शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

ज्ञानवर्धक कहानीयाॅ


  झूठा सुख 

एक बार एक नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी। एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो उठा, तुरन्त उस पर आ बैठा। यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया। उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली।वह सोचने लगा, अहा ! यह तो अत्यन्त सुन्दर यान है, यहाँ भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूँ ? कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा। भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता। अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा। नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किन्तु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई। चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था, जहाँ उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी। कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा, किन्तु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं नजर नहीं आया। आखिरकार थककर, दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल मगरमच्छ उसे निगल गया। शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह होती है, जो आहार और आश्रय को ही परम गति मानते हैं और अंत में अनन्त संसार रूपी सागर में समा जाते है।

ईश्वर का न्याय 

एक दिन मार्ग में एक महात्मा जी अपने शिष्य के साथ भ्रमण पर निकले।गुरुजी को ज्यादा इधर-उधर की बातें करना पसंद नहीं था, कम बोलना और शांतिपूर्वक अपना कर्म करना ही गुरू जी को प्रिय था।परन्तु शिष्य बहुत चपल था, उसे सदैव इधर-उधर की बातें ही सूझती, उसे दूसरों की बातों में बड़ा ही आनंद आता था। चलते हुए जब वो तालाब से होकर गुजर रहे थे, तो उन्होंने देखा कि एक धीवर नदी में जाल डाले हुए है। शिष्य यह सब देख खड़ा हो गया और धीवर को ‘अहिंसा परमोधर्म’ का उपदेश देने लगा। किन्तु धीवर कहाँ समझने वाला था, पहले उसने टालमटोल करनी चाही और बात जब बहुत बढ़ गयी तो शिष्य और धीवर के बीच झगड़ा शुरू हो गया। यह झगड़ा देख गुरूजी जो उनसे बहुत आगे बढ़ गए थे, लौटे और शिष्य को अपने साथ चलने को कहा एवं शिष्य को पकड़कर ले चले। गुरूजी ने अपने शिष्य से कहा- बेटा हम जैसे साधुओं का काम सिर्फ समझाना है, लेकिन ईश्वर ने हमें दंड देने के लिए धरती पर नहीं भेजा है ! शिष्य ने पुछा- महाराज को न तो बहुत से दण्डों के बारे में पता है और न ही हमारे राज्य के राजा बहुतों को दण्ड देते हैं. तो आखिर इसको दण्ड कौन देगा ? शिष्य की इस बात का उत्तर देते हुए गुरूजी ने कहा- बेटा ! तुम निश्चिंत रहो इसे भी दण्ड देने वाली एक अलौकिक शक्ति इस दुनिया में है जिसकी पहुँच सभी जगह है… ईश्वर की दृष्टि चारो और है और वो सब जगह पहुँच जाते हैं। इसलिए अभी तुम चलो, इस झगड़े में पड़ना गलत होगा, इसलिए इस झगड़े से दूर रहो..! शिष्य गुरुजी की बात सुनकर संतुष्ट हो गया और उनके साथ चल दिया।इस बात को ठीक दो वर्ष ही बीते थे कि एक दिन गुरूजी और शिष्य दोनों उसी तालाब से होकर गुजरे, शिष्य भी अब दो साल पहले की वह धीवर वाली घटना भूल चूका था.. उन्होंने उसी तालाब के पास देखा कि एक चुटीयल साँप बहुत कष्ट में था उसे हजारों चीटियाँ नोच-नोच कर खा रही थीं. शिष्य ने यह दृश्य देखा और उससे रहा नहीं गया, दया से उसका ह्रदय पिघल गया था।वह सर्प को चींटियों से बचाने के लिए जाने ही वाला था कि गुरूजी ने उसके हाथ पकड़ लिए और उसे जाने से मना करते हुए कहा-बेटा ! इसे अपने कर्मों का फल भोगने दो.. यदि अभी तुमने इसे रोकना चाहा तो इस बेचारे को फिर से दुसरे जन्म में यह दुःख भोगने होंगे क्योंकि कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है |शिष्य ने गुरूजी से पुछा- गुरूजी इसने कौन-सा कर्म किया है जो इस दुर्दशा में यह फँसा है ?गुरू महाराज बोले- यह वही धीवर है जिसे तुम दो वर्ष पूर्व इसी स्थान पर मछली न मारने का उपदेश दे रहे थे और वह तुम्हारे साथ लड़ने के लिए आग-बबूला हुआ जा रहा था।वे मछलियाँ ही चींटी है जो इसे नोच-नोचकर खा रही है..यह सुनते ही बड़े आश्चर्य से शिष्य ने कहा- गुरूजी, यह तो बड़ा ही विचित्र न्याय है।गुरुजी ने कहा- बेटा ! इसी लोक में स्वर्ग-नरक के सारे दृश्य मौजूद हैं, हर क्षण तुम्हें ईश्वर के न्याय के नमूने देखने को मिल सकते हैं।

