शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

जानकारी काल फरवरी - 2025

जानकारी काल वर्ष-25 अंक - 10 फरवरी - 2025 , पृष्ठ 40 www.sumansangam.com प्रधान संपादक व प्रकाशक सतीश शर्मा कार्यालय ए 214 बुध नगर इंद्रपुरी नई दिल्ली 110012 मोबाइल 9312002527 संपादक मंडल सौरभ शर्मा, कपिल शर्मा, गौरव शर्मा, डॉ अजय प्रताप सिंह, करुणा ऋषि, डॉ मधु वैध, राजेश शुक्ल प्रकाशक व मुद्रक सतीश शर्मा के लिय ग्लैक्सी प्रिंटर-106 F, कृणा नगर नई दिल्ली 110029, A- 214 बुध नगर इन्दर पूरी नई दिल्ली 110012 से प्रकाशित | सभी लेखों पर संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है पत्रिका में किसी भी लेख में आपत्ति होने पर उसके विरुद्ध कार्रवाई केवल दिल्ली कोर्ट में ही होगी R N I N0-68540/98 मूल्य 02-50 sumansangam.com jaankaarikaal.blogspot.com अनुक्रमणिका अपनों से अपनी बात - 3 हिंदवी स्वराज्य के स्वप्न द्रष्टा महानायक छत्रपति शिवाजी - 5 लेख डॉक्टर बेटी - 10 लेख वीर सावरकर - 14 लेख कुछ मुखड़ों की नाराजी से दर्पण नहीं मरा करते - 16 कविता अधिकार से कर्तव्य तक की यात्रा - 17 लेख स्वादिष्ट मसाला घर बनाएं - 18 अपनी रसोई मातृशक्ति - 20 कहानी स्त्री पुरुष संबंध - 21 कहानी किस महीने कौन सी सब्जी की खेती की जाती है - 22 कृषि अपने घर में भी - 23 कहानी फ़रवरी मास के महत्व पूर्ण दिवस - 26 जानकारी बांसी कढी - 29 कहानी फ़रवरी मास 2025 का पंचांग - 33 ज्योतिष रामकृष्ण परमहंस - 37 व्यक्तित्व कमौलिका की लड़ाई - 38 कहानी जया एकादशी कथा - 39 कथा, विजया एकादशी - 40 कथा अपनों से अपनी बात पर्यावरणनाशेन, नश्यन्ति सर्वजन्तवः । पवनः दुष्टतां याति, प्रकृतिर्विकृतायते ।। पर्यावरण के प्रदूषित होने से सभी प्राणी नष्ट हो जाते हैं । हवा दुष्टता को प्राप्त हो जाती है और यह प्रकृति विकृत हो जाती है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सम्पूर्ण भारतीय समाज में आधारभूत परिवर्तन के लिए पांच आयामों को चुना है वे हैं 'स्व', सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण और नागरिक कर्तव्य।पंच परिवर्तन का यह संकल्प भारत को वैभव सम्पन्न सशक्त राष्ट्र के रूप में विकसित करेगा। इस दृष्टि से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष में संघ ने पंच अमृत धाराओं से समाज को सिंचित करने का संकल्प लिया है। 2024-25 में यह परिवर्तन खुद में व अपने परिवार में करना हैं उसके बाद समाज मे लेकर जाना हैं | इन पंच परिवर्तन के कुछ करने योग्य कार्य नीचे दिए हैं , हम सबको इन पंच बिन्दु को अपने जीवन मे शामिल करना चाहिए | पर्यावरण - प्रदूषण को रोकने के लिए, ये उपाय अपनाए जा सकते हैं - कूड़ा-कचरा उठाकर कूड़ेदान में फेंकें. पत्तियों को सड़क पर न उड़ाएं. घास या यार्ड के कचरे को मल्च या खाद में बदलें | फ़र्टिलाइज़र को बारिश से पहले घास पर न डालें | कार या बाहरी उपकरणों को ऐसी जगह धोएं जहां से पानी सड़क पर न बह सके | जल स्त्रोतों में पशुओं को न नहलाए,पूजा के अवशेष फूल इत्यादि नदी, तालाब, झील