेदन किया था !  आज भ...