चाहे तुम्हारे कर्म शुभ हो या अशुभ उसका फल तुम्हें भोगना ही पड़ता है।इसलिए ही वेद में भगवान ने उपदेश देते हुए कहा है- अपने किये कर्म को हमेशा याद रखो, यह विचारते रहो कि तुमने क्या किया है, क्योंकि ये सच है कि तुमको वहाँ भोगना पड़ेगा..

जीवन का हर क्षण कीमती है इसलिए इसे बुरे कर्म के साथ व्यर्थ जाने मत दो. अपने खाते में सदैव अच्छे कर्मों की बढ़ोत्तरी करो क्योंकि तुम्हारे अच्छे कर्मों का परिणाम बहुत सुखद रूप से मिलेगा।

इसका उल्टा भी उतना ही सही है, तुम्हारे बुरे कर्मों का फल भी एक दिन बुरे तरीके से भुगतना पड़ेगा. इसलिए कर्मों पर ध्यान दो क्योंकि वो ईश्वर हमेशा न्याय ही करता है..

शिष्य गुरुजी की बात स्पष्ट रूप से समझ चूका था…

दोस्तों, हम चाहे इस बात पर विश्वास करें या नहीं लेकिन यह शत्-प्रतिशत सच है कि ईश्वर हमेशा सही न्याय करते हैं।

और उनके न्याय करने का सीधा सम्बन्ध हमारे अपने कर्मों से है. यदि हमने अपने जीवन में बहुत अच्छे कर्म किये हैं या अच्छे कर्म कर रहे हैं तो उसी के अनुरूप ईश्वर हमारे साथ न्याय करेंगे।

यह जीवन हमें इसलिए मिला है ताकि हम कुछ ऐसे कार्य करें जिसको देखकर ईश्वर की आँखों में भी हमारे प्रति प्रेम छलक उठे !

अति वाचालता का दुष्परिणाम 

        एक राजा बहुत अधिक बोलता था। उसका मन्त्री विद्वान् और हितचिन्तक था। इसलिये सोचता रहता था कि राजा को कैसे इस दोष से मुक्त करूँ और वह ज्ञान दूँ, जो कि मनुष्य के हृदय में बहुत गहराई से उतरकर उसके स्वभाव का अंग बन जाता है। मन्त्री हमेशा राजा के हित की सोचता रहता था और उचित अवसर की तलाश में था कि राजा को अपने इस दोष का आभास हो और उसके द्वारा होनेवाली हानि को समझकर उसमें से निकल जायँ।

एक दिन की बात है, राजा मन्त्री के साथ उद्यान में घूमते हुए एक शिला पर बैठ गया। शिला के ऊपर एक छायादार पेड़ था। उस आमके पेड़ पर कौवे का एक घोंसला था, उसमें काली कोयल अपना अण्डा रख गयी।  कोयल अपना घोंसला नहीं बनाती, वरन् कौवे के घोंसले में ही अण्डा रख देती है। कौवी उस अण्डे को अपना समझकर पालती रहती है। आगे चलकर उसमें से कोयल का बच्चा निकला। कौवी उसे अपना पुत्र समझकर चोंच से चुग्गा ला, उसे पालती थी। कोयल के बच्चे ने असमय जबकि उसके पर भी नहीं निकले थे, कोयल की आवाज की। कौवी ने सोचा- 'यह अभी विचित्र आवाज करता है, बड़ा होने पर क्या करेगा ?' कौवी ने चोंच से मार-मारकर उसकी हत्या कर दी और घोंसले से नीचे गिरा दिया। राजा जहाँ बैठा था, वह बच्चा वहीं उसके पैरों के पास गिरा।