में डाल कर गंदगी ना करें |कीटनाशियों,कवकनाशियों जैसे निम्नीकरण योग्य पदार्थों का इस्तेमाल करें | खतरनाक कीटनाशियों के इस्तेमाल पर रोक लगाएं | जल स्त्रोतों के पानी को शुद्ध करने पर ध्यान दें | बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में जल शोधन संयंत्र लगाएं | प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करें | पालतू जानवरों के मल को बैग में भरकर कूड़ेदान में डालें | अपने पूल,स्पा या फ़व्वारे के पानी को नाले में न बहाएं बल्कि सिचाई के लिए इस्तेमाल करें | कृषि भूमि पर मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए आवरण फसलों का इस्तेमाल करें | ज़्यादा से ज़्यादा सार्वजनिक परिवहन, साइकिल या पैदल चलें | अगर आप निजी वाहन चलाते हैं, तो कार पूलिंग करें | अगर आपका ऑफ़िस घर से काम करने का विकल्प देता है, तो इसका लाभ उठाएं | बाहर जाने पर पुनः प्रयोज्य वायु मास्क पहनें |घर में तुलसी, एलोवेरा और मनी प्लांट जैसे पौधे लगाएं ये पौधे घर के अंदर की हवा को शुद्ध करते हैं | कुशल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल करें | हमें अपने पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए |आलाव ना जलाये,प्लास्टिक की थैली मे खाना ना रखें |घर के बचे खाने को प्लास्टिक की थैली मे भर कर बाहर ना फेंके गाय प्लास्टिक की थैली समेत खाती है इससे उसे नुकसान होता है |सामाजिक समरसता - सामाजिक समरसता का अर्थ है सभी को अपने समान समझना। जातिगत भेदभाव एवं अस्पृश्यता को दूर करना लोगों में परस्पर प्रेम एवं सौहार्द बढ़ाना समाज के सभी वर्गों एवं वर्णों के मध्य एकता स्थापित करना ही सामाजिक समरसता है,दोस्तों, परिवार, भागीदारों और पड़ोसियों से जुड़ने से शुरुआत करें।अपने जीवन में किसी भी तरह की असहमति से निपटने के लिए उदारतापूर्वक,दयालु तरीके से और अपने समुदाय के लोगों को वापस मुख्य धारा में लाने पर ध्यान केंद्रित करें। सुनिश्चित करें कि आप व्यक्तिगत सद्भावना भी बनाए रखें, क्योंकि इससे आपको दूसरों के साथ तालमेल करने में मदद मिलेगी। समाज में सभी को समान अधिकार और अवसर मिलना चाहिए। समाज सेवा का कार्य हमें एकजुट करता है। एक बेहतर समाज की परिकल्पना के लिए संवाद व सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है। कुटुंब प्रबोधन - कुटुंब प्रबोधन पर हम तीन स्तर पर काम कर सकते है - हफ्ते में कम से कम एक दिन परिवार के साथ बैठकर भोजन करें,अपनी संस्कृति, परंपरा और इतिहास पर बात करें । दूसरा स्तर है अपने मित्र व रिश्तेदारों के परिवारों की बैठ कर भोजन करें,सामूहिक चर्चा करे पर विवादों से बचें ।