मंगलवार, 1 जून 2021

करें योग रहे निरोग



  करें योग रहें निरोग

यौगिक उपचार व चिकित्सा,षट्कर्म अभ्यास से बैक्टिरिया व अपद्रव्य पदार्थों का निष्कासन,योगासन से रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास,प्राणायाम अभ्यास से फेफड़ों का बचाव,ध्यान के अभ्यास से बढ़ते तनाव व अस्थिरता पर रोक |

योग विज्ञान भी एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति होने के साथ-साथ स्वास्थ्य की चिकित्सा का शास्त्र है जिसके आध्यात्मिक व मानसिक लाभ के साथ शारीरिक लाभ प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान् हैं।

यौगिक उपचार व चिकित्सा 

योग विज्ञान अत्यंत ही पौराणिक विज्ञान है जिसे आध्यात्मिक लक्ष्य की पूर्ति हेतु अपनाया जाता रहा है,परंतु आज के समय में जब मनुष्य रोगों से ग्रसित हो चुका है तो ऐसे में योग एक स्वस्थ जीवनशैली के आधार के रूप में अपनाया जाता है। प्रत्येक बीमारी का निवारण इस विज्ञान में व्याप्त है। समय समय पर सामान्य जन की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि,शरीर में ऊर्जा के संतुलन, तनाव व भय के निवारण और शरीर में ऑक्सीजन की कमी को पूरा करने के साथ साथ शरीर में जमें बैक्टिरिया एवं अपद्रव्य पदार्थों का निष्कासन भी योग से संभव है। योग के कुछ अभ्यास जैसे षट्कर्म,योगासन,प्राणायाम व ध्यान द्वारा इस समस्या के प्रत्येक लक्षणों को कम करके यौगिक उपचार किया जा सकता है।

षट्कर्म अभ्यास से बैक्टिरिया व अपद्रव्य पदार्थों का निष्कासन

शरीर में जमे अपद्रव्य पदार्थों व बैक्टिरिया के इकट्ठा होने से शरीर पूर्ण रूप से आंतरिक शुद्धि को प्राप्त नहीं कर पता है। ऐसी स्थिति में शरीर अंदर से कमजोर पड़ता है,जो परिणाम स्वरूप रोगों को जन्म देने का कारण बनता है।इसमें षट्कर्म के कुछ अभ्यास करे तो इससे लाभ प्राप्त किया जा सकता है। षट्कर्म के अंतर्गत वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जल नेती,सूत्र नेती और कुंजल का अभ्यास अत्यंत लाभकारी है जिसे किसी अनुभवी योगशिक्षक के अंतर्गत सीख कर अभ्यास किया जा सकता है। षट्कर्म द्वारा शरीर के अपद्रव्य पदार्थों का निष्कासन होगा और विशेष रूप से गले व पेट संबंधी समस्या में लाभ प्राप्त होगा। 

योगासन से रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास

शरीर के भीतर विद्यमान् रोग प्रतिरोधक क्षमता है। ऐसे में शरीर के केन्द्रीय तत्वों तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता का पूर्णतः विकास करने में योगासन अत्यंत लाभप्रद  है। योगासनों के अभ्यास के अंतर्गत सर्वप्रथम सूक्ष्म व्यायाम का अभ्यास किया जाए जिससे शरीर में स्कंदन व थक्के(अंग्रेज़ी में क्लाटिंग) इत्यादि की आंतरिक समस्या। यौगिक सूक्ष्म व्यायाम से नाड़ियों में जो वात पित्त कफ, मज्जा-मेदादी अनुपयुक्त पदार्थों का संग्रह होता है उसकी निवृत्ति होती है। इसके अलावा कुछ आसनों का अभ्यास जैसे भुजंगासन,विपरीतकरणी,नौकासन,धनुरासन व सूर्य नमस्कार का अभ्यास भी करना चाहिए।

प्राणायाम अभ्यास से फेफड़ों का बचाव

प्राणायाम के अभ्यास से वर्तमान संक्रमण को फेफड़ों तक पहुँचने से यथासंभव रोका जा सकता है। इस महामारी में संक्रमण तेज़ी से फेफड़ों तक पहुँचाता है और हमारे शरीर में आक्सीजन की कमी को पैदा करता है। ऐसे में कुछ सामान्य प्राणायाम अभ्यास से हम अपने फेफड़ों को संक्रमण से बचा सकते है। इसके लिए उदरीय श्वास-प्रश्वास, वक्ष श्वास-प्रश्वास और अनुलोम विलोम प्राणायाम का अभ्यास किया जाए तो शरीर में आक्सीजन की कमी नहीं होगी और फेफड़ों का आंतरिक विस्तार अच्छा होगा। इन अभ्यासों से फेफड़ों में जो कार्बन डाइऑक्साइड ज़्यादा है वो बाहर निकलेगा व इससे शरीर का रक्त भी साफ़ होगा। 

ध्यान के अभ्यास से बढ़ते तनाव व अस्थिरता पर रोक

आज के समय में भागम भाग जिंदगी मे जो तनाव व अवसाद को शीघ्र जन्म देता है। संक्रमण के होने से भविष्य के प्रति चिंता व भय का वातावरण उत्पन्न हो जाता है। ऐसे में प्रतिदिन ध्यान का अभ्यास किया जाए तो निस्संदेह मन-मस्तिष्क में संतुलन बना रहेगा और तनाव व भय से लड़ने की सकारात्मक ऊर्जा मिलेगी। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तनाव और भय से मुक्त होने का उपाय केवल योग में है क्योंकि योग के अंतर्गत ध्यान की किसी भी विधि को अपनाकर हम अपने मन-मस्तिष्क पर संतुलन स्थापित कर सकते है।

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