 राजा ने मन्त्री से पूछा-'मित्र ! यह क्या है ?' मन्त्री को राजा की भूल बताने का यह अवसर मिल गया। इसी अवसर का फायदा उठाकर मन्त्री ने कहा- 'महाराज ! अति वाचाल (बहुत बोलनेवालों) की यही गति होती है।' पूछने पर मन्त्री ने पूरी बात राजा को समझाकर बतायी कि कैसे यह बच्चा असमय आवाज करने से नीचे गिरा और मृत्यु को प्राप्त हुआ। यदि यह चुप रहता तो यथा समय घोंसले से उड़ जाता। इतना कहकर मन्त्री ने राजा को मौका देखकर उसकी वाचालता दूर करने के लिये यह प्रत्यक्ष उदाहरण बताकर नीति बतायी। 'चाहे मनुष्य हो, चाहे पशु-पक्षी; असमय अधिक बोलने से इसी तरह दुःख भोगते हैं।' उसने वाणी के अन्य दोष और उसके दुष्परिणाम राजा को बताये। 'दुर्भाषित वाणी हलाहल विष के समान ऐसा नाश करती है, जैसा तेज किया हुआ शस्त्र भी नहीं कर सकता। इसीलिये बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि वाणी की समय- असमय रक्षा करे। अपने समकक्ष व्यक्तियों से कभी अधिक बातचीत न करे। जो बुद्धिमान् समय पर विचारपूर्वक थोड़ा बोलता है, वह सबको अपने वश में कर लेता है।' बुद्धिमान् और प्रज्ञावान् मन्त्री की बात सुनकर राजा अति वाचालता के दोष को दूर कर मितभाषी हो गया और सुखपूर्वक राज्य करने लगा, उसने प्रसन्न होकर मन्त्री को मान और वैभव से कृतार्थ किया।

        !! भलाई का जज्बा !!

एक बार एक राजा ने एक कैदी को मौत की सजा सुनाई। सजा सुनकर कैदी आप खो बैठा। वह बादशाह को  गालियां देने लगा। कैदी दरबार के आखिरी कोने में खड़ा था। इसलिए उसकी गालियां बादशाह को सुनाई नहीं पड़ रहीं थीं।

इसलिए बादशाह ने अपने वजीर से पूछा कि वह क्या कह रहा है ? इस पर वजीर ने बताया, “महाराज, कैदी कह रहा है कि वे लोग कितने अच्छे होते हैं जो अपने क्रोध को पी जाते हैं और दूसरों को क्षमा कर देते हैं।”

यह सुनकर बादशाह को दया आ गई और उसने कैदी को माफ कर दिया। लेकिन दरबारियों में एक व्यक्ति था जो वजीर से जलता था। उसने कहा, “महाराज, वजीर ने आपको गलत बताया है।”

“यह व्यक्ति आपको गंदी गंदी गालियां दी रहा है। आप इसको माफ मत करिए।” उसकी बात सुनकर बादशाह गुस्सा हो गया और दरबारी से बोला-

“मुझे वजीर की बात ही सही लगी। क्योंकि इसने झूठ भी बोला है तो किसी की भलाई के लिए। इसके अंदर भलाई का जज्बा तो है। जबकि तुम दरबार में रहने के योग्य नहीं हो। तुम्हें तुरंत बेदखल किया जाता है।”

*शिक्षा:-*

हमेशा अपने व्यवहार और वाणी से दूसरों की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। वो झूठ भी सत्य के बराबर है जहाँ किसी की भलाई हो या जिंदगी बचने का सवाल हो।

 "धीरे चलो" 