हम सभी अपने आसपास के परिवारों के बीच मेलपिलप करें व बातचीत करे व उनके सुख दुख मे भागीदारी करें | स्व का बोध - अपने व्यवहार,दृष्टिकोण,ताकत,और कमज़ोरियों के बारे में जानकारी होना | इससे दूसरों के प्रति अपने दृष्टिकोण का अनुमान लगाता है | आत्म-बोध में आत्म-सम्मान, आत्म-मूल्य, पहचान, और आत्म-छवि शामिल है |आत्म-बोध, मनोविज्ञान के प्रमुख लक्ष्यों में से एक है | दूसरों के साथ बातचीत भी आत्म-बोध को आकार देती है | आत्म-बोध को विकसित करने में अनुभव और दूसरों के साथ बातचीत का इस्तेमाल किया जा सकता है | आत्म-बोध अपनी विकासशील पहचान से जुड़ा हुआ है | बच्चों को स्वयं के बारे में सकारात्मक भावना विकसित करने में मदद करना भाषा भोजन व वेश स्वदेशी होनी चाहिए,अपने देश मे निर्मित समान का उपयोग करे | शादी व मांगलिक उत्सव के समय अपनी भाषा में निमंत्रण पत्र छपवाए,अपने मे व मित्रों से अपनी भाषा में बात करें,हॅलो की जगह अपनी मातृ भाषा का उपयोग करें राम-राम,नमस्ते इत्यादि | नागरिक कर्तव्य - नागरिक कर्तव्य बोध का मतलब है कि नागरिकों को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना चाहिए और उन्हें पूरा करने के लिए ज़िम्मेदार होना चाहिए | नागरिक कर्तव्यों को पूरा करना,सरकार और नागरिकों के बीच होने वाले अनुबंध का सम्मान करना है | नागरिकों के कर्तव्य कानून द्वारा अनिवार्य नहीं होते, लेकिन इन्हें सामाजिक रूप से अच्छा माना जाता है | इनका उलेख राज्य के नीति निर्देशक तत्व के द्वारा संविधान में है | चुनाव में मतदान करना,सामुदायिक सेवा परियोजनाओं में भाग लेना,करों का भुगतान करना,अदालत में गवाह के तौर पर सेवा करना,नियमों का पालन करना,हेलमेट पहनना,कार मे सीट बेल्ट बांधना,सरकारी व सामाजिक संसाधनों व सीमित उपभोग करना | अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥ यह मेरा है, वह पराया है, ऐसा छोटे विचार के व्यक्ति करते हैं। उच्च चरित्र वाले लोग समस्त संसार को ही परिवार मानते हैं॥ हिन्दवी स्वराज्य के स्वप्न दृष्टा महानायक छत्रपति शिवाजी शिरोमणि दुबे हमारे देश का इतिहास अत्यंत रोमांचकारी तथा सतत संघर्ष की गौरव गाथा है। लगभग 2300 वर्षों तक भारत विदेशी आक्रांताओं के बर्बर हमलों का शिकार होता रहा। इन दुर्धर्ष हमलों से अपनी अस्मिता को बचाने के लिए भारत माता की कोख से हर कालखण्ड में ऐसे नर वीर पैदा होते रहे जिन्होंने देश की आन-बान-शान को दुनिया में जीवंत बनाये रखा। इतिहास में कुछ पल ऐसे होते है जो यादगार बन जाते है। कुछ तिथियाँ कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो समय की शिला पर अपने निशान छोड़ जाती है, स्मरणीय बन जाती है। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी भारत के अतीत के पृष्ठों में सुवर्ण अक्षरों में अंकित ऐसा दिवस है जब 6 जून 1674 को विश्व में कहीं भी पहली बार हिन्दू पदपादशाही की स्थापना हुई थी। हिंदवी स्वराज्य की स्थापना हुई थी। आज से 350 वर्ष पहले सह्याद्रि पर्वत के शिवनेरी दुर्ग पर इसी तिथि को छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था। उस दिन छत्र शिवाजी राजे ने धारण किया था, शिवाजी सम्राट बने थे। लेकिन यह किसी राजा का राजतिलक नहीं था। यह राज तिलक था उस शौर्य का जिसने मुगलिया सल्तनत को समरांगण में कतरा-कतरा बिखेर दिया था। यह अभिनंदन था उस सुप्त चेतना का जिसके बज्र संकल्पों से टकराकर बड़ी-बड़ी राक्षसी ताकतें धराशायी होती रही। यह राज्याभिषेक था उस सामान्य मानवी का जिसे हमेशा धकियाया गया, अपमानित किया गया। यह वंदन था उस विजय वाहिनी का जिसने स्वतंत्रता-स्वराज्य के लिए तोपों के आगे अपने सीने अड़ा दिये। यह राजतिलक था उस सनातन सत्ता प्रतिष्ठान का जिसकी एक मुठभेड़ में आततायी धनानंद के सर से ताज आसमान में टूट टूटकर बिखर गये। शिवाजी महाराज छत्रपति हो गये। यह उत्सव का दिन है, यह प्रेरणा देने वाला क्षण है। ऐसे शिव साम्राज्य दिवस पर संघ संस्थापक प.पू.डॉ.हेडगेवार ने कहा था कि यह तो सम्पूर्ण हिन्दू समाज के लिए गर्व का गौरव का क्षण है। यह केवल राजा का राज्याभिषेक नहीं सम्पूर्ण हिन्दू समाज का राजतिलक है। 17वीं शताब्दी का आरंभ हो रहा था। हिन्दुस्थान का मानचित्र खण्ड-खण्ड बिखर रहा था। दक्षिण में आदिलशाही, निजामशाही, कुतुबशाही के जोर-जुल्म-ज्यादतियों से जनता असहनीय पीड़ा झेल रही थी वहीं उत्तर में मुगल वादशाह शाहजहां की मौज-मस्तियों से हिन्दू समाज में आक्रोश पैदा हो रहा था। अत्याचारों का कभी न रुकने वाला अंतहीन सिलसिला प्रारंभ हो गया था। हिन्दुओं के मठ-मंदिरों, आस्था के केन्द्रों को जमीदोज किया जा रहा था। भारत के महान ग्रंथों को आग के हवाले किया जा रहा था। भारत की पवित्रतम ज्ञान संपदा को समूल नष्ट किया जा रहा था। परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ समाज सिसकियां ले रहा था, विलाप कर रहा था। यह वही समय था जब भारत के भविष्य और सनातन धर्म को गंभीर चुनौती मिल रही थी। यह वही समय था जब टुकड़ों में बटा हुआ हिन्दू समाज आत्म विस्मृति का शिकार था। यह वही समय था जब भारत माता की कोख लज्जित हो रही थी। बड़े-बड़े कथित रायबहादुर खिताब के लिए मुगलिया सम्राटों के चरण चुम्बन कर रहे थे। छोटे से ईनाम के लिए ईमान बिक रहा था। चंद कोड़ियों के लिए मुसलमान बनने की होड़ लगी थी। इतिहासकार उस काल खण्ड का वर्णन करते हुए लिखते है यहाँ का समाज यहाँ का धर्म आक्रांताओं के पैरों तले कुचला हुआ था। यही समय था जब सम्पूर्ण देश में एक शब्दावली प्रचलित थी “दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा” अर्थात् दिल्ली में बैठा हुआ सुल्तान वह हमारे लिए ईश्वर के समान है। ऐसी दीन-हीन अवस्था अपने समाज की हो गई थी। ऐसी विपरीत परिस्थिति में जीजामाता के गर्भ से ऐसे महापुरुष का जन्म हुआ जिसे यह संसार छत्रपति शिवाजी के नाम से जानता है, उनका आदर पूर्वक स्मरण करता है। मुगलों ने पूरे भारत में एक झूठ फैलाया था कि अब कोई हिन्दू भारत का सम्राट नहीं बन पायेगा। लेकिन शिवाजी महाराज ने इस झूठ को अपनी चमचमाती भवानी तलवार से 100 टुकड़े करके फेंक दिये। उन्होंने छत्र धारण किया, अपने नाम के सिक्के चलवाये और मुगलों के लिए दक्षिण का द्वार हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिया। छत्रपति शिवाजी कहते थे कि राष्ट्र किसी राजा की सम्पत्ति नहीं है। राजा उसका मालिक नहीं हो सकता। वह खजाना तो जनता का है जनता के कल्याण के लिए है। शिवाजी ने अपने हिंदवी साम्राज्य में अंसख्य मंदिर, बाबड़ी, कूप बनवाये जिससे धर्म और धरती माता दोनो समृद्ध रह सके। शिवाजी महाराज का शासन आधुनिक भारत के रामराज्य का सबसे बड़ा उदाहरण है। स्वदेश, स्वधर्म, स्वदेशी और स्वभाषा के लिए जो प्रयास भूतकाल में शिवाजी ने किये वह उनकी भारत भक्ति और सनातन के प्रति गहरी आस्था का जीवंत प्रमाण है। शिवाजी के जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलु है कि उनका व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र बेदाग है। वे साहसी रहे हैं, दृढ़ता के साथ आगे बढ़े हैं। सभी प्रकार की परिस्थितियों को मात करते हुए निरंतर विजयी हुए हैं। उन्होने हमेशा जीतने के लिए युद्ध लड़े है। इसका कारण खोजेंगे तो इसके मूल में शिवाजी का निःस्वार्थ जीवन है। उनके जीवन में स्वार्थ को शून्य स्थान है। इसलिए उनके जीवन का वर्णन करते हुए उन्हें योगी कहा गया है। इतिहास में शायद ही किसी राजा को योगी कहा गया है वे श्रीमंत योगी हैं। इसलिए क्योंकि वह धर्म के लिए लड़े हैं। इनका सम्पूर्ण जीवन देश, समाज तथा हिन्दू के लिए समर्पित रहा है – है विघ्न कौन ऐसा जग में, टिक सके वीर नगर के मग में, खम ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़, मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है। शिवाजी के द्वारा शासन की बागडोर सम्हालने के पहले सारा कारोबार फारसी और उर्दू में चलता था। शिवाजी मानते थे जब तक स्वभाषा का जागरण नहीं होता तब तक देश भक्ति का जागरण सम्भव नहीं है। स्वभाषा में काम-काज के लिए शिवाजी ने विद्वानों की एक समिति बनाई और राज्य व्यवहार से सम्बन्धित उर्दू, फारसी शब्दों के लिए संस्कृत में शब्द खोजे गये और सम्पूर्ण मराठा साम्राज्य में स्वभाषा में कार्य व्यवहार प्रारंभ हो गया। यह शिवाजी महाराज का स्वभाषा के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाता है। शिवाजी महाराज ने जोर-जुल्म से धर्मान्तरित हिंदुओं की घर वापिसी का मार्ग प्रशस्त किया। शिवाजी महाराज राजनीतिक नेता नहीं थे। सम्पूर्ण समाज का विचार उनके सामने था। इसलिए उन्होंने धोखे से, लालच से बल पूर्वक अहिंदू बने हुए लोगों का शुद्धीकरण कराया। वे कहते थे यह एक तरफा नहीं है जिन्होने अपनी उपासना पद्धति बदली है ऐसे मुसलमानों को फिर से हिंदू बनाया जा सकता है। यह उन्होंने अपने उदाहरण से सिद्ध किया था। नेताजी पालकर अच्छे सेनापति थे, औरंगजेब की सेवा में रहते थे, उन्हें वापस हिंदू बनाने का कार्य शिवाजी ने किया था। बजाजी राव निंवालकर जो स्त्री मोह में मतांतरित हो गये थे शिवाजी महाराज के प्रयासों से उनकी भी घर वापसी हुई। शिवा के राज्याभिषेक का जब समय आता है तब वे राजा बनने से इंकार कर देते है। उनकी छत्रपति बनने की कोई इच्छा नहीं है। आज की परिस्थितियों को देखेंगे तो कौन राजा बनने के लिए तैयार नहीं हेगा। काशी से आये पंडित गागाभट्ट ने शिवाजी से आग्रह किया आज देशभर में हिंदू राजा की बड़ी आवश्यकता है। तब शिवाजी गागाभट्ट के आग्रह पर राज्याभिषेक के लिए तैयार हो गये थे। परन्तु उन्होने यह कभी नहीं कहा कि यह मेरा राज्याभिषेक हो रहा है यह तो भगवान की इच्छा है। मैं उनके प्रतिनिधि के रुप में रहूँगा। वे कहते थे कि यह भवानी माता की इच्छा है कि मैं राजा बनू। शिवाजी महाराज ने कभी भी स्वयं को सिंहासन से ऊँचा नहीं माना वे तो ईश्वर की इच्छा के अनुरुप कार्य करते रहे। राज्याभिषेक के बाद शिवाजी महाराज ने एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपने सामने रखा है। इस सम्बंध में शिवाजी का मिर्जाराजे के लिखा गया पत्र पढ़ने लायक है। वह पत्र में लिखते है मिर्जाराजे, आप युद्ध के लिए क्यों आ रहे हो। आपको अपने साम्राज्य विस्तार के लिए युद्ध की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वेच्छा से अपना राज्य तुम्हारे चरणों में समर्पित करने के लिए तैयार हूँ लेकिन आप मुगलों के साम्राज्य विस्तार के लिए आए हो इसलिए मेरी भवानी तलवार आपसे युद्ध करने के लिए तैयार है। इस प्रकार शिवाजी ने अपने राष्ट्रीय दृष्टिकोण को स्पष्टता के साथ रखा है। शिवाजी के पास 300 किलों का विस्तृत साम्राज्य था। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इन 300 किलों में किलेदार उनका कोई रिश्तेदार नहीं था। कोई उनका सगा नहीं था। जिम्मेदारियां तय करते समय उन्होंने गुणवत्ता और क्षमता को आधार बनाया था। दायित्व तय करने में रिश्ता कभी आधार नहीं रहा। इस प्रकार शिवाजी महाराज के जीवन में एक व्यापक सर्व समावेशी दृष्टिकोण दिखाई देता है। छत्रपति शिवाजी को समझने की कोशिश करेंगे तो पचास साल की आयु और पूरे जीवनभर संघर्ष यही कुछ उनके जीवन में दिखाई देता है। वे राजा है, उन्होंने जीवनभर युद्ध लड़े हैं। अपने पुरुषार्थ-पराक्रम से गये हुए किलों को वापस किया है। शत्रुओं को खदेड़ा है परन्तु यह करते समय उनके जीवन में कोई व्यक्तिगत आकांक्षा नहीं है। आकांक्षा बस इतनी है कि यह हिंदवी स्वराज्य सुरक्षित रहना चाहिए। इसके लिए जो-जो करना पड़ेगा करते चलेंगे। छत्रपति शिवाजी ने तय किया था हमारा शासन भेद-भाव मुक्त होगा। हम जनता का विश्वास प्राप्त करेंगे। वे मानते थे कि यदि स्वराज्य में सामान्य जनों का शासन के प्रति विश्वास नहीं रहा तो कोई भी राजा न तो देश का हित कर सकता है और न समाज का। इसलिए उन्होंने सामान्य जनों में विश्वास जगाने का प्रयास किया था। उन्होंने जो आदेश दिये है वास्तव में वह अध्ययन के लायक है। उन्होंने महिला सुरक्षा को हर कीमत पर सुनिश्चित करने का फरमान सुनाया है। वे किसान कल्याण और उनकी खुशहाली के लिए योजनाएँ बनाते हैं। उनकी न्याय व्यवस्था बड़ी प्रसिद्ध रही है। वह सबके साथ न्याय की वकालत करते है, मठ, मंदिर, साधु, संत, महंत सुरक्षित रहे इसके लिए मंत्रिमण्डल में अष्टप्रधान की व्यवस्था करते हैं। सहज रुप से मन में एक विचार आता है ईश्वर जब मनुष्य रुप में अवतार लेता है तो उसके जीवन का उद्देश्य होता है। भगवान राम ने यहां जन्म लिया। उनका लक्ष्य ही इस दुनिया में आसुरी शक्तियों का संहार करना था। “निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह।” यही उनके जीवन का लक्ष्य है। इसलिए उनके जीवन में सभी प्रयास राक्षसी प्रवृत्ति का संहार करते हुए दिखाई देते हैं। अंत में रावण का संहार होता है। सम्पूर्ण रामायण उनके राम के राज्याभिषेक पर समाप्त होती है परन्तु संकल्प की पूर्णाहूति रावण के संहार पर होती है। कृष्ण के सामने बचपन से ही संघर्ष है कंस मारने के लिए खड़ा है उनके जीवन का लक्ष्य है – परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दृष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।। हम देखते है कि भगवान कृष्ण का जीवन तब समाप्त होता है जब पाण्डवों की विजय होती है, धर्म की स्थापना होती है। भगवान राम के जीवन का लक्ष्य राक्षसों का संहार रहा होगा। भगवान कृष्ण के जीवन का उद्देश्य धर्म की स्थापना रही होगी। छत्रपति शिवाजी महाराज का हिंदवी साम्राज्य का निर्माण यही उनके जीवन का संकल्प रहा है। हिन्दू पदपादशाही निर्माण करना शिवाजी को अभिप्रेत था जिसे उन्होंने अपने जीवन काल में ही पूर्ण किया है। अंततः यहां का हिन्दू समाज अधर्मी, आसुरी शक्तियों के सामने आत्म विश्वास पूर्वक डटकर खड़ा रह सके। दुनिया का दिशाबोध करने वाला समाज चाहिए तो ऐसे महापुरुषों का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणादायी बन सकता है। आज जब देश को अंदर और बाहर से चुनौतियां मिल रही हैं तब शिवाजी के जीवनकाल का संदेश हमारा मार्ग प्रशस्त करेगा ही। समाधियां उन्हीं की महकती है जो अहं के लिए नहीं वयं और विराट की सेवा में खप जाते हैं, खर्च हो जाते हैं। सच में, वे ही इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ है जिसका एक-एक शब्द वंदन-अर्चन के योग्य है। शिवशाही का संदेश यही है – प्रेरणा शहीदों से अगर हम नहीं लेंगे, तो स्वतंत्रता ढलती हुई सांझ हो जायेगी। पूजा वीरों की यदि हम नहीं करेंगे, तो सच मानो वसुन्धरा बांझ हो जायेगी।। (लेखक विद्या भारती मध्यभारत प्रान्त के प्रदेश सचिव है।) मैं अपने चेहरे को अख़बार करने वाला हूँ मै अमीरे शहर से एक दूरी रखने वाला हूँ मैं जी-हुज़ूरी से इन्कार करने वाला हूँ कहो अँधेरे से दामन समेट ले अपना मैं जुगनुओं की झण्डा बरदारी करने वाला हूँ मेरे लोग मुझे पढ़ सके हर रोज मैं अपने चेहरे को अख़बार करने वाला हूँ मैं चाहता था कि भाई का साथ छूट न जाए मगर वो समझा कि मैं वार करने वाला हू आँखों से सुनना मेरी कहानी को बन्द होठ से जीवन गीत गाने वाला हूँ हमारी राह में पत्थर कोई नहीं होगा जीवन दरिया है मैं पार करने वाला हूँ डाक्टर बेटी शिक्षक सीता राम पांडे अपनी पत्नी के साथ अकेले हॉस्पिटल के कमरे में बैठे बैठे सोच रहे थे के बीवी के आपरेशन के लिए पैसे की व्यवस्था कहाँ से करू हर तरफ दिमाग लगा के हार चुके और बाद में बस वही घर बचा जिसमें वो रह रहे थे.. आँखों से आंसू पोछते हुए सीता राम ने अपनी पत्नी की तरफ देखा वो दो दिन से बेहोस थी आगे पीछे कोई नही एक बेटी थी वो भी अपनी पसन्द के लड़के के साथ भाग कर शादी कर ली तब से माँ बाप की तरफ देखा नही.. सीता राम सोच ही रहे थे के नर्स ने आ कर बताया कि बड़ी डॉक्टर आ रही हैं जल्दी ही अपनी पत्नी ठीक हो जायेगी आप पैसे जमा करवा दीजिये,, सीता राम जी ने थोड़ा समय माँगा और मोबाइल निकाल कर बटन दबाने लगे लोगों से मदद माँगने लगे पर कोई फोन नही उठा रहा तो कोई बाद में बात करता हूँ बोलकर चला जा रहा है. सीता राम कमरे के बाहर आकर गहरी सांस लेते हुए वार्ड बॉय से बोले आप जरा मेरी पत्नी को देखना मैं आता हूँ सीता राम एक दुकान पर ब्याज का पैसा माँगने गए लेकिन दुकान वाला उनकी हालत देख उनको सुनाने लगा वापस कहाँ से करोगे पांडे जी.. कोई नोमनी लाओ तभी मै पैसे दे पाऊंगा, बगल मे खड़ी कार से एक दुबली पतली महिला जो की पांडे जी को देख रही थी तेजी से उनको आवाज़ लगाती है लेकिन पांडे जी बिना कुछ सुने तेजी से हॉस्पिटल की तरफ जाते हैं और वहाँ पर रोते हुए विनती करते हैं कि मैं पूरा पैसा जमा कर दूंगा बस इलाज में कमी न हो. लेकिन एक डॉक्टर उनको हड़काते हुए धक्का देता है तभी सामने से बड़ी डॉक्टर आती हुई गिरते हुए पांडे जी को पकड़ती है और सभी स्टाफ को डांट लगाती है और अपनी केबिन में जाती है! और कुर्सी में बैठे बैठे सोचती है पांडे सर हाँ आज मैं जो हूँ उनकी वजह से, सीमा ने जैसे- तैसे अपने गांव से अपना हाईस्कूल इंटर कंप्लेट कर लिया था और अब आगे की पढाई के लिए कॉलेज में पढ़ने के मन से अपने घर में अपनी पढ़ाई की बात बाबा को बताई थी बाबा ने थोड़ी न नुकूर के साथ हामी भरी I और किसी तरह मेहनत मजदूरी करके अपने बिटिया को शहर पढ़ने के लिए भेजा था शहर में सीमा का दाखिला भी एक अच्छे कॉलेज में हो गया सीमा ने इंटर विज्ञान वर्ग में किया था वो चाहती थी बड़ी डॉक्टर बनना जो लोगों का इलाज कर सके| शहर आकर एक-दो दिन ही होस्टल से कॉलेज गई थी लेकिन उसे बड़ा अच्छा लगा था अपने गांव की थोड़ी याद तो आती थी बाबा की याद आती थी लेकिन फिर भी उसे कॉलेज में अपनापन लगने लगा था । एक दो सहेलियाँ भी उसकी बन गई थी और जो उसके क्लास टीचर थे वो सीमा को बहुत अच्छे लगे क्योंकि उनका बहुत सरल स्वभाव था और इस वजह से वह अपनी हर बात सर को धीरे से बता पाती थी एक दो पीरियड लगने के बाद जब कभी भी सर फ्री होते तो कॉलेज की फील्ड में जाकर बैठ जाते और सीमा अपने जो भी डाउट होते वहीं क्लीयर कर लेती और सर को बोलती एक दिन मैं डॉक्टर बनूगी सर, वो सीमा को बेटी की तरह मानते थे सीमा की पैसे से भी मदद करते देते लेकिन ये बात किसी को अच्छी नही लगती थी| उसके गांव से हजार दो हजार जो बाबा भेजते जो कम पड़ते सर देते और बोलते , सीमा जब तुम कमाने लगोगी पूरा पैसा वसूल लूंगा ” एक साल बीत गया सीमा का पेरफॉर्मेंस भी अच्छा रहा , एक दिन सर के घर में पूजा थी कुछ स्टाफ के अलावा सीमा को भी आमंत्रण दिया था , सीमा भी गई सभी स्टाफ के जाने के बाद सर ने कहा सीमा रात हो गई है अकेके कहाँ जाओगी थोड़ी देर रुको सब समान व्यवस्थित करके मैं चलता हूँ छोड़ देता हूँ . सर ने कहा खाना खा लो और मिठाई वग़ैरह भी पैक कर लो. सीमा ने खाना खाया और सर ने भी खाना खाने के बाद सीमा को कुछ गिफ्ट देकर होस्टल में छोड़ा. दो दिन बाद सुबह जब सीमा कॉलेज गयी तो उसके बाबा कॉलेज आ चुके थे किसी ने बाबा से शिकायत कर दिया था कि सीमा रा

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