नदी के तट पर एक भिक्षु ने वहां बैठे एक वृद्ध से पूछा"यहां से नगर कितनी दूर है? सुना है, सूरज ढलते ही नगर का द्वार बंद हो जाता है। अब तो शाम होने ही वाली है। क्या मैं वहां पहुंच जाऊंगा?'वृद्ध ने कहा "धीरे चलो तो पहुंच भी सकते हो।" भिक्षु यह सुनकर हैरत में पड़ गया। वह सोचने लगा कि लोग कहते हैं कि जल्दी से जाओ, पर यह तो विपरीत बात कह रहा है। भिक्षु तेजी से भागा। लेकिन रास्ता ऊबड़-खाबड़ और पथरीला था। थोड़ी देर बाद ही भिक्षु लड़खड़ाकर गिर पड़ा।किसी तरह वह उठ तो गया लेकिन दर्द से परेशान था। उसे चलने में काफी दिक्कत हो रही थी। वह किसी तरह आगे बढ़ा लेकिन तब तक अंधेरा हो गया। उस समय वह नगर से थोड़ी ही दूर पर था। उसने देखा कि दरवाजा बंद हो रहा है। उसके ठीक पास से एक व्यक्ति गुजर रहा था। उसने भिक्षु को देखा तो हंसने लगा भिक्षु ने नाराज होकर कहा, "तुम हंस क्यों रहे हो?"उस व्यक्ति ने कहा, 'आज आपकी जो हालत हुई है, वह कभी मेरी भी हुई थी। आप भी उस बाबा जी की बात नहीं समझ पाए जो नदी किनारे रहते हैं।'भिक्षु की उत्सुकता बढ़ गई। उसने पूछा "साफ साफ बताओ भाई।" उस व्यक्ति ने कहा "जब बाबाजी कहते हैं कि धीरे चलो तो लोगों को अटपटा लगता है। असल में वह बताना चाहते हैं कि रास्ता गड़बड़ है,अगर संभलकर चलोगे तो पहुंच सकते हो कथा का तात्पर्य* जिंदगी में सिर्फ तेज भागना ही काफी नहीं है। सोच-समझकर संभलकर चलना ज्यादा काम आता है।


निंदा के दुष्परिणाम 

राजा पृथु एक दिन सुबह-सुबह घोड़ों के तबेले में जा पहुँचे। तभी वहाँ एक साधु भिक्षा मांगने आ पहँचा। सुबह-सुबह साधु को भिक्षा मांगते देख पृथु क्रोध से भर उठे। उन्होंने साधु की निंदा करते हुये, बिना विचारे तबेले से घोड़े की लीद उठाई और उसके पात्र में डाल दी। साधु भी शांत स्वभाव का था, सो भिक्षा ले वहाँ से चला गया और वह लीद कुटिया के बाहर एक कोने में डाल दी।

कुछ समय उपरान्त राजा पृथु शिकार के लिये गये। पृथु ने जब जंगल में देखा कि, एक कुटिया के बाहर घोड़े की लीद का बड़ा सा ढेर लगा हुआ है। उन्होंने देखा कि, यहाँ तो न कोई तबेला है और न ही दूर-दूर तक कोई घोड़े दिखाई दे रहे हैं। वह आश्चर्यचकित हो कुटिया में गये और साधु से बोले....

   *"महाराज ! आप हमें एक बात बताइये, यहाँ कोई घोड़ा भी नहीं, न ही तबेला है, तो यह इतनी सारी घोड़े की लीद कहा से आई ?"*

साधु ने कहा...*" राजन् ! यह लीद मुझे एक राजा ने भिक्षा में दी है। अब समय आने पर यह लीद उसी को खानी पड़ेगी।"*

     यह सुन राजा पृथु को पूरी घटना याद आ गई। वे साधु के पैरों में गिर क्षमा मांगने लगे। उन्होंने साधु से प्रश्न किया...

     *हमने तो थोड़ी-सी लीद दी थी, पर यह तो बहुत अधिक हो गई ?*

साधु ने कहा...*हम किसी को जो भी देते हैं, वह दिन-प्रतिदिन प्रफुल्लित होता जाता है और समय आने पर हमारे पास लौटकर आ जाता है, यह उसी का परिणाम है।*

   यह सुनकर पृथु की आँखों में अश्रु भर आये। वे साधु से विनती कर बोले...

     *"महाराज ! मुझे क्षमा कर दीजिये। मैं आगे से ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा। कृपया कोई ऐसा उपाय बता दीजिये, जिससे मैं अपने दुष्ट कर्मों का प्रायश्चित कर सकूँ।"* 

    राजा की ऐसी दु:खमयी हालत देखकर साधु बोला..

     *"राजन् ! एक उपाय है। आपको कोई ऐसा कार्य करना है, जो देखने में तो गलत हो, पर वास्तव में गलत न हो।*

     जब लोग आपको गलत देखेंगे, तो आपकी निंदा करेंगे। जितने ज्यादा लोग आपकी निंदा करेंगे, आपका पाप उतना हल्का होता जायेगा। *आपका अपराध निंदा करने वालों के हिस्से में आ जायेगा।*

यह सुनकर राजा पृथु ने महल में आकर बोहत सोच-विचार किया और अगले दिन सुबह से शराब की बोतल लेकर चौराहे पर बैठ गये। सुबह-सुबह राजा को इस हाल में देखकर सब लोग आपस में राजा की निंदा करने लगे कि, कैसा राजा है ? कितना निंदनीय कृत्य कर रहा है, क्या यह शोभनीय है ? आदि-आदि ! 

    निंदा की परवाह किये बिना राजा पूरे दिन शराबियों की तरह अभिनय करते रहे। इस पूरे कृत्य के पश्चात जब राजा पृथु पुनः साधु के पास पहुँचे, तो लीद के ढेर के स्थान पर एक मुट्ठी लीद देख आश्चर्य से बोले,  

"महाराज ! यह कैसे हुआ ? इतना बड़ा ढेर कहाँ गायब हो गया ?"

साधू ने कहा, *"यह आपकी अनुचित निंदा के कारण हुआ है राजन् ! जिन-जिन लोगों ने आपकी अनुचित निंदा की है,, आपका पाप उन सबमें बराबर-बराबर बंट गया है। फिर राजा बोले.. *" महाराज, फिर ये मुट्ठी भर बचा क्यूँ?? ये क्यूँ नहीं बंटा??"तो फिर ऋषि बोले, *"राजन, ये तुम्हारा कर्म है। जितना तुमने मेरे भिक्षा पात्र मे मेरे खाने के लिए दिए थे उतना तो तुम्हें खाना ही पड़ेगा। "कोई कितना भी उपाय, दान, पुण्य करले उसका कर्म दोष कट तो जाएगा पर उसका मूल नष्ट नहीं होगा... उतना तो भरना ही पड़ेगा..जब हम किसी की बेवजह निंदा करते हैं, तो हमें उसके पाप का बोझ भी उठाना पड़ता है। तथा हमें अपने किये गये कर्मों का फल तो भुगतना ही पड़ता है। अब चाहे हँसकर भुगतें या रोकर। *हम जैसा देंगे, वैसा ही लौटकर वापिस आयेगा।

नारद मुनि और किसान 

नारद मुनि जहां भी जाते थे, बस ‘नारायण, नारायण’ कहते रहते थे। नारद को तीनों लोकों में जाने की छूट थी। वह आराम से कहीं भी आ-जा सकते थे। 

     एक दिन उन्होंने देखा कि एक किसान परमानंद की अवस्था में अपनी भूमि जोत रहा था।नारद को यह जानने की उत्सुकता हुई कि उसके आनंद का राज क्या है, जब वह उस किसान से बात करने पहुंचे, तो वह अपनी भूमि को जोतने में इतना डूबा हुआ था, कि उसने नारद पर ध्यान भी नहीं दिया।  दोपहर के समय, उसने काम से थोड़ा विराम लिया और भोजन करने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठा। उसने बर्तन को खोला, जिसमें थोड़ा सा भोजन था। उसने केवल  तीन बार नारायण, नारायण, नारायण’ कहा और भोजन करने लगा।  किसान अपना भोजन उनके साथ बांटना चाहता था किन्तु  भोजन कम होने के कारण नारद उसके साथ नहीं कर सकते थे। नारद ने पूछा, ‘तुम्हारे इस आनंद की वजह क्या है?’  किसान बोला, ‘हर दिन नारायण अपने असली रूप में मेरे सामने आते हैं। मेरे आनंद का बस यही कारण है। नारद ने उससे पूछा, तुम कौन सी साधना करते हो? किसान बोला, मुझे कुछ नहीं आता। मैं एक अज्ञानी,अनपढ़ व्यक्ति हूं। बस सुबह उठने के बाद मैं तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। अपना काम आरम्भ करते समय मैं तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं, अपना काम समाप्त करने के बाद मैं फिर तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। जब मैं खाता हूं, तो तीन बार  ‘नारायण’ बोलता हूं और जब सोने जाता हूं, तो भी तीन बार ‘नारायण’ बोलता हूं। ’नारद ने गिना कि वह खुद 24 घंटे में कितनी बार ‘नारायण’ बोलते हैं। 

   वह बहुत बार ऐसा करते थे, मगर फिर भी उन्हें नारायण से मिलने के लिए वैकुण्ठ तक जाना पड़ता था, जो बहुत ही दूर था, मगर खाने, हल चलाने या बाकी कामों से पहले सिर्फ तीन बार ‘नारायण’ बोलने वाले इस किसान के सामने नारायण वहीं प्रकट हो जाते थे। नारद को लगा कि यह ठीक नहीं है, इसमें जरूर कहीं कोई त्रुटि है।

       वह तुरंत वैकुण्ठ पहुंच गए और उन्होंने भगवान विष्णु जी से पुछा, ‘प्रभु मैं हर समय आपका नाम जपता रहता हूं, मगर आप मेरे सामने प्रकट नहीं होते। मुझे आकर आपके दर्शन करने पड़ते हैं। मगर उस किसान के सामने आप रोज प्रकट होते हैं और वह परमानंद में जीवन बिता रहा है!’ 

    विष्णु जी ने नारद की ओर देखा और लक्ष्मी जी को तेल से लबालब भरा हुआ एक बर्तन लाने को कहा। 

    भगवान विष्णु जी ने नारद से कहा,  ‘मुनिवर पहले आपको एक काम करना पड़ेगा। तेल से भरे इस बर्तन को भूलोक ले जाइए। किन्तु इसमें से एक बूंद भी तेल छलकना नहीं चाहिए। इसे वहां छोड़कर आइए, फिर हम आपके इस प्रश्न का उत्तर देंगे।

      ’नारद तेल से भरा बर्तन ले कर भूलोक गए, उसे वहां छोड़ कर वापस आ गए और बोले, ‘प्रभु अब मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए।’ विष्णु जी ने पूछा, ‘जब आप तेल से भरा यह बर्तन लेकर जा रहे थे, तो आपने कितनी बार नारायण बोला?’ 

 नारद बोले, ‘उस समय मैं नारायण कैसे बोल सकता था? आपने कहा था कि एक बूंद तेल भी नहीं गिरना चाहिए, इसलिए मुझे पूरा ध्यान उस बर्तन और तेल पर देना पड़ा। मगर वापस आते समय मैंने बहुत बार ‘नारायण’ कहा।’ 

विष्णु जी बोले, ‘यही आपके प्रश्न का उत्तर है।  उस किसान का जीवन तेल से भरा बर्तन ढोने जैसा है जो किसी भी पल छलक सकता है। उसे अपनी जीविका कमानी पड़ती है, उसे बहुत सारी चीजें करनी पड़ती हैं। मगर उसके बावजूद, वह नारायण बोलता है। जब आप इस बर्तन में तेल लेकर जा रहे थे, तो आपने एक बार भी नारायण नहीं कहा। यानी यह सुलभ तब होता है जब आपके पास करने के लिए कुछ नहीं होता।’इसलिए ईश्वर कहते हैं  "जो अपने कर्म करते हुए भी मुझे याद करता है उसके द्वार पर उसके दुख हरने मैं स्वयं जाता हूँ और जो फुरसत मिलने पर मुझे याद करता है उसे दुख के समय मेरे द्वार पर आना पड़ता है"।

जन्म कुंडली बनवाने व दिखाने हेतु करें 

शर्मा जी 9312002525,9560518227

वर वधू के लिए निम्नलिखित फार्म भरे ।


Fill the following form for the bride and groom